बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

डोनाल्ड ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीतियों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक ज़लज़ला ला दिया है। अर्थशास्त्री ‘ग्लोबल साउथ’ पर इसके विनाशकारी प्रभावों की चेतावनी दे रहे हैं। भारत जैसे देश, जो अभी-अभी आर्थिक विकास की राह पर चले ही थे कि अब वे इस तूफ़ान की चपेट में आ रहे हैं। क्या धमकियों और लेन-देन पर आधारित विदेश नीति से अमन कायम हो सकता है? यह सवाल दुनियाभर के नेताओं के ज़ेहन में अब गूंज रहा है।

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पिछले दो दशकों में हमने एक पूरी जमात को गुम होते देखा है। वह जमात जो हमें हंसाती थी, गुदगुदाती थी, और सोचने पर मजबूर करती थी। व्यंग्यकार, कार्टूनिस्ट, और हास्य के बादशाह अब धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं...

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क्या बहुजन समाज पार्टी का विलय कांग्रेस में हो जाना चाहिए या फिर मायावती को भाजपा के एनडीए से जुड़ जाना चाहिए? क्या छोटी-छोटी क्षेत्रीय पार्टियों का कोई भविष्य है? क्या वोट-काटवा पार्टियों के चुनावी गठबंधन, तेज ध्रुवीकरण के चलते, कभी भाजपा को सत्ता से बाहर करने की हैसियत रखते हैं? पिछले कई चुनावों के परिणामों के संदर्भ में ये सवाल आज प्रासंगिक हो गए हैं।

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भारतीय राजनीति का नक्शा बदल देने वाले दो सबसे बड़े 'कारक' हैं – जातिवाद और सांप्रदायिकता। ये दोनों ही कारक चुनावी रणनीतियों से लेकर शासन तक, हर पहलू को प्रभावित करते हैं। साल 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की तैयारियों में यह साफ दिख रहा है...

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हिंदुस्तान के किसी भी शहर में तशरीफ ले जाएं, यकीनन आपको हर जगह दीवारों पर पेंटिंग्स, पृष्ठभूमि में "आई लव..." होर्डिंग के साथ सेल्फी पॉइंट और निश्चित रूप से सार्वजनिक शौचालयों के बाहर महात्मा गांधी के चश्मे दिखाई देंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 के स्वच्छ भारत मिशन के ये प्रतीक स्वच्छ भारत की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम का प्रतिनिधित्व करते हैं।

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श्रीकृष्ण और राधा की कथाओं से जुड़े अपने पवित्र परिदृश्यों के लिए पूजनीय समूचा चौरासी कोस का बृज मंडल क्षेत्र, अनियोजित निर्माण के उन्माद से तेजी से पर्यावरणीय क्षरण देख रहा है...

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