बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

18 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने एक खामोश लेकिन बोल्ड फैसले में, वह दरवाज़ा फिर खोल दिया जिसे उसने पहले पूरी ताक़त से बंद कर दिया था। जो काम पहले ग़ैर-क़ानूनी कहा गया था, उसे अब अपवाद बना दिया गया है। असल में कोर्ट ने सिर्फ़ क़ानून की व्याख्या नहीं बदली, उसने जवाबदेही का मायना बदल दिया। एक मुल्क जहां हवा ज़हरीली, नदियां बीमार और जंगल ग़ायब हो रहे हों, वहां यह फैसला क़ानूनी उलझन नहीं बल्कि एक खतरे का संकेत हो सकता है।

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आगरा की हवा में आज सिर्फ़ धूल ही नहीं बल्कि एक सुलगता हुआ सवाल भी घुला हुआ है। क्या जीवनयापन की ज़रूरत, जीवन की गुणवत्ता से ऊपर है? एक तरफ़ वे आवाज़ें हैं जो चीख़-चीख़ कर कहती हैं कि "बिना उद्योग के पेट नहीं भरता।" दूसरी ओर वे चिंतित फुसफुसाहटें जो कहती हैं कि "बिना ताज के पहचान मिट जाएगी।" यह टकराव अब सुप्रीम कोर्ट की शानदार इमारत तक पहुंच चुका है, जहां तर्कों की तलवारें भिड़ रही हैं। और, इन सबके बीच, ताज महल मौन, सफ़ेद पत्थर का एक विशाल सवाल बनकर खड़ा है, जिसका जवाब आगरा की धूल-धूसरित हवा में तैर रहा है...

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जब बिहार जैसे राज्यों में हाल के विधानसभा चुनावों में रोज़गार, पलायन और गांवों की जिंदगी बड़े मुद्दे बनकर उभरे, तो यह साफ़ दिखा कि मनरेगा जैसी योजनाएं सिर्फ विकास-रिपोर्ट का हिस्सा नहीं रहीं, बल्कि राजनीतिक बहस की धुरी भी बन गई हैं। राज्य की दो-तिहाई से अधिक घरों पर बाहरी मज़दूरी का निर्भरता होने के बावजूद, पलायन को रोकने वाली नीतियां मतदाताओं की प्राथमिकता बनीं। जो दल गांव की ज़मीन से कटे दिखते हैं, उन्हें नतीजों में उसकी कीमत चुकानी पड़ती है, जबकि रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा की ठोस बात करने वाली राजनीति को नया सहारा मिलता है।

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पश्चिमी दुनिया की राजनीति एक रंगमंच बन चुकी है, जहां लोकतंत्र का मुखौटा पहनकर साम्राज्यवाद का नंगा नाच होता है। मानवाधिकारों की दुहाई देने वाले खुद युद्ध के सौदागर हैं। कहते हैं शांति, करते हैं तबाही, और परिणाम होता है एक डील, फायदे का सौदा। क्या यही है सभ्यता का पश्चिमी मॉडल — झूठ, छल और पाखंड का गठबंधन…?

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हाल ही में दक्षिण भारत के एक शहर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरु सम्मान कार्यक्रम में भाग लेने का मौका मिला। बड़ी संख्या में डॉक्टर, व्यापारी, प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा हिन्दू संस्कृति, गौरव और राष्ट्र के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन उत्साहित कर रहा था।

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मध्य प्रदेश के एक व्यापारी परिवार के सदस्य के इलाज में इतना खर्च हो गया कि सदमे से उसकी मौत हो गई। ऐसे तमाम खौफनाक किस्से, डॉक्टर, हॉस्पिटल, लेबोरेटरीज की जांचों में घोटालों की लंबी लिस्ट हमारे सामने मौजूद हैं...

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