बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

“जब तोपें गरजती हैं, तो इंसानियत खामोश हो जाती है…”। पश्चिम एशिया का आसमान इन दिनों सिर्फ धुएं से नहीं, एक खौफनाक सन्नाटे से भी ढका है। मिसाइलों की लकीरें रात को चीरती हैं, ड्रोन मौत का पैगाम बनकर मंडरा रहे हैं, और हर विस्फोट के साथ ऐसा लगता है जैसे दुनिया एक कदम और कयामत के करीब पहुंच रही हो। हवा में बारूद ही नहीं, रेडियोएक्टिव डर भी तैर रहा है। कहीं कोई लाल बटन दबा, और पूरी इंसानियत एक न्यूक्लियर ब्लैकआउट में डूब सकती है। यह कोई फिल्मी सीन नहीं। यह हमारे समय का स्याह सच है...

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जब दूसरे राज्य ‘तमिल प्राइड’, ‘मराठा गौरव’, ‘पंजाबियत’, ‘कश्मीरियत’, या ‘बंगाली अस्मिता’ जैसी अपनी क्षेत्रीय शान का ढोल पीटते हैं, तब उत्तर प्रदेश हमेशा “एक भारत” की बात करता है। पश्चिम और दक्षिण भारत के कुछ लोग जब यूपी को पिछड़ा बताकर उसकी जीडीपी या राष्ट्र निर्माण में योगदान पर सवाल उठाते हैं, तब वे एक बड़ी सच्चाई भूल जाते हैं। उत्तर प्रदेश सिर्फ नक्शे पर बना एक राज्य नहीं है। यह भारत की रूह, दिल, तहज़ीब और सियासत की धड़कन है...

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दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई देती है। चार लड़के मुस्कराते हुए मोबाइल कैमरे की तरफ देखते हैं। एक लड़का हाथ और आगे बढ़ाता है ताकि “परफेक्ट सेल्फी” आ सके। अगले ही पल तेज रफ्तार ट्रेन उन्हें कुचल देती है। उनकी तस्वीर कभी सोशल मीडिया तक नहीं पहुंचती...

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हमारे खूबसूरत मुल्क में चुनाव ऐसे आते हैं जैसे शादी, क्रिकेट फाइनल और पौराणिक धारावाहिक सबको मिलाकर एक विशाल सर्कस बना दिया गया हो। लाउडस्पीकर चीखते हैं। हेलिकॉप्टर फूल बरसाते हैं। टीवी एंकर अपनी आवाज़ खो बैठते हैं। और नेता लोग वादे ऐसे बांटते हैं जैसे भंडारे में हलवा पूरी...

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हार भी अजीब चीज़ होती है। किसी को समझदार बना देती है। किसी को और ज़्यादा गुस्सैल। कोई हारकर चुपचाप अपने टूटे घर की ईंटें जोड़ता है। कोई हार के बाद भी चौराहे पर खड़े होकर दुनिया को गालियां देता रहता है...

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“ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…” दिल के किसी कोने से एक आह उठती है। क्या सच में हमने सिनेमा का वो जादू खो दिया है?

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