गौलोक में गायों के लिए लड़ रही है एक जर्मन महिला


दुनिया में ब्रजवासियों और ब्रज को गौ-सेवा के लिए जाना जाता है, लेकिन कृष्ण की इस नगरी में एक अदद गौ-समाधिस्थल के लिए एक जर्मन महिला बहुत लम्बे समय से लड़ाई लड़ रही है। इससे पहले ब्रज में इस तरह की मांग शायद ही किसी और ने की होगी। इसके पीछे की कहानी को जानना भी बेहद जरूरी है। इनका वास्तविक नाम इरीना ब्रूनिंग है और ब्रज में इन्हें ‘सुदेवी दासी’ के नाम से जाना जाता है।
सुदेवी दासी बताती हैं कि वह गायों को पाल सकती हैं, उनका इलाज कर सकती हैं लेकिन गाय की मौत हो जाए तो समाधि के लिए लोगों से लड़ना पड़ता है। इसके चलते लोगों के साथ उनके कई झगड़े भी हुए हैं। यहां तक कि उन्हें हाईकोर्ट में भी इसके लिए कई मुकदमों का उन्हें सामना करना पड़ रहा है। वह गोवर्धन के राधाकुंड में राधा सुरभि गोशाला ट्रस्ट में गायों के रखरखाव और उनके उपचार का काम करती हैं। राधा सुरभि गोशाला ट्रस्ट की अध्यक्ष सुदेवी दासी का नाम वर्ष 2019 की शुरुआत में तब सुर्खियों में आया था जब भारत सरकार ने गायों के सेवा के लिए देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में से एक पद्म पुरस्कार के लिए चुना। 

इरीना ब्रूनिंग की कहानी बहुत दिलचस्प है। साल 1978 में जब जर्मनी की यह युवती भारत घूमने आई थी, तब उनके पिता भारत में जर्मनी के राजदूत थे। युवती देश के कई हिस्सों को घूमते हुए कृष्ण की धरती वृंदावन में रम गईं। उनकी वीजा अवधि के खत्म हो जाने पर भी वह सुर्खियों में आई थीं। मथुरा से सांसद हेमा मालिनी ने तब व्यक्तिगत रूप से उनकी मदद भी की थी। वह लगभग 40 साल से यहां राधा कुंड में गौ-सेवा कर रही हैं। गौशाला चलाती हैं और गायों का उपचार भी करती हैं। उन्होंने बताया कि उनके द्वारा छह महीने पहले जिलाधिकारी को ज्ञापन दिया गया था। इसमें मृत गायों के लिए भूमि आवंटन का प्रस्ताव रखा गया था। इस पर जिलाधिकारी ने आश्वासन दिया था कि वह इस पर विचार करेंगे। लेकिन, इस दिशा में अब तक किसी तरह की कोई प्रगति नहीं हुई है। उन्हें दूर दराज से फोन आते हैं। वह बीमार और घायल गायों को ले आती हैं लेकिन, यदि वह किसी तरह उन्हें बचा नहीं पाती हैं तो गाय को समाधि देने का संकट खड़ा हो जाता है। पूर्व में निकटवर्ती वन विभाग की जमीन पर वह गायों को समाधि देती थीं लेकिन लोग इस पर नाराजगी जताते हैं। वह चाहती है कि गायों की समाधि के लिए स्थान तय किया जाए।



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