फारस की खाड़ी का आसमान अब नीला नहीं रहा है। धुएं से सना, बैंगनी और बोझिल दिखता है। चालीस दिन तक चली जंग ने ज़मीन ही नहीं, फिज़ा को भी ज़ख़्मी कर दिया है।
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बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।
फारस की खाड़ी का आसमान अब नीला नहीं रहा है। धुएं से सना, बैंगनी और बोझिल दिखता है। चालीस दिन तक चली जंग ने ज़मीन ही नहीं, फिज़ा को भी ज़ख़्मी कर दिया है।
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प्यार अंधा होता है, यह कहावत पुरानी है। पर अब प्यार खून भी करने लगा है, यह नया सच है। आगरा की एक घटना ने दिल दहला दिया। एक मां ने अपनी ही मासूम बच्ची को मार डाला। वजह गुस्सा नहीं थी, गरीबी नहीं थी। वजह था एक नया रिश्ता। बच्ची “रास्ते की दीवार” बन गई थी। सवाल सीधा है। क्या अब रिश्ते बोझ बनते जा रहे हैं...
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कभी मोहब्बत बगावत हुआ करती थी। घर से लड़ाई। समाज से टकराव। फिल्मी अंदाज़ में, “प्यार किया तो डरना क्या!” लड़का-लड़की भागकर शादी कर लेते थे। कोर्ट में दो गवाह। या आर्य समाज मंदिर में सात फेरे। ना बैंड, ना बाजा, ना बारात। बस दिल की जिद। मां-बाप सालों तक रूठे रहते। मोहल्ले में कानाफूसी चलती रहती थी। पर इश्क में एक आग होती थी। एक दीवानगी। अब तस्वीर बदल गई है।
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उस रात सब कुछ आम था। सड़क पर हल्की रौशनी, पास की चाय की दुकान से उठती अदरख की महक, और घर लौटती एक लड़की, जिसकी बस एक ही ख्वाहिश थी, कोई उसे उसके हाल पर छोड़ दे। पीछे से क़दमों की आहट आई। कुछ सेकेंड। एक चीख। फिर सन्नाटा। चेहरे पर तेज़ाब जैसा कुछ फेंका गया, इतनी तेज़ी से कि ज़िंदगी फौरन दो हिस्सों में बंट गई, हमले से पहले और हमले के बाद। यह कोई कहानी नहीं बल्कि आज के भारत की हक़ीकत है।
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भरी गर्मी में लगी यह आग कब बुझेगी? जंग कब खत्म होगी? तबाही के मंजर पूछ रहे हैं कि विश्व युद्ध शुरू हुआ है या खत्म?
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भारत में एक खामोश विस्फोट हो रहा है। भीतर, मानसिक, मन के अंदर। ऊपर से सब सामान्य दिखता है। कॉलेज भरे हुए हैं। ऑफिस चल रहे हैं। सोशल मीडिया पर मुस्कानें चमक रही हैं। लेकिन, अंदर अजीब सी बेचैनी है। घबराहट है। नींद गायब है और संवाद लगातार खत्म हो रहा है। मानसिक स्वास्थ्य अब निजी समस्या नहीं बल्कि यह एक राष्ट्रीय संकट है...
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