डिजिटल चमक के पीछे बड़े से बड़ा होता जा रहा है कचरे का पहाड़!


पिछले दिनों, नई दिल्ली में एआई शिखर सम्मेलन की चकाचौंध रही। दुनियाभर के विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और टेक कंपनियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भविष्य पर मंथन किया। मंच पर ‘डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन’ की बातें हुईं। ऐप्प, क्लाउड और स्मार्ट प्लेटफॉर्म की चर्चा हुई। लेकिन, इसी डिजिटल उछाल के साथ एक नया संकट भी लगातार गहरा रहा है। हर नई तकनीक, हर अपग्रेड, हर नया डिवाइस… पीछे छोड़ जाता है, ई-कचरे का एक और ढेर।

डिजिटल इंडिया की चमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी छिपी है। हम हर साल नया मोबाइल खरीदते हैं। लैपटॉप बदलते हैं। टीवी अपग्रेड करते हैं। पुराना सामान अलमारी में धूल खाता रहता है या कबाड़ी के हाथ चला जाता है। यहीं से शुरू होती है, ई-कचरे की असली कहानी।

Read in English: A mountain of e-waste behind the digital glow!

भारत तेजी से डिजिटल हो रहा है। गांव तक इंटरनेट पहुंच गया है। हर हाथ में स्मार्टफोन है। सुविधा बढ़ी है। काम आसान हुआ है। लेकिन, इन गैजेट की उम्र छोटी होती जा रही है। कंपनियां नए मॉडल ला रही हैं। लोग जल्दी बदल रहे हैं। नतीजा साफ है। ई-कचरे का पहाड़ बड़े से बड़ा हो रहा है।

हाल में पर्यावरण संस्था ‘टॉक्सिक लिंक’ ने दिल्ली में एक रिपोर्ट जारी की है, ‘लॉन्ग रोड टू सर्कुलैरिटी’। रिपोर्ट बताती है कि भारत में ई-कचरे को संभालने की व्यवस्था कागज पर तो मजबूत दिखती है, लेकिन जमीन पर कमजोर है।

सरकार ने ईपीआर यानी एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी का नियम बनाया। मतलब जो कंपनी सामान बनाएगी, वही उसके कचरे की जिम्मेदारी भी उठाएगी। सुनने में ठीक लगता है। लेकिन, असली समस्या यहीं से शुरू होती है।

अभी रीसाइक्लिंग का ध्यान सिर्फ सोना, तांबा, लोहा और एल्युमिनियम पर है। जबकि, मोबाइल और बैटरी में ऐसे कई कीमती खनिज होते हैं जो देश के भविष्य से जुड़े हैं। जैसे लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ तत्व। इन्हीं से इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरियां बनती हैं। पवन चक्कियों के मजबूत मैग्नेट बनते हैं। सोलर और ग्रीन एनर्जी का ढांचा खड़ा होता है। अगर हम इन्हें अपने ही ई-कचरे से नहीं निकालेंगे तो बाहर से मंगाना पड़ेगा। आयात बढ़ेगा। खर्च बढ़ेगा। आत्मनिर्भरता का सपना कमजोर होगा।

रिपोर्ट कहती है कि ईपीआर पोर्टल में कई छोटे निर्माता, ऑनलाइन विक्रेता और ग्रे मार्केट वाले दर्ज ही नहीं हैं। यानी, जो बेच रहे हैं, वे जिम्मेदारी से बच निकलते हैं। आम आदमी को भी नहीं पता कि पुराना मोबाइल कहां जमा करें। कलेक्शन सेंटर कहां है? एक और बड़ी बात। कंपनियों को इससे कोई खास फायदा नहीं होता कि अगर वे टिकाऊ और आसानी से रीसायकल होने वाला डिजाइन बनाएं।

जागरूकता भी कम है। लोग समझते ही नहीं कि ई-कचरा कितना खतरनाक हो सकता है। आंकड़े डराते हैं। भारत हर साल लाखों टन ई-कचरा पैदा कर रहा है। दुनिया में हम तीसरे नंबर पर हैं। आने वाले सालों में यह कई गुना बढ़ सकता है।

रीसाइक्लिंग की आधिकारिक क्षमता तो बढ़ी है, लेकिन असल में 60 से 80 प्रतिशत ई-कचरा आज भी अनौपचारिक सेक्टर संभाल रहा है। कबाड़ी और छोटे यूनिट बिना सुरक्षा के तार जलाते हैं। एसिड से धातु निकालते हैं। धुआं निकलता है। जहरीली गैसें फैलती हैं। मिट्टी और पानी प्रदूषित होता है। मजदूरों को सांस की बीमारी, त्वचा रोग और कैंसर तक का खतरा रहता है।

सच यह है कि अनौपचारिक क्षेत्र पूरी तरह गलत भी नहीं है। वे कीमती धातु निकाल लेते हैं। सिस्टम को चलाए रखते हैं। जरूरत है उन्हें प्रशिक्षण देने की। सुरक्षा उपकरण देने की। आधुनिक तकनीक से जोड़ने की। अगर उन्हें औपचारिक ढांचे में शामिल किया जाए तो पारदर्शिता भी बढ़ेगी और कमाई भी।

कुछ सुधार हुए हैं। रीसाइक्लिंग का प्रतिशत बढ़ा है। लेकिन, अधिकृत संयंत्रों तक अभी भी आधे से कम ही कचरा पहुंच पाता है। ई-कचरा सिर्फ पर्यावरण की समस्या नहीं है। यह अर्थव्यवस्था, रोजगार और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है।

एक टन ई-कचरे में जितना सोना निकलता है, उतना खदान की मिट्टी में भी नहीं मिलता। अगर वैज्ञानिक तरीके से रीसाइक्लिंग हो तो अरबों रुपये की संपत्ति देश में ही रह सकती है। अब सवाल सीधा है। क्या हम डिजिटल सुविधा का मज़ा लेना चाहते हैं, पर उसकी जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहते?

हमें अपनी सोच बदलनी होगी। पुराना मोबाइल घर में जमा न रखें। अधिकृत केंद्र पर दें। सरकार को पारदर्शिता बढ़ानी होगी। कंपनियों को जवाबदेह बनाना होगा। डिजाइन ऐसा हो जो लंबे समय तक चले।

ई-कचरा कूड़ा नहीं है। यह छिपा हुआ खजाना है। जरूरत है, सही नज़र और साफ नीयत की। डिजिटल भारत की असली परीक्षा अब शुरू होती है। चमक दिख चुकी है। अब जिम्मेदारी निभाने का वक्त है।



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