बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

जब भारत चारों ओर से असहज और शत्रुतापूर्ण पड़ोसियों से घिरा है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या छोटे, संसाधनहीन राष्ट्रों का कोई भविष्य बचा है? या वे हमेशा के लिए वैश्विक ‘बास्केट केस’ बनकर रह जाएंगे। खासकर, वे देश जो गरीबी, राजनीतिक अस्थिरता और बाहरी सहायता पर निर्भरता के दुष्चक्र में फंसे हुए हैं, और कट्टरवाद के टापू बने हुए हैं...

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22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में जो हुआ, वह सिर्फ आतंकवाद नहीं था, बल्कि भारत की आत्मा पर एक सोची-समझी चोट थी...

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क्या आपने कभी सोचा है कि हम कब से चीज़ों को सुधारने के बजाय फेंकना ज़्यादा पसंद करने लगे हैं? एक ज़माना था जब एक टूटी कुर्सी को ठीक किया जाता था, फटे कपड़ों को सिला जाता था और रिश्तों की डोर को गांठ लगाकर मज़बूत किया जाता था। लेकिन, आज की भागदौड़ भरी आधुनिक ज़िंदगी में 'यूज़ एंड थ्रो', यानी इस्तेमाल करो और फेंको, की मानसिकता सिर्फ़ बाज़ार के सामान तक सीमित नहीं रही, बल्कि ये हमारे पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों में भी गहरी पैठ बना चुकी है।

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एक जमाने में आगरा की गिनती विकसित औद्योगिक क्षेत्र के रूप में होती थी। यहां के कारखानों की गूंज देश-विदेशों में होती थी। लाखों लोग रोजगार पाते थे। हुनर और कौशल की पूजा होती थी। फिर 1993 में एक भूचाल आया। ताज महल को प्रदूषण से बचाने को सुप्रीम कोर्ट ने दखल दी और उद्योगों पर तमाम बंदिशें लगा दीं। पचास लाख की आबादी वाले इस शहर में, पिछले तीन दशकों में औद्योगिक विकास के नाम पर शून्य काम हुआ है। तसल्ली होती अगर शहर हर-भरा और प्रदूषणमुक्त हो गया होता, लेकिन वही ढाक के तीन पात, यानी माया मिली न राम…!

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उम्रदराज होना, बाल सफेद होना, कोई अभिशाप नहीं बल्कि तजुर्बे से मिला एक विशेषाधिकार है। आजकल युवा वर्ग बुजुर्गों को गरिया रहा है, बेघर कर रहा है, अमानवीय व्यवहार कर रहा है, यह भूलकर कि जो पैदा हुआ है वह स्वर्गवासी होने से पहले इस दयनीय अवस्था से जरूर गुजरेगा।

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अगर भारत ने पाकिस्तान पर अपनी पूरी परमाणु क्षमता का इस्तेमाल करके खुली जंग छेड़ी, तो इसके नतीजे केवल पाकिस्तान के लिए नहीं बल्कि इस पूरे क्षेत्र व पूरी दुनिया के लिए क़यामत से कम नहीं होंगे...

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