बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

भारत-पाक तनाव की धधकती पृष्ठभूमि में, पश्चिमी देशों की भारत-विरोधी मानसिकता अब कूटनीतिक मतभेद से कहीं आगे, न्याय और तर्क के साथ सरासर विश्वासघात में तब्दील हो गई है। एक जीवंत लोकतंत्र और दशकों से आतंकवाद का शिकार रहे भारत को पाकिस्तान जैसे राष्ट्र के समकक्ष खड़ा करना – जिसका इतिहास जिहादी तत्वों को पोषित करने का रहा है – एक घोर अन्याय है। यह तटस्थता नहीं, बल्कि शक्ति, पूर्वाग्रह और भारत के तेजी से बढ़ते कद को लेकर पश्चिम की बेचैनी का स्पष्ट प्रदर्शन है...

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सुप्रीम कोर्ट की सख़्त टिप्पणी और एनजीटी की चेतावनियां अब वक़्त की पुकार हैं। हरे-भरे पेड़ों की कटाई पर नकेल कसना ज़रूरी हो गया है। शहरों के सीने में धड़कते ये पेड़ अब कंक्रीट की हवस के शिकार हो रहे हैं। वृंदावन, आगरा, हैदराबाद और मैसूर जैसे ऐतिहासिक शहरों में, जहां हरियाली कभी इबादत थी, आज वही पेड़ इंसानी लालच की ज़द में हैं...

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भारत और पाकिस्तान की सीमाओं पर हाल ही में हुआ तथाकथित ‘युद्धविराम’ दक्षिण एशिया की राजनीति में एक महत्वपूर्ण क्षण है, जो शांति, व्यावहारिकता और समझदारी की जीत का प्रतीक है...

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भारत ने आज़ादी के बाद अपने इतिहास में कई महत्वपूर्ण अवसरों को गंवाकर आर्थिक मोर्चे पर भारी कीमत चुकाई है। इसका बड़ा कारण रहा कांग्रेस पार्टी की गांधीवादी विचारधारा के प्रति एक दिखावटी प्रतिबद्धता, जिसने बार-बार लघु, सूक्ष्म और कुटीर उद्योगों को प्राथमिकता दी, इस उम्मीद में कि इससे गांवों की अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ...

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अंदाज लगाइए दस हजार वर्ष पूर्व गुफा से बाहर निकले आदि मानव ने सर्व प्रथम किस इंसानी जिस्म के अंग को ढका होगा और क्यों?

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भारत आज एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहां यह सिर्फ सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता, संस्कृति और भविष्य की लड़ाई लड़ रहा है। यह संघर्ष केवल आतंकवाद के खिलाफ नहीं, बल्कि उस मध्ययुगीन मानसिकता के विरुद्ध है, जो मानवता को गुलाम बनाना चाहती है। यह जंग है—आधुनिकता बनाम बर्बरता, प्रगति बनाम पिछड़ापन, एकता बनाम टुकड़ों में बंटी सोच...

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