डोनाल्ड ट्रंप को इतिहास में कभी कोई महान जनरल नहीं मानेगा। लेकिन, जंग की व्याकरण बदलने वालों में उनका नाम जरूर दर्ज होगा। उन्होंने बता दिया है कि अब लड़ाई के लिए बंदूक ज़रूरी नहीं है। न रणभूमि, न धुएं से भरा आसमान, बस टैरिफ़, ट्वीट, धमकी और तमाशा…
यूएन का पुराना इंटरनेशनल ऑर्डर, जिसे नियम, संस्थाएं और नैतिकता चलाती थीं, अब म्यूज़ियम का ‘शोपीस’ हैं। टाइपराइटर, फैक्स मशीन और शीतयुद्ध की यादों के साथ...। Read in English: Trump, Tariffs and the new Grammar of invisible warfare
आज की जंग बॉर्डर पर नहीं, बैलेंस शीट पर लड़ी जाती है। बाज़ार अब मिसाइल हैं। टैरिफ़ टैंक बन चुके हैं। एक ट्वीट पूरी बटालियन का काम कर देता है। कोई लाश नहीं गिरती, इसलिए संसद में बहस नहीं होती। कोई बम नहीं फटता, इसलिए नैतिक उपदेश भी नहीं।
जंग सस्ती है, इनकार करने लायक है, लेकिन बेहद कातिल। यूरोप बूढ़ा हो रहा है। बच्चे कम हैं, पेंशन ज़्यादा। वोटर ताबूत से डरता है, डेफिसिट से नहीं। इसलिए जंग भी ऐसी चाहिए, जिसमें शव न लौटें।
टेक्नोलॉजी ने यह सुविधा दे दी है कि दूर से मारो, स्क्रीन के पीछे छुपकर। साइबर, फाइनेंशियल, इकोनॉमिक, सब कुछ सर्जिकल।
ज़मीन क्यों कब्ज़ाओ, जब बैंक अकाउंट खाली किए जा सकते हों? नए हथियार चुप हैं, लेकिन खतरनाक। तेल, रेयर अर्थ, क्रिटिकल मिनरल, सोना-चांदी, अब ये जमीनी इलाके जितने ही अहम हो चुके हैं। समंदर के रास्ते रोक दो, सप्लाई चेन दम तोड़ देगी। टैरिफ़ अब नीति नहीं, सज़ा है।
शेयर बाज़ार हिलाओ, करेंसी डगमगाओ, कैपिटल फ्लो रोक दो, जंग की आवाज़ अब की-बोर्ड की क्लिक है। अंधेरा यहीं से शुरू होता है। साइबर आतंक। डिजिटल जासूसी। डेटा चोरी। ट्रोल आर्मी ने टैंक बटालियन को पीछे छोड़ दिया है। इन्फ्लुएंसर अब जासूस का काम करते हैं। एनजीओ, एक्टिविस्ट, ओपिनियन मेकर, कुछ ईमानदार, ज़्यादातर किराए के...।
समाज को बम से नहीं, फॉल्ट लाइन और अंदरूनी दरारों से तोड़ा जाता है। धर्म इधर, जाति उधर, भाषा कहीं और सौ फॉल्ट लाइन, सौ फ्यूज़। पैसा भी लड़ता है। ताकतवर के पेशाब में जहरीला तेजाब होता है! हवाला, टैक्स हेवन, शेल कंपनियां। ज़मीन के नीचे जुर्म और जंग को सींचती हुईं नदियां बहती हैं।
पब्लिक हेल्थ भी हथियार बन चुकी है। वायरस, वैक्सीन, पेटेंट, अफ़रा-तफ़री और नशा पूरी नस्ल को खोखला कर रहा है। अंदर से खाली देश को गेट पर दुश्मन की ज़रूरत नहीं होती। भारत के लिए यह थ्योरी नहीं बल्कि रोज़मर्रा की हक़ीक़त है।
तेज़ी से बढ़ती इकोनॉमी, लेकिन तेल आयात पर टिकी मजबूरी। इसके लिए हॉर्मुज़ से मलक्का तक समंदर खुले रहने चाहिए। इंडो-पैसिफिक में एक झटका, और रिफाइनरियां कांप उठें। डिजिटल छलांग वरदान है, लेकिन कमज़ोर पापी पेट का भी सवाल है। साइबर अटैक, फेक न्यूज़, डीपफेक...। दिमाग की जंग बॉर्डर से ज़्यादा खतरनाक बनती जा रही है।
हमारा खुला, शोर मचाने वाला, बहुलतावादी लोकतंत्र हमारी शान और शक्ति है, लेकिन नैरेटिव वॉर के लिए परफेक्ट प्लेग्राउंड भी...। अफ़वाह रॉकेट से तेज़ दौड़ती है। एक वायरल क्लिप वह कर देती है जो बम नहीं कर पाता है, पड़ोसी को दुश्मन बना देती है।
पड़ोस मुश्किल है। बॉर्डर ज़िंदा हैं। एशिया में बड़ी ताक़तें कंधे भिड़ा रही हैं। इकोनॉमिक, डिजिटल, साइकोलॉजिकल, डिप्लोमैटिक, सब फ्रंट एक साथ खुले हुए हैं। कौन जाने क्या होगा आगे!
ऊपर से अमन, स्क्रीन पर ग्राफ़ चीख़ रहे हैं। जंग चालू है। फिर भी, भारत सोया नहीं है। स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व बढ़ रहे हैं। सप्लाई चेन चीन से दूर सरक रही है। साइबर सिक्योरिटी और डेटा अब सेमिनार की बात नहीं, ये राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले हैं।
मोदी सरकार ने हवाला, टैक्स हेवन, शेल कंपनियों पर शिकंजा कसा है। उधर, डिप्लोमेसी शतरंज खेल रही है, वॉशिंगटन से बात, मॉस्को से बात, ग्लोबल साउथ से गले मिलना, खरगोश और शिकारी कुत्ते साथ-साथ डांस कर रहे हैं। और दुश्मन के दरवाज़े भी आधे खुले हुए हैं!
सबसे बड़ा सबक साफ़ है। संप्रभुता अब सिर्फ़ नक्शे की लकीर नहीं है। संप्रभुता है रेज़िलियंस। आत्म निर्भरता, मजबूत फंडामेंटल। ठोस इकोनॉमी। भरोसेमंद संस्थाएं।
कहानी पर कंट्रोल। समाज में एकता। यही नई बंकर हैं, नई चौकियां। इनके बिना सबसे मज़बूत फौज भी रेत पर खड़ी दिखती है। आने वाली जंग कभी घोषित नहीं होगी। न सायरन बजेगा, न सरेंडर होगा, न विजय परेड निकलेगी। सिर्फ घबराए बाज़ार, बंटे समाज और चुपके-चुपके हार...।
ट्रंप ने यह दुनिया नहीं बनाई। उन्होंने बस नक़ाब उतारा है! और टूलकिट दिखा दी। मैदान अब ज़मीन से लेज़र पर आ चुका है। ट्रेंच से टाइमलाइन तक। जो यह नहीं समझेगा, वह जंग हार जाएगा, और उसे पता भी नहीं चलेगा कि जंग कब शुरू हुई थी।






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