बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

आगरा दुनियाभर में ताज महल की बेमिसाल ख़ूबसूरती के लिए जाना जाता है। रोज़ हज़ारों सैलानी संगमरमर में तराशी मोहब्बत का दीदार करने आते हैं। लेकिन, पर्यटकों की चहल-पहल से ज़रा हटकर, एक और कारोबार चुपचाप फल-फूल रहा है; नर्सिंग होम, डायग्नोस्टिक लैब, निजी अस्पताल और दवा मार्केट नेटवर्क...

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आगरा कैंट रेलवे स्टेशन के आसपास या यमुना किनारा रोड पर आपने छोटे-छोटे बच्चों को कबाड़ा प्लास्टिक बीनते जरूर देखा होगा। हर कुछ मिनट बाद वे कपड़े में भिगोया गया कोई केमिकल सूंघते हैं, जैसे वही उनकी भूख हो, वही उनका सुकून। शहर के नामी स्कूलों के इर्द-गिर्द ‘पुड़िया गैंग’ की फुसफुसाहटें हैं। शादी हो या बर्थडे पार्टी, बीयर और दारू अब रिवाज़ बन चुके हैं। कोई खांसी का सिरप गटक रहा है, कोई जर्दा, टिंक्चर या सुलोचन की बोतल। तन-बदन बेहाल, आंखें सूनी, दिमाग खिसका या भटका हुआ, नालियों और कूड़े के ढेरों में भविष्य तलाशती यह पीढ़ी आखिर किस दिशा में जा रही है?

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पिछले दिनों, नई दिल्ली में एआई शिखर सम्मेलन की चकाचौंध रही। दुनियाभर के विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और टेक कंपनियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भविष्य पर मंथन किया। मंच पर ‘डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन’ की बातें हुईं। ऐप्प, क्लाउड और स्मार्ट प्लेटफॉर्म की चर्चा हुई। लेकिन, इसी डिजिटल उछाल के साथ एक नया संकट भी लगातार गहरा रहा है। हर नई तकनीक, हर अपग्रेड, हर नया डिवाइस… पीछे छोड़ जाता है, ई-कचरे का एक और ढेर।

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भारत में नृत्य महज मनोरंजन का साधन नहीं रहा है, बल्कि यह आत्मा की ज़बान भी रहा है। मंदिरों की देहरी से लेकर राजदरबारों तक, गांव की चौपाल से लेकर बड़े रंगमंच तक, नृत्य ने भाव, राग और रस की परंपरा को ज़िंदा रखा है...

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रेगिस्तान की ख़ामोशी हो या आसमान की चमकती रोशनी, इंसान सदियों से यह सवाल पूछता आया है कि क्या हम इस कायनात में अकेले हैं...

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नक्सलवाद की बारूद भरी राह पुलिस की गोली से रुकी या विकास की रोशनी से? सच शायद इन दोनों के बीच में कहीं खड़ा है...

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