टाइम मशीन में बैठकर लौटते हैं पौराणिक काल में और देखते हैं, गोकुल में यमुना किनारे फैला एक हरा-भरा वन। ऊंचे-ऊंचे वृक्षों की छांव में मोर पंख फैलाए नाच रहे हैं, रंग-बिरंगी तितलियां हवा में रेशमी नक़्श बनाती उड़ रही हैं, गायें शांति से चर रही हैं, हिरण चौकड़ी भरते दौड़ रहे हैं। कदंब के पेड़ तले श्रीकृष्ण अपनी बांसुरी की मधुर तान छेड़ते हैं और गोपियां मानो किसी रूहानी जादू में डूबी झूम उठती हैं। पूरा ब्रज जैसे संगीत, प्रकृति और भक्ति का एक जीवंत स्वर्ग हो...
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