कभी एक 'चाणक्य' ने एक 'चंद्रगुप्त' को बनाया था। क्या हो जब आज के दिन कोई शिक्षक उन्हीं पदचिह्नों पर चलते हुए ढेर सारे 'चंद्रगुप्त' बना दे! और, क्या होगा जब ये सभी 'चंद्रगुप्त' एक साथ मिलकर पूरे तंत्र को अपने हिसाब से चलाने में सक्षम बन जाएं। और, इसके बाद, यदि इनमें से एक 'चंद्रगुप्त' विद्रोह कर अपने ही 'चाणक्य' के खिलाफ खड़ा हो जाए, तो...! यह पूरा ताना-बाना बुना गया है प्रकाश झा की नई वेब सीरीज 'संकल्प' में...।
कहानी में एक शिक्षक, चाणक्य की ही तरह, समाज के निचले तबकों से, अपनी खुद की बनाई कसौटी पर कस कर, बच्चों का चयन कर, अपने गुरुकुल में लाकर शिक्षित और समाज में एक महत्वपूर्ण कारक बनने के लिए प्रशिक्षित करता है। और, जब वे सभी विद्यार्थी पटना से लेकर दिल्ली तक व्यवस्थित हो जाते हैं तो शुरू होती है एक बदले की कहानी...।
Read in English: ‘Sankalp’: A Tapestry of Power, Education, and Struggle
सीरीज के 10 अध्याय हैं। पहले पांच अध्यायों में कहानी कई जगह खींची हुई व गैर-तार्किक सी लगती है, लेकिन यदि धैर्य से पहले पांच अध्याय देख लिए जाएं तो छठवां अध्याय खत्म होते-होते बिंदु जुड़ने लगते हैं। यहां से दर्शकों का कहानी से जुड़ाव होने लगता है।
'हक' फेम रेशू नाथ द्वारा लिखित पूरी श्रृंखला का दारोमदार नाना पाटेकर के कंधों पर है। वह पहली बार कोई वेब सीरीज कर रहे हैं। स्क्रीन प्ले प्रसाद कदम है। एक वेब सीरीज के लिए यह उनका भी पहला काम है। चंदन कुमार के संवाद बेहतरीन हैं। "कोशिश करते रहो! सक्सेज कहां जाता है, कोशिश के इर्द-गिर्द ही मंडराता रहता है..."; "तुम्हरी ममता के बवंडर में इस दीपक को हम बुझने नहीं देंगे..."; "किस्मत माथा पर लिखी हो या हथेली पे। उसको बदलने का ताकत इसी हाथ में होता है..."; "गुरु दक्षिणा है, आदित्य! किसी होटल का मीनू कार्ड नहीं, कि आयटम बदल दें..."; "मैं वो एकलव्य हूं जिसने उन्हें अपना अंगूठा काटकर देने से इंकार कर दिया..."; "सही वक्त आने में वक्त तो लगता ही है..."; "सच का अपना खुद का कोई अस्तित्व हो तो बताएं। वो तो बस नजरिए और हालात की बैसाखियों पर टिका है। मानो तो सत्य। आधा मानो तो अर्द्धसत्य। ना मानो तो