बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

सुबह की धुंध में ताज महल जब धीरे-धीरे उभरता है, तो लगता है कोई राज़ खोलने वाला है। संगमरमर की खामोशी पूछती है, क्या इश्क़ अब भी इतना ही गहरा है, या वह मोबाइल की स्क्रीन पर सिमट गया है?

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पिछले साल जब एक उम्रदराज़ ‘महान’ नेता ने शांति के लिए नोबेल प्राइज की इच्छा जाहिर की थी, तब ही समझ लेना चाहिए था कि शांति का मतलब युद्ध तनाव होता है। यह वही दोहरी ज़ुबान है, जिसे जॉर्ज ऑरवेल ने ‘डबलस्पीक’ कहा था, जो अब उस लोकतंत्र की पहचान बन चुकी है, जिसने ताक़त और डर को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है...

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एक पनडुब्बी अनजाने समंदर की गहराइयों में उतरती है, वो भी 1870 में, जब बैटरी नाम की चीज़ बस एक तजुर्बा भर थी। एलियन तीन पैरों वाली डरावनी मशीनों से हमला करते हैं, और वही कल्पना इंसानों को चांद तक ले जाने वाले रॉकेट की प्रेरणा बन जाती है। बिजली से ‘ज़ॉम्बी’ को ज़िंदा करने की कहानी, आज अस्पतालों में दिल बचा रही है...

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उत्तर भारत में घूंघट सिर्फ़ एक परंपरा नहीं, बल्कि औरत की पहचान पर एक सवालिया निशान है। यह लेख एक महिला की ज़िंदगी के ज़रिये उस ख़ामोश क़ैद और धीमी आज़ादी की कहानी कहता है, जहां तालीम, काम और आत्मसम्मान ने घूंघट की घुटन को तोड़ा। यह दास्तां है बिना शोर के आए बदलाव की...

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पिछले हफ्ते मॉर्निंग वॉक पर अचानक भाटिया जी से मुलाक़ात हो गई। उम्र ढल चुकी थी, चाल में ठहराव था, और आंखों में एक अजीब-सी राहत। बातचीत आगे बढ़ी तो पता चला, 42 साल बाद उन्होंने हमेशा के लिए बोरिया-बिस्तर बांध लिया और अमेरिका को अलविदा कह दिया। वजह बस इतनी थी कि अपनी जीवन संध्या में, उनको अपने शहर की मिट्टी की खुशबू ने वापस खींच लिया...

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क्यों ठंडा पड़ गया वह जोश? जो डोनाल्ड ट्रंप 24 घंटे में अमन का वादा करता था, उनके पास दूसरे साल में ही अल्फ़ाज़ क्यों कम पड़ गए? क्या शोर-शराबा ही नीति था, अकड़ को ही कूटनीति समझ लिया गया, या बिना नक़्शे की तोड़-फोड़ ही सब कुछ थी? और सबसे बड़ा सवाल, क्या दुनिया अब प्रभावित होना बंद कर चुकी है...

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