चरनपादुका लेकर वापिस लौटे भरत

मथुरा। चित्रकूट पर चल रही रामलीला में आज श्रीरामजी को मना कर अवधपुरी लाने का भरत निर्णय करते हैं और उन्हें मनाने के लिये जाते हैं। रास्ते में भरत को जाते देख निषादराज को भ्रम पैदा होता हैं कि राज्य लेने के बाद लक्ष्मण समेत श्री रामचन्द्रजी को मारकर अकण्टक राज्य करना चाहते है। यह विचार कर अपने जाति वालों से कहा कि सब तैयार हो जाओ और भरत से लोहा लो जब वशिष्ठ जी ने भरत से कहा कि यह प्रभु श्री राम के सखा है यह बात सुनकर भरत ने निषादराज को गले लगा लिया। भरत ने अपना रथ छोड़ दिया और पैदल प्रभु से मिलने के लिये चित्रकूट चल दिये। प्रभु राम, सीता, लक्ष्मण के जैसे ही दर्शन हुए उनकी आँखों से अश्रू बहने लगे राम जी ने उन्हें अपने गले लगा लिया। जब उन्हें पिता के देहांत के बारे मे पता चला तो वह सन्न रह गए। भरत रामजी को अवधपुरी चलने के लिये मनाते हैं। भरत के द्वारा बहुत मनाया गया पर श्री राम नहीं माने। भरत ने प्रभू से से कहा कि आप नहीं चल रहे तो अपनी चरनपादुका मुझे दे दीजिये। राम ने अपनी चरनपादुका भरत को दे दी। भरत उन्हें लेकर वापिस आ गए और राजसिंहासन पर रखकर उनकी सेवा करने लगे। 

 

 

 


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