चमकते एक्सप्रेसवे और जर्जर होता इंसाफ़...


एक तरफ़ देश में एक्सप्रेसवे, मेट्रो, एयरपोर्ट और डिजिटल क्रांति की नई इबारत लिखी जा रही है। दूसरी तरफ़ समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी सदियों पुराने पूर्वाग्रहों और सामंती सोच की जंजीरों में जकड़ा हुआ है।

ओडिशा में दलितों को अपमानित कर सिर मुंडवाने, घुटनों के बल चलने और गंदा पानी पीने पर मजबूर किया जाता है। झारखंड में अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं को ‘डायन’ बताकर मार दिया जाता है, जिनमें अक्सर जमीन हड़पने की साज़िशें छिपी होती हैं। उत्तर प्रदेश में अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाह करने वाले युवाओं को ऑनर किलिंग का शिकार होना पड़ता है। दहेज के दानव ने आज भी घरों को नहीं छोड़ा है और लगभग हर दिन दर्जनों महिलाएं इसकी भेंट चढ़ जाती हैं।

औपनिवेशिक दौर की लालफीताशाही अब भी आम नागरिक का रास्ता रोकती है। राजनीति और कारोबार में परिवारवाद तथा जातिगत नेटवर्क सत्ता और अवसरों पर अपना शिकंजा बनाए हुए हैं। कानून बदल गए, इमारतें बदल गईं, तकनीक बदल गई, लेकिन मानसिकता बदलने की रफ़्तार बेहद धीमी रही।

यही भारत का सबसे बड़ा विरोधाभास है। देश का हार्डवेयर इक्कीसवीं सदी में पहुंच चुका है, लेकिन उसका सामाजिक और प्रशासनिक सॉफ्टवेयर अब भी कई जगह उन्नीसवीं सदी के कोड पर चल रहा है। यही वह खाई है जो चमकते विकास और वास्तविक प्रगति के बीच मौजूद है।

क्या विकास का मतलब सिर्फ़ चौड़ी सड़कें हैं? क्या हवाई अड्डों की चमक किसी नागरिक को इंसाफ़ दिला सकती है? क्या बुलेट ट्रेन की रफ़्तार उस मुकदमे को तेज़ कर सकती है जो बीस साल से अदालत में धूल खा रहा है? और सबसे बड़ा सवाल। अगर थाना आज भी सत्ता के इशारे पर काम करे, अदालत में तारीख़ पर तारीख़ मिलती रहे और भ्रष्टाचार नए कपड़े पहनकर सामने खड़ा रहे, तो क्या हम सचमुच विकसित भारत की तरफ़ बढ़ रहे हैं?

पिछले बारह वर्षों में भारत का चेहरा बदला है। यह बात स्वीकार करनी होगी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र और भाजपा शासित राज्यों की तथाकथित ‘डबल इंजन’ सरकारों ने बुनियादी ढांचे के निर्माण में अभूतपूर्व गति दिखाई है।

साल 2014 में राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई लगभग 91 हजार किलोमीटर थी। आज यह डेढ़ लाख किलोमीटर के करीब पहुंच चुकी है। हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है। वंदे भारत ट्रेनें देश के कई हिस्सों को जोड़ रही हैं। यूपीआई ने भुगतान की दुनिया बदल दी है। करोड़ों लोगों तक सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे पहुंच रहा है। नए मेडिकल कॉलेज खुले हैं। गांवों तक नल का पानी पहुंचा है। लाखों घर बने हैं। ये उपलब्धियां वास्तविक हैं। इन्हें नकारना नाइंसाफी होगी। लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा कहीं अधिक अहम है।

देश का हार्डवेयर बदल गया है, मगर सॉफ्टवेयर आज भी पुराना है। नई सड़कें बन गईं, लेकिन पुरानी व्यवस्था जस की तस खड़ी है। कंक्रीट और इस्पात का ढांचा आधुनिक हो गया, मगर पुलिस, अदालतें, प्रशासनिक संस्कृति और जवाबदेही की व्यवस्था अब भी औपनिवेशिक दौर की परछाइयों में जी रही है।

साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह मामले में पुलिस सुधारों के लिए ऐतिहासिक निर्देश दिए थे। अदालत ने कहा था कि पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त किया जाए, अधिकारियों को निश्चित कार्यकाल मिले, स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण बने और जांच तथा कानून-व्यवस्था के काम अलग-अलग हों। बीस साल बीत गए। आज तक कोई भी राज्य इन निर्देशों को पूरी तरह लागू नहीं कर पाया।

