... एक रात को दो बजे, जब अचानक नींद खुल गई तो टीवी से 'उलझ' बैठे और चैनल सर्फ करते-करते 'भोजपुरी टेरीटरी' तक जा पहुंचे। किसी मूवी चैनल पर निरहुआ की फिल्म 'बिदेसिया' आ रही थी। भोजपुरी में ऐसी फिल्में भी बनती हैं, जानकर अचंभा हुआ। नौटंकी विधा को फिल्म विधा के साथ गूंथकर बनाई गई यह फिल्म जब देखना शुरू किया तो फिर चैनल बदल ही नहीं पाए। अगली सुबह जब इसके बारे में थोड़ा जानने की कोशिश की तो पता चला कि 'भोजपुरी के शेक्सपियर' कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर की यह रचना है और कुछ-कुछ उनके जीवन से जुड़ी हुई भी...। साल 1963 में इसी नाम से और इसी विषय पर सुजीत कुमार को लेकर भी एक फिल्म बनी थी। उसे भी देखेंगे किसी दिन जरूर...। कभी समय मिले तो आप भी जरूर देखिएगा...! जरूरी नहीं है कि मिठास और श्रम की भाषा भोजपुरी में 'बकवास' फिल्में ही बनती हैं, यहां 'बढ़िया' सिनेमा भी है...।
इतिहास की बात करें तो संत कबीर को भोजपुरी का पहला कवि कहा जाता है। तुलसीदास की रामचरित मानस एवं अन्य रचनाओं में भी भोजपुरी के हजारों शब्द आते हैं। मौजूदा दौर में भिखारी ठाकुर, मोती बीए, महेंदर मिसिर, मो. खलील, हवलदार त्रिपाठी सहृदय, चंद्रशेखर मिश्र, रामेश्वर सिंह कश्यप उर्फ लोहा सिंह, कुंज बिहारी कुंजन, गणेशदत्त किरण व कन्हैया लाल पंडित जैसे तमाम सर्जकों ने भी भोजपुरी में उत्कृष्ट साहित्य की रचना की है। 'बिकाई ए बाबू बीए पास घोड़ा' के जरिए 70’ के दशक में प्रसिद्ध भोजपुरी गायक बालेश्वर यादव ने बेरोजगारी को लेकर तंत्र पर तंज कसा था। महान भोजपुरी गायक मो. खलील का गीत 'बलम हो जनीं जा बिदेसवा के ओर जनीं जा बिदेसवा के ओर' पलायन और विक्षोभ को लेकर है।
‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ भोजपुरी की पहली फ़िल्म है जो 21 फरवरी 1963 को देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को समर्पित की गई। साल 2003 में आई फ़िल्म 'ससुरा बड़ा पइसा वाला' ने तो लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। भारत, नेपाल, फिजी, मॉरिशस, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिनाद, दक्षिण अफ्रीका सब मिलाकर करीब 40 से 50 करोड़ दर्शकों की संख्या वाले भोजपुरी फिल्म उद्योग में हर साल 200 से 400 फिल्में बनती हैं। पूरे उद्योग का वार्षिक टर्नओवर 2000 करोड़ रुपये से अधिक है। अकेले भोजपरी संगीत उद्यम की वार्षिक कमाई ही 500 करोड़ रुपये से अधिक है।
भोजपुरी सिनेमा के पुराने रसूख और मौजूदा स्थिति पर ढेर सारी बातें करने के लिए आज हमारे साथ मौजूद हैं, भोजपुरी संवेदनाओं से खास लगाव रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और साहित्य आलोचक प्रमोद कुमार पांडेय...।
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