‘दम मारो दम’ से बर्बाद हो रही है एक पूरी पीढ़ी...!


आगरा कैंट रेलवे स्टेशन के आसपास या यमुना किनारा रोड पर आपने छोटे-छोटे बच्चों को कबाड़ा प्लास्टिक बीनते जरूर देखा होगा। हर कुछ मिनट बाद वे कपड़े में भिगोया गया कोई केमिकल सूंघते हैं, जैसे वही उनकी भूख हो, वही उनका सुकून। शहर के नामी स्कूलों के इर्द-गिर्द ‘पुड़िया गैंग’ की फुसफुसाहटें हैं। शादी हो या बर्थडे पार्टी, बीयर और दारू अब रिवाज़ बन चुके हैं। कोई खांसी का सिरप गटक रहा है, कोई जर्दा, टिंक्चर या सुलोचन की बोतल। तन-बदन बेहाल, आंखें सूनी, दिमाग खिसका या भटका हुआ, नालियों और कूड़े के ढेरों में भविष्य तलाशती यह पीढ़ी आखिर किस दिशा में जा रही है?

जब एक 12 साल का बच्चा पहली बार किसी नशीले पदार्थ को छूता है, तो वह महज़ जिज्ञासा नहीं होती; वह समाज की सामूहिक विफलता का पहला दस्तावेज़ होता है। स्कूल की यूनिफॉर्म, पीठ पर बैग, आंखों में शून्यता… और जेब में वेपिंग डिवाइस या दोस्त से मिली कोई गोली। यह दृश्य अब अपवाद नहीं, एक खौफनाक नॉर्मल बनता जा रहा है।

Read in English: From ‘Dum Maaro Dum’ to a Doomed Generation…

कभी एक सिनेमाई अलार्म बेल फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ ने चेताया था कि नशा किसी एक राज्य की त्रासदी नहीं है। आज वही कहानी नए किरदारों के साथ देश के कोने-कोने में दोहराई जा रही है; मैसूर की औद्योगिक बस्तियों से लेकर गोवा के समुद्र तटों तक, और महानगरों के प्रतिष्ठित कैंपसों तक।

साल 2025 के एक व्यापक सर्वेक्षण ने तस्वीर और साफ कर दी। दस बड़े शहरों में लगभग 5900 स्कूली छात्रों पर हुए अध्ययन में 15 प्रतिशत से अधिक बच्चों ने जीवन में कभी न कभी किसी पदार्थ का सेवन स्वीकार किया। 10 प्रतिशत ने पिछले वर्ष और सात प्रतिशत ने पिछले महीने उपयोग की बात मानी। शुरुआत की औसत उम्र 12.9 वर्ष। यह उम्र क्रिकेट, कविताओं और कॉमिक्स की होनी चाहिए थी, लेकिन अब यह निकोटिन, शराब और ओपिओइड की गिरफ्त में फंस रही है।

तंबाकू और शराब के बाद फार्मास्यूटिकल ओपिओइड तेजी से बढ़ रहे हैं। कैनबिस और इनहेलेंट स्कूलों और कॉलेजों में जगह बना चुके हैं। 2019 के राष्ट्रीय सर्वेक्षण में देश में 3.1 करोड़ कैनबिस उपभोक्ताओं का अनुमान लगाया गया था, और पिछले दो दशकों में ओपिओइड उपयोग में खतरनाक उछाल दर्ज हुआ। यह केवल आंकड़े नहीं; यह उन घरों की खामोशी है, जहां माता-पिता को देर से पता चलता है कि उनका बच्चा बदल चुका है।

कैंपस इस संकट के सबसे संवेदनशील केंद्र बन गए हैं। प्रतिस्पर्धा का दबाव, बेरोजगारी की आशंका, सोशल मीडिया की चकाचौंध और साथियों का प्रभाव, सब मिलकर युवाओं को ‘एक बार आज़माने’ की ओर धकेलते हैं। महंगे निजी संस्थानों में संसाधनों की उपलब्धता इसे आसान बनाती है, लेकिन यह समस्या केवल अमीर तबके तक सीमित नहीं। छोटे शहरों और सरकारी स्कूलों में भी नशा उतनी ही तेजी से पैर पसार रहा है।

