मशहूर साहित्यकार और शिक्षाविद आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के बारे में यह बात प्रसिद्ध थी कि वह बहुत ही कम बोलते थे। किसी भी बड़ी से बड़ी समस्या को वह एक या दो शब्दों में ही समाप्त कर देते थे।
उनकी इसी बात को लेकर उनके दो शिष्यों में होड़ लग गई। उनके एक मुंह लगे शिष्य ने दूसरे से शर्त लगाई कि मैं आचार्य शुक्ल के मुख से एक बार में कम से कम पांच शब्द अवश्य कहलवा दूंगा।
अत: बेधड़क बनने का प्रयास करते हुए उसने आचार्य के सम्मुख जाकर कहा कि गुरुदेव मैंने अपने मित्र से एक शर्त लगाई है कि एक बार में आप के द्वारा कम से कम पांच शब्द अवश्य कहलवा दूंगा।
बेहद कुटिल और मंद-मंद मुस्कान बिखेरते हुए आचार्य शुक्ल ने जवाब दिया, 'तुम हार गए।'
दोनों छात्र चेहरे पर मुस्कराहट के भाव लिए वहां से निकल लिए।
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बात उन दिनों की है जब हिन्दी साहित्य के प्रथम इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल बनारस में रहते थे।
उन दिनों वह नागरी प्रचारिणी सभा में हिन्दी विश्वकोश का काम देखा करते थे और उन्हें पच्चीस रुपये मासिक वेतन मिलता था।
शुक्लजी के एक बड़े ही प्रभावशआली मित्र थे, जिनकी पहुंच तत्कालीन राजाओं और महाराजाओं तक थी तो, उन्होंने शुक्लजी को अलवर के महाराजा के यहां काम पर लगवा दिया। वहां वेतन हो गया चौदह सौ रुपये मासिक।
उस जमाने के चौदह सौ रुपये आज के चौदह हजार से भी कहीं ज्यादा थे। वेतन के ही अनुरूप राजसी ठाट-बाट भी बढ़ गया था। रहने के लिए शानदार कोठी मिली और सवारी के लिए घोड़ा-गाड़ी भी मिल गई।
अलवर पहुंचे हुए तीन दिन ही हुए थे कि आचार्य शुक्ल ऊब से गए। उन्होंने देखा कि सभी राजकर्मचारी राजा साहब की जी-हजूरी और चाटुकारिता में ही लगे रहते हैं। वहां बने रहने के लिए यह सब जरूरी भी था जो शुक्लजी के बस का नहीं था।
फिर क्या था, चौथे दिन बिना किसी को बताए वह अलवर से सीधे चले आए बनारस और फिर से पच्चीस रुपय मासिक की नौकरी करने लगे। हां, उन्होंने अपने प्रभावशाली मित्र को अलबत्ता कवितानुमा एक चिट्ठी भेज दी। चिटठी कुछ इस तरह थी-
चीथड़े लपेटे चने चाबेंगे चौखट पर,
चाकरी करेंगे नहीं चौपट चमार की।






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