बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

पता नहीं आइपीएस अधिकारियों को ट्रेनिंग के दौरान भीड़ प्रबंधन पढ़ाया जाता है या नहीं, लेकिन बेंगलुरु जैसे हाईटेक सिटी में भगदड़ से हुई मौतों को लेकर पुलिस की कार्यप्रणाली पर कुछ सवाल उठना जायज़ ही नहीं समय की मांग हैं।

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भारत का इतिहास स्थिरता, समृद्धि और वैश्विक प्रभाव के लिए वाणिज्य की शक्ति का एक जीता-जागता सबूत है। प्राचीन व्यापार मार्गों से लेकर आधुनिक आर्थिक सुधारों तक, देश की उद्यमशीलता की भावना ने लगातार आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया है और सभी महाद्वीपों में उच्च-जोखिम वाले रिश्ते बनाए हैं...

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कभी लोकतंत्र का सशक्त चौथा स्तंभ कहलाने वाली पत्रकारिता, आज जनसंपर्क के शोरगुल, कॉर्पोरेट संदेशों की मिलावट और झूठी खबरों के दलदल में हांफ रही है। यह क्षरण उस स्थानीय पत्रकारिता में और भी गहरा है, जहां गांवों की अनकही पीड़ा, पर्यावरण की चीख और हाशिए पर धकेले गए समुदायों की आवाजें स्पष्ट और संवेदनशील रूप से गूंजनी चाहिए थीं।

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भारत समेत कई देशों में ट्रेड यूनियनों की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में वर्तमान में 16,000 से अधिक पंजीकृत ट्रेड यूनियनें हैं, जिनमें से केवल 12 राष्ट्रीय स्तर की यूनियनें हैं। यह संख्या पिछले एक दशक में 20 फीसदी कम हुई है, जबकि देश का कार्यबल 50 करोड़ से अधिक हो चुका है।  

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आगरा की सड़कों और फुटपाथों पर बढ़ते अतिक्रमण ने शहर के बुनियादी ढांचे को अस्त-व्यस्त कर दिया है। सदर बजार से लेकर बेलनगंज, हॉस्पिटल रोड और पालीवाल पार्क तक, सड़क विक्रेताओं और फेरीवालों ने फुटपाथों पर कब्जा कर लिया है। इससे पैदल चलने वालों को व्यस्त सड़कों पर चलने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है...

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आगरा के नियोजित विकास के लिए दीर्घकालीन सोच, नीतियां और कार्य योजनाएं बनाने की जिम्मेदारी सिर्फ प्रशासन की ही नहीं है। इस कार्य को अंजाम देने के लिए स्थानीय स्तर पर निर्वाचित सांसदों, विधायकों और पार्षदों के बीच नियमित संवाद अनिवार्य है...

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