क्या छोटी नदियों और धाराओं को यूं ही मरने दिया जाएगा...!


क्या भारत की हजारों छोटी नदियों को अपनी पहचान खोकर कूड़े के नीचे दब जाने, सीवर में बदल जाने या अतिक्रमण की चादर ओढ़ लेने दिया जाएगा? यह सवाल अब केवल पर्यावरणविदों का ही नहीं रहा, बल्कि देश के भविष्य, जल-सुरक्षा और सभ्यतागत अस्तित्व का भी बन चुका है।

आज भारत में नदी संरक्षण की पूरी बहस कुछ गिनी चुनी बड़ी नदियों, गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, के इर्द–गिर्द सिमट गई है। योजनाएं, बजट, मिशन और भाषण इन्हीं नामों पर केंद्रित हैं। लेकिन, सवाल यह है कि हज़ारों छोटी नदियों, सहायक धाराओं और मौसमी धाराओं का क्या होगा, जिन पर इन बड़ी नदियों का जीवन टिका है? क्या वे केवल इसलिए मरने के लिए अभिशप्त हैं क्योंकि वे किसी ‘मेगा प्रोजेक्ट’ का हिस्सा नहीं बन सकती हैं?

Read in English: Should India's small rivers and streams be left to die?

यह महज़ एक तस्वीर या अख़बारी कतरन नहीं, बल्कि भारत की छोटी नदियों के धीमे लेकिन सुनियोजित क़त्ल का दस्तावेज़ है। ज़मीनी सच्चाई यह है कि जिन छोटी नदियों और धाराओं से बड़ी नदियां पोषित होती हैं, वे या तो अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुकी हैं या कूड़े और सीवर की नालियों में तब्दील कर दी गई हैं। पानी नाममात्र का, जीवन लगभग शून्य।

आगरा ज़िला इस राष्ट्रीय विफलता का एक स्पष्ट उदाहरण है। यमुना की सहायक नदियां, उतंगन, करबना, खारी सहित छह, सात छोटी धाराएं, कभी इस क्षेत्र की जीवनरेखा थीं। आज ये नदियां सूखी रेखाओं में बदलती जा रही हैं। कहीं इनके पेट में ठोस कचरा दफन है, कहीं इनके किनारों पर खेत और अवैध कॉलोनियां उग आई हैं, और कहीं नगर निकायों ने इन्हें ‘ड्रेनेज लाइन’ मानकर छोड़ दिया है। इनके पुनर्जीवन की मांग वर्षों से उठ रही है, लेकिन प्रशासनिक संवेदनशीलता फ़ाइलों के बोझ तले दम तोड़ देती है।

विडंबना यह है कि प्रकृति बार–बार अवसर देती है, लेकिन हम हर बार उसे गंवा देते हैं। पिछली अगस्त  की भारी बारिश और यमुना बेसिन में आई बाढ़ ने साबित कर दिया कि ये नदियां आज भी ज़िंदा हो सकती हैं। आगरा सिविल सोसाइटी की रिपोर्टें बताती हैं कि राजस्थान की पहाड़ियों से निकलने वाली ये धाराएं कभी पूरे ब्रज क्षेत्र को हरा–भरा रखती थीं। अंग्रेज़ों के दौर में बनी सिंचाई संरचनाएं बांध, नहरें, मोरियां, एक सुव्यवस्थित जल–प्रणाली का हिस्सा थीं। आज वे खंडहर हैं, क्योंकि आज़ादी के बाद की सरकारों ने उन्हें मरने दिया।

आगरा के पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कुछ व्यावहारिक समाधान सुझाए हैं। उतंगन–यमुना संगम, रेहावली व फतेहाबाद, के पास दोतरफ़ा चेक डैम बनाने का प्रस्ताव कोई कल्पना नहीं, बल्कि अनुभव पर आधारित मांग है। यमुना में उफान या बाढ़ की स्थिति में पानी उल्टा बहकर उतंगन में करीब 13 फ़ुट गहराई के साथ लगभग 20 किलोमीटर तक चला जाता है। यह प्रक्रिया मानसून में कम से कम चार बार होती है। लेकिन, इस अमूल्य पानी को रोकने, सहेजने और इस्तेमाल करने की कोई व्यवस्था नहीं है।

यदि इस पानी को संरक्षित किया जाए, तो इसके लाभ दूरगामी हैं। लगभग 35 किलोमीटर के क्षेत्र में भूजल रिचार्ज हो सकता है, सिंचाई को नया जीवन मिल सकता है और पेयजल संकट से राहत मिल सकती है। ताजगंज और फतेहाबाद रोड के सैकड़ों होटल, जो आज धड़ल्ले से भूजल दोहन कर रहे हैं, उन्हें सतही जल उपलब्ध कराया जा सकता है। फ़तेहाबाद, शमशाबाद, किरावली जैसे कस्बों की प्यास बुझ सकती है। बटेश्वर जैसे धार्मिक स्थलों को त्योहारों के दौरान पानी मिल सकता है। लेकिन ये सारे तर्क, आंकड़े और प्रस्ताव काग़ज़ों से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।

पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं, "सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि भारत के पास आज भी छोटी नदियों के लिए कोई समग्र राष्ट्रीय नदी नीति नहीं है। राज्य सरकारें इन्हें प्राथमिकता मानने को तैयार नहीं है। संरक्षण की ज़िम्मेदारी कई विभागों में बंटी हुई है, लेकिन जवाबदेही किसी की नहीं है। आगरा में कभी बनी रिवर पुलिस का आज कोई अता–पता नहीं, न अतिक्रमण रोकती दिखती है, न प्रदूषण।"

रिवर कनेक्ट कैंपेन का मानना है कि नदियां केवल जलधाराएं नहीं होती हैं बल्कि वे हमारी सभ्यता, संस्कृति, मिथक और सामूहिक स्मृति का हिस्सा हैं। उन्हें नालों में बदल देना केवल पर्यावरणीय अपराध नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्महत्या है। जब छोटी नदियां मरती हैं, तो बड़ी नदियां भी बीमार पड़ती हैं। भूजल गिरता है, बाढ़ और सूखा दोनों बढ़ते हैं, और समाज असंतुलन की ओर बढ़ता है।"

आज भी समय है; लेकिन केवल तभी, जब सरकारें इच्छाशक्ति दिखाएं, छोटी नदियों को योजनाओं के हाशिये से निकालें और उन्हें जीवन–तंत्र मानकर पुनर्जीवित करें। नहीं तो इतिहास यही लिखेगा कि हमने नदियों को बचाने का अवसर पाया था; और हमने उसे उदासीनता के साथ बह जाने दिया।



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