दुनियाभर में जहां साफ पानी और शौचालय की कमी है, वहां असमानता और बढ़ती है, और सबसे ज्यादा बोझ महिलाओं पर पड़ता है...
Read More
बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।
दुनियाभर में जहां साफ पानी और शौचालय की कमी है, वहां असमानता और बढ़ती है, और सबसे ज्यादा बोझ महिलाओं पर पड़ता है...
Read More
भारत बदल चुका है। चेहरा भी, चाल भी, चरित्र भी। सत्ता की भाषा बदली, शासन का व्याकरण बदला। पर असली सवाल अब सामने खड़ा है कि क्या यह बदलाव की आंधी आगे भी चलेगी, या अब इसकी सांस फूलने लगी है? 4 मई को पांच राज्यों के नतीजे इस पहेली का जवाब लिखेंगे।
Read More
नल खुलता है। पानी गिरता है। हम चैन की सांस लेते हैं। लेकिन ज़मीन के नीचे? सन्नाटा है। सूखी दरारें हैं। और एक डर है, जो धीरे-धीरे हमारे भविष्य को खा रहा है...
Read More
हालिया घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत का लोकतांत्रिक ढांचा, अपनी अव्यवस्था और उलझनों के बावजूद, अमेरिका की सख्त और कुछ हद तक जड़ प्रणाली से ज्यादा जवाबदेह और नुमाइंदगी करने वाला है...
Read More
बीते 9 अप्रैल को भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने ‘आरोग्य वन’ पहल शुरू की। राजमार्गों के किनारे अब औषधीय पेड़ों के जंगल उगेंगे। सफ़र होगा, और साथ में सेहत का पैग़ाम भी मिलेगा। सड़कें दौड़ती थीं। अब पेड़ भी साथ दौड़ेंगे। हवा में सिर्फ़ धूल नहीं, शिफ़ा की ख़ुशबू भी होगी। अब ज़रा पीछे चलते हैं।
Read More
ईरान कितने दिन तक टिकेगा? पंद्रह दिन? एक महीना? या लंबी, थकी हुई सांसों में खिंचता हुआ सालों का सिलसिला? सवाल सीधा है। जवाब उलझा हुआ, क्योंकि मुल्क ताश के पत्ते नहीं होते। हवा चली और ढह गए, इतनी सस्ती नहीं होती सभ्यताएं।
Read More