गोवा की स्थिति एक चेतावनी है। पर्यटन की चमक के पीछे 2025 में 78 करोड़ रुपये के नशीले पदार्थ जब्त किए गए और 206 गिरफ्तारियां हुईं, जिनमें 32 विदेशी शामिल थे। जब्ती की कीमत में 700 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई। एक नामी इंजीनियरिंग संस्थान के गोवा परिसर में छात्रों की संदिग्ध मौतों ने यह संकेत दिया कि फेंटेनाइल और एलएसडी जैसे सिंथेटिक ड्रग्स अकादमिक दीवारों के भीतर तक पहुंच चुके हैं।

एक और बदलाव चुपचाप हो रहा है। नशे का चेहरा अब केवल लड़कों तक सीमित नहीं रहा है। हालिया अध्ययनों में युवतियों में फार्मास्यूटिकल ओपिओइड और इनहेलेंट का उपयोग बढ़ता दिखा है। तनाव, अवसाद, रिश्तों का दबाव और आत्मछवि की उलझनें कई लड़कियों को गुपचुप दवाइयों की ओर धकेल रही हैं। सामाजिक बदनामी के डर से आंकड़े अधूरे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत संगीन है।

वेपिंग और हुक्का इस संकट के नए प्रवेश द्वार बन चुके हैं। आकर्षक डिजाइन और फ्लेवर के नाम पर वेपिंग को ‘सुरक्षित विकल्प’ की तरह बेचा जाता है, जबकि किशोरों में इसका प्रयोग चिंताजनक स्तर पर है। प्रतिबंधों के बावजूद ई-सिगरेट स्कूलों और कॉलेजों तक पहुंच रही हैं। हुक्का बार सामाजिक मेलजोल की आड़ में निकोटिन से आगे के पदार्थों तक रास्ता खोल देते हैं।

सबसे खतरनाक पहलू है आपूर्ति तंत्र का पेशेवर और औद्योगिक रूप लेना। जनवरी 2026 में मैसूर के हेब्बल औद्योगिक क्षेत्र में एक गुप्त ड्रग निर्माण इकाई पकड़ी गई; करीब 10 करोड़ रुपये के नशीले पदार्थ, भारी मात्रा में प्रीकर्सर केमिकल और नकदी बरामद हुई। यह इकाई 2024 से सक्रिय थी। इससे पहले, महाराष्ट्र में भी ऐसी फैक्ट्री का खुलासा हुआ। सांस्कृतिक और शैक्षणिक पहचान वाले शहर अब सिंथेटिक नशे के उत्पादन केंद्र बनते जा रहे हैं। इसके दुष्परिणाम दूरगामी हैं; गिरते अंक, कॉलेज छोड़ना, मानसिक असंतुलन, छोटे अपराध और कभी-कभी सनसनीखेज मौतें।

भारत अपनी युवा आबादी पर गर्व करता है। हम इसे ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ कहते हैं। लेकिन, अगर यही युवा नशे के दलदल में धंसते गए, तो यह लाभांश एक राष्ट्रीय त्रासदी में बदल सकता है।

समाधान केवल पुलिसिया कार्रवाई नहीं है। कैंपस में अनिवार्य काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, माता-पिता और बच्चों के बीच खुला संवाद, और स्कूल स्तर पर सतत जागरूकता अभियान अनिवार्य होने चाहिए। नशे को केवल अपराध नहीं, एक सामाजिक बीमारी की तरह समझना होगा। आज मैसूर की प्रयोगशालाएं और गोवा के तट हमें हकीकत दिखा रहे हैं।

सवाल अब भी वही है; क्या हम जागेंगे, या अगली पीढ़ी को भी यूं ही धुएं में उड़ता देखते रहेंगे…!



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