बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

अगर ताज महल एक सुबह खामोश हो जाए, तो क्या आगरा भी चुप पड़ जाएगा? जवाब है “नहीं”। तब शायद पहली बार यह शहर अपनी असली आवाज़ में बोलेगा, कारीगरों की हथौड़ी की टन-टन, बाजारों का मोल-भाव, हलवाइयों की कड़ाही की खुशबू और शायरों की नज़्मों के बीच। ताज महल आगरा का ताज है, लेकिन आगरा सिर्फ ताज नहीं, यह एक चलती-फिरती सभ्यता है...

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कभी जिसके तट पर बंसी बजी थी, आज वहीं सन्नाटा है। कभी जिसके जल में आस्था डुबकी लगाती थी, आज वही जल ज़हर बन चुका है। ब्रज मंडल की जीवनरेखा कही जाने वाली यमुना आज अपने अस्तित्व की जंग लड़ रही है। नदी नहीं, नाला दिखती है। पानी नहीं, काला, बदबूदार, झाग से भरा तरल बहता है। तस्वीरें चीख रही हैं। सच सामने है। सवाल सिर्फ एक है कि क्या हम सचमुच यमुना को बचाना चाहते हैं?

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पिछले दिनों, एक दोपहर, महिलाओं से लगभग पूरी सी भरी बस के बाहर मैं पांच मिनिट से खड़ा था, तभी कंडक्टर आया, इशारा किया “घुसो!” मैं झिझक रहा था, पूरी बस महिलाओं से भरी थी, सिर्फ मैं अकेला पुरुष, लेडीज स्पेशल बस तो नहीं! कंडक्टर ने एक लड़की को उठाकर मुझे सीट पर बैठाया, अटपटा लगा, लेकिन सीनियर सिटीजन के प्रति सम्मान देखकर, मुझे अच्छा लगा। बगल की सीट पर बैठी महिला ने बातचीत में बताया कि ज्यादातर सरकारी बसों में आजकल महिलाएं ही अधिक संख्या में दिखेंगी...

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संसदीय गरिमा पर भाषण देना हमारे जनप्रतिनिधियों का पसंदीदा शगल बन चुका है, लेकिन उसी गरिमा को रोज़मर्रा की राजनीति में रौंद देना उससे भी ज़्यादा सहज हो चुका है। संसद, विधानसभाओं, स्थानीय निकायों, पंचायतों तक, में मर्यादा की दुहाई जितनी ऊंची आवाज़ में दी जाती है, व्यवहार में उसकी अनदेखी उतनी ही बेशर्मी से हो रही है...

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आगरा की इमारतें सिर्फ़ ईंट, पत्थर और गुम्बद नहीं हैं। ये सदियों से चली आ रही एक कहानी है, हुकूमत की, ख़ूबसूरती की, आस्था की और फ़ितरत से तालमेल की। पांच सौ सालों में आगरा ने अलग-अलग तहज़ीबों के असर को अपने भीतर समेटा और उन्हें अपनी खास पहचान में ढाल दिया।

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टाइम मशीन में बैठकर लौटते हैं पौराणिक काल में और देखते हैं, गोकुल में यमुना किनारे फैला एक हरा-भरा वन। ऊंचे-ऊंचे वृक्षों की छांव में मोर पंख फैलाए नाच रहे हैं, रंग-बिरंगी तितलियां हवा में रेशमी नक़्श बनाती उड़ रही हैं, गायें शांति से चर रही हैं, हिरण चौकड़ी भरते दौड़ रहे हैं। कदंब के पेड़ तले श्रीकृष्ण अपनी बांसुरी की मधुर तान छेड़ते हैं और गोपियां मानो किसी रूहानी जादू में डूबी झूम उठती हैं। पूरा ब्रज जैसे संगीत, प्रकृति और भक्ति का एक जीवंत स्वर्ग हो...

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