कई राज्यों में पुलिस अब भी 1861 के उस कानून की मानसिकता के तहत काम कर रही है जिसे अंग्रेजों ने जनता की सेवा नहीं, बल्कि जनता को नियंत्रित करने के लिए बनाया था। कानून बदलना आसान है। व्यवस्था बदलना मुश्किल।

भारतीय न्याय संहिता और अन्य नए आपराधिक कानूनों ने पुराने आईपीसी और सीआरपीसी की जगह ले ली है। इनमें कई सकारात्मक बदलाव भी हैं। अपराध स्थल की वीडियोग्राफी, पीड़ितों के अधिकार और समयबद्ध प्रक्रियाओं जैसे प्रावधान स्वागत योग्य हैं। लेकिन सवाल फिर वही है। अगर कानून लागू करने वाला तंत्र पुराना ही रहे तो नया कानून कितना नया साबित होगा?

न्यायपालिका की हालत भी कम चिंताजनक नहीं है। देश की अदालतों में पांच करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट में ही नब्बे हजार से ज्यादा मामले प्रतीक्षा में हैं। अनेक हाईकोर्ट न्यायाधीश कमी के साथ काम कर रहे हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट में कई बार आधे से अधिक पद खाली रहे हैं। नतीजा यह है कि एक सामान्य नागरिक को संपत्ति विवाद जैसे मामलों में न्याय पाने के लिए दो दशक तक इंतजार करना पड़ सकता है। सोचिए। जिस देश में एक्सप्रेसवे दो साल में बन जाते हैं, वहां न्याय मिलने में बीस साल क्यों लगते हैं? कमी संसाधनों की नहीं दिखती। कमी प्राथमिकता की दिखती है।

भ्रष्टाचार के मोर्चे पर भी तस्वीर मिली-जुली है। डिजिटल व्यवस्था ने छोटे स्तर की रिश्वतखोरी में कमी जरूर की है। सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे खातों में पहुंचने लगा है। बिचौलियों की भूमिका घटी है। फिर भी अंतर्राष्ट्रीय सूचकांकों में भारत का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता पर सवाल बने हुए हैं। मुखबिरों की सुरक्षा कमजोर है। बड़े भ्रष्टाचार मामलों में सजा की दर बेहद कम है।

दूसरी ओर, वीआईपी संस्कृति अब भी जीवित है। काफिले दौड़ते हैं। सड़कें खाली कराई जाती हैं। प्रभावशाली लोगों के लिए नियम अलग दिखाई देते हैं। आम आदमी और खास आदमी के बीच की खाई अब भी पूरी तरह नहीं पटी है। जाति और लिंग आधारित भेदभाव भी कानून की किताबों से भले हट गए हों, लेकिन व्यवहारिक जीवन में उनकी मौजूदगी महसूस की जा सकती है।

राजनीति में भी तस्वीर बहुत अलग नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी भाषण खूब सुनाई देते हैं, लेकिन चुनावों में धनबल और बाहुबल का प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। यहीं सबसे बड़ा खतरा छिपा है।

जब हार्डवेयर तेज़ी से आगे बढ़े और सॉफ्टवेयर पीछे छूट जाए, तो विकास का भ्रम पैदा होता है। उपग्रह से देखने पर शहर चमक सकते हैं। रात में रोशन एक्सप्रेसवे किसी विदेशी पर्यटक को प्रभावित कर सकते हैं। कांच के टर्मिनल और आधुनिक रेलवे स्टेशन तस्वीरों में शानदार लग सकते हैं। लेकिन किसी राष्ट्र की असली परीक्षा उसकी सड़कों पर नहीं, उसके थानों और अदालतों में होती है।

एक ऐसा देश जहां नागरिक को निष्पक्ष पुलिस न मिले, समय पर न्याय न मिले और सत्ता को जवाबदेह ठहराने वाली संस्थाएं कमजोर हों, वह केवल दिखने में विकसित हो सकता है, वास्तव में नहीं।

2047 के विकसित भारत का सपना केवल बुलेट ट्रेनों, एयरपोर्टों और एक्सप्रेसवे से पूरा नहीं होगा। विकसित भारत तब बनेगा जब नागरिक को यह भरोसा होगा कि कानून सबके लिए बराबर है, पुलिस सत्ता की नहीं संविधान की सेवक है, और अदालत में इंसाफ़ उसकी उम्र से लंबा नहीं चलेगा।

सड़कें देश को जोड़ती हैं। लेकिन न्याय, जवाबदेही और समानता ही राष्ट्र को मजबूत बनाते हैं। यही वह बुनियाद है, जिसके बिना विकास की सबसे चमकदार इमारत भी खोखली साबित हो सकती है।



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