दिल्ली के कोचिंग सेंटरों के बाहर खड़े युवाओं से पूछिए, “क्या कर रहे हो?” जवाब लगभग एक जैसा मिलेगा, “यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं।” “क्यों?” “देश की सेवा करनी है। समाज बदलना है। संविधान की रक्षा करनी है।”
इरादे नेक हैं। सपने बड़े हैं। मगर कहानी का अगला अध्याय हमेशा इतना खूबसूरत नहीं होता है। कुर्सी मिलते ही कुछ लोगों की सेवा का दायरा बदल जाता है। देश पीछे छूट जाता है और खुद आगे आ जाता है।
सरकारी अफसर को तनख्वाह मिलती है। सरकारी मकान मिलता है। गाड़ी मिलती है। चिकित्सा सुविधा मिलती है। भत्ते मिलते हैं। रुतबा मिलता है। नौकरी के बाद पेंशन भी मिलती है।
तो फिर सवाल सीधा है; साहब को और क्या चाहिए? यही सवाल उन अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए जिन पर रिश्वत, कमीशन, सरकारी धन की हेराफेरी या पद के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं।
आईएएस और आईपीएस कोई मामूली नौकरी नहीं है। यूपीएससी की कठिन परीक्षा पास करके अधिकारी प्रशासन और शासन की सबसे ताकतवर गलियों तक पहुंचते हैं। उनके हाथ में फैसले होते हैं। फाइलें होती हैं। ठेके होते हैं। नीतियों को लागू करने की ताकत होती है।
कभी भारतीय नौकरशाही को “भारत का लौह ढांचा” कहा गया था। लेकिन, लोहे का फ्रेम भी जंग खा सकता है। खतरा वहीं शुरू होता है जहां ताकत बहुत हो और निगरानी कम। विवेकाधिकार बड़ा हो और जवाबदेही छोटी। फाइल रोकने की ताकत हो, लेकिन जवाब देने की मजबूरी न हो। फिर तनख्वाह कम नहीं पड़ती। नीयत छोटी पड़ जाती है।
टिप्पणीकार प्रो पारस नाथ चौधरी भ्रष्टाचार के पीछे कई कारण गिनाते हैं। अत्यधिक विवेकाधिकार, पारदर्शिता की कमी, राजनीतिक-नौकरशाही गठजोड़, कमजोर जवाबदेही, धीमी न्याय प्रक्रिया, कम सजा दर और व्यक्तिगत लालच। इन सबके मेल से पद सेवा का माध्यम न रहकर निजी लाभ का जरिया बन सकता है।
भ्रष्टाचार के लिए अक्सर कम वेतन, महंगाई और आर्थिक मजबूरी का बहाना दिया जाता है। लेकिन, वरिष्ठ नौकरशाहों के मामले में यह दलील ज्यादा दूर तक नहीं जाती है।
जिस अधिकारी को सम्मानजनक वेतन, सरकारी आवास, वाहन, चिकित्सा सुविधा और दूसरी सुविधाएं मिल रही हों, उसके लिए रिश्वतखोरी को मजबूरी कहना जनता के जख्म पर नमक छिड़कना है।
सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर इसे ज्यादा कड़वे अंदाज में कहती हैं, “झोला लेकर सिस्टम में दाखिल होते हैं, ट्रकों का काफिला लेकर निजी महल के लिए विदा होते हैं।”
बात कड़वी है, लेकिन सवाल जरूरी है। नाम बड़े हैं। मामले पुराने हैं। और, पैटर्न बार-बार सामने आता है। पूर्व कोयला सचिव एचसी गुप्ता को कोयला आवंटन से जुड़े कई मामलों में अदालत ने दोषी ठहराया। झारखंड की आईएएस अधिकारी पूजा सिंघल पर मनरेगा धन और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े गंभीर आरोप लगे। छत्तीसगढ़ के अनिल टुटेजा का नाम कथित शराब सिंडिकेट मामले में सामने आया। हरियाणा में पंकज अग्रवाल और प्रदीप कुमार से जुड़े मामलों में बैंक फंड की कथित हेराफेरी और फर्जी दस्तावेजों के आरोप सामने आए। राजस्थान के सुबोध अग्रवाल का नाम जल जीवन मिशन की टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से जोड़ा गया। उत्तर प्रदेश के अभिषेक प्रकाश पर रिश्वत और कमीशन से जुड़े आरोप लगे। झारखंड के छवि रंजन भूमि से जुड़े मामलों में जांच के घेरे में आए। इनमें से जहां अदालत का अंतिम फैसला नहीं आया है, वहां आरोप को दोषसिद्धि कहना नाइंसाफी होगी।
लेकिन, सवाल फिर भी खड़ा होता है कि आखिर इतने मामले क्यों सामने आते हैं? क्या सरकारी कुर्सी सचमुच सेवा का माध्यम है? या कुछ लोगों के लिए वह कमाई का सबसे सुरक्षित रास्ता बन चुकी है?
भ्रष्टाचार को भी अब जेंडर की नजर से देखने की जरूरत नहीं है। भ्रष्टाचार न पुरुष होता है, न महिला। जिस तरह कोई पुरुष अधिकारी कानून तोड़ सकता है, उसी तरह महिला अधिकारी भी जांच और कानून के दायरे में आ सकती है। पूजा सिंघल का मामला इसका चर्चित उदाहरण है।
नीट-यूजी पेपर लीक की जांच में भी महिलाओं समेत कई लोगों के नाम सामने आए। कुछ विशेषज्ञों और अन्य आरोपियों पर प्रश्न याद करने, साझा करने या पैसे के बदले उपलब्ध कराने जैसे आरोप लगे। संदेश साफ है। ईमानदारी का कोई जेंडर नहीं है। बेईमानी का भी नहीं। हर भ्रष्टाचार कांड के बाद वही राजनीतिक तमाशा शुरू होता है।
विपक्ष कहता है कि सरकार नाकाम है। सरकार कहती है कि हमने कार्रवाई की है। फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है। बयान आते हैं। जांच एजेंसियां सक्रिय होती हैं। गिरफ्तारियां होती हैं। चार्जशीट दाखिल होती है। और उसके बाद? मामला अदालत में पहुंचता है। फिर तारीख पर तारीख। गिरफ्तारी खबर बन जाती है, लेकिन सजा इतिहास बन जाती है।
सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियों ने भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों में जांच और कार्रवाई की है। राज्य सरकारों ने भी अधिकारियों को निलंबित किया और विभागीय जांच शुरू की। लेकिन छापा, गिरफ्तारी या चार्जशीट अपने आप में भ्रष्टाचार का इलाज नहीं है। अंतिम कसौटी अदालत का फैसला है। और फैसला जितना देर से आएगा, व्यवस्था की कमजोरी पर भ्रष्टाचारी का भरोसा उतना ही बढ़ेगा। सिर्फ वेतन बढ़ाने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। अधिकारी को अच्छा वेतन दीजिए। सम्मान दीजिए। सुविधाएं दीजिए। लेकिन अगर नीयत में खोट है, तो लालच का पेट कभी नहीं भरता। लालच की कोई सैलरी स्लिप नहीं होती है।
सरकारी अधिकारी जनता के पैसे और अधिकारों के रखवाले हैं। वे सरकारी कुर्सी के मालिक नहीं हैं। सरकारी पद निजी जागीर नहीं है। इसलिए भ्रष्टाचार रोकना है तो सिर्फ भाषण नहीं, नतीजे चाहिए। तेज सुनवाई चाहिए। संपत्ति की सख्त जांच चाहिए। फैसलों में पारदर्शिता चाहिए। जहां जरूरत हो, विवेकाधिकार सीमित करना होगा। और सबसे जरूरी बात यह है कि कानून की नजर में कोई बड़ा या छोटा नहीं होना चाहिए। न आईएएस। न आईपीएस। न नेता। न कोई रसूखदार।
कुर्सी चाहे कितनी भी ऊंची हो, कानून उससे ऊंचा होना चाहिए। क्योंकि कुर्सी जनता देती है। कुर्सी के साथ तिजोरी नहीं देती है। और जिस दिन अफसर यह फर्क भूल जाएगा, उसी दिन लोकसेवा, निजी सेवा में बदल जाएगी।

बृज खंडेलवाल





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