बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

भारत की सुप्रीम कोर्ट को लोकतंत्र का सबसे बड़ा पहरेदार माना जाता है। महिलाओं के अधिकार, समलैंगिक बराबरी और पर्यावरण सुरक्षा जैसे ऐतिहासिक फ़ैसलों ने अदालत की साख मज़बूत की है। लेकिन, हाल के बरसों में कई फ़ैसलों ने यह बहस छेड़ दी है कि अदालतें अपने दायरे से बाहर निकलकर नीति और प्रशासन का काम करने लगी हैं। न्यायिक सक्रियता पर एक बहस 1993 में भी हुई थी जब जस्टिस कुलदीप सिंह बेंच ने एमसी मेहता की याचिका पर ताज ट्रिपेजियम जोन में प्रदूषणकारी उद्योगों पर तमाम बंदिशें लगा दी थीं...

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नेपाल, बांग्लादेश और कई वर्ष पहले मिस्र में हुए छात्र आंदोलनों ने सत्ता पलट दी। हश्र यह हुआ कि वहां अभी तक लोकतंत्र मजबूती नहीं दिखा सका है। तो, क्या वजह हैं जो भारत, अमेरिका आदि देशों में लोकतंत्र इतना मजबूत है...

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सिर्फ आंकड़ों, डेटा और तुलनात्मक विश्लेषणों से अगर नरेंद्र मोदी सरकार का मूल्यांकन किया जाए तो पिछले 11 वर्ष भारत की विकास यात्रा के इतिहास का स्वर्णिम काल कहा जा सकता है। हजारों वर्षों में ऐसी कोई राजनैतिक व्यवस्था नहीं आई जिसने इतनी बड़ी आबादी को जीने की उम्मीद दी, सहारा दिया और मुख्यधारा से जुड़ने के अवसर दिए...

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वह अदालत के सामने खड़ी थी, उसकी आंखों में सवाल नहीं, एक जंग थी। उसका 'अपराध'? एक लिव-इन रिलेशनशिप। समाज की नज़रों में वह 'बदचलन' थी, लेकिन अपने लिए, वह आज़ादी की सेनानी थी। उसने पूछा, "क्या प्यार की इजाज़त के लिए सर्टिफिकेट चाहिए?" उसकी आवाज़ में वही दर्द था जो सदियों से दबाया गया है। यह मामला सिर्फ एक लड़की का नहीं, हमारे समाज के ढांचे की जड़ों पर प्रहार था। क्या न्याय व्यवस्था समाज के दोगलेपन के आगे झुकेगी...

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लाख कोशिशों के बावजूद महात्मा गांधी के जीवन आदर्श और गांधीवादी विचारधारा से भारत की वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था के कप्तान मुक्ति नहीं पा सके हैं। कांग्रेसियों ने कभी गांधी को जीया ही नहीं, और हिंदुत्ववादी विचारकों को हमेशा गांधी नाम से ही घिन या चिढ़ ही रही...

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कभी अख़बार का संपादक एक संस्था हुआ करता था। उसकी एक पंक्ति से सत्ता की नींव हिल जाया करती थी। लेकिन, आज हालात इतने बदल गए हैं कि अगर पाठकों से पूछा जाए, तो उन्हें अपने पसंदीदा अख़बार के संपादक का नाम तक नहीं मालूम। पत्रकारिता के मूल्यों का सूरज ढल रहा है और उसकी जगह पर बाजारू दबावों का अंधेरा छा गया है। खबर अब महज़ एक उत्पाद है, जिसकी बिक्री और टीआरपी ही सब कुछ तय करती है...

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