ऐसी दुनिया जहां स्वतंत्र पत्रकारिता निहित स्वार्थों से खतरे में है, हिंसक दमन और प्रौद्योगिकी के ‘बिग ब्रदरली’ चालों से घिरी हुई है, वहां इतिहास की गूंज एक बार फिर सुनाई दे रही है...
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बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।
ऐसी दुनिया जहां स्वतंत्र पत्रकारिता निहित स्वार्थों से खतरे में है, हिंसक दमन और प्रौद्योगिकी के ‘बिग ब्रदरली’ चालों से घिरी हुई है, वहां इतिहास की गूंज एक बार फिर सुनाई दे रही है...
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शहरों में शोर का ऐसा बवंडर उठ रहा है कि अब चैन की सांस लेना भी चुनौती बन गया है। दिन हो या रात, हर ओर गूंजती अलग-अलग ध्वनियां मानो एक शोरगुल की करामात रच रही हैं। चुनावी प्रचार से लेकर धार्मिक उत्सवों और शादियों तक, हर आयोजन में ध्वनि प्रदूषण के नए रिकॉर्ड बनते जा रहे हैं।
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26 जनवरी, 1950 को भारत ने अपना संविधान अपनाया और खुद को एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया। लेकिन, अगर यह ऐतिहासिक घटना कभी घटित ही नहीं होती तो क्या भारत वैसा ही होता जैसा आज है...
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कांग्रेस पार्टी के पतन का मुख्य कारण राहुल गांधी के नेतृत्व पर उठते सवाल और परिवारवाद की जकड़न है। पार्टी में परिवारवाद का प्रभाव इतना गहरा है कि नए और प्रतिभाशाली युवा नेताओं को उभरने का मौका नहीं मिल पाता।
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क्या अमेरिकी लोकतंत्र के नए, उतावले बादशाह, शांति दूत डोनाल्ड ट्रंप विश्व में क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए नायक की भूमिका में सफल होंगे, या उनका बड़बोलापन युद्ध और संघर्षों की नई इबारत लिखेगा? क्या अमेरिकन पूंजीवादी व्यवस्था एक नई ‘राष्ट्रीय समाजवादी मूल्य आधारित’ विचारधारा को अपनाने के लिए तैयार है।
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कुछ रोज़ पहले, क्रिकेट खिलाड़ी अश्विन रवि चंद्रन ने चेन्नई में एक छात्रों की एक सभा को संबोधित करते हुए हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा न मानते हुए सिर्फ राष्ट्र की एक आधिकारिक भाषा बताया। तमिल नाडु में भारतीय जनता पार्टी का भी यही मानना रहा है...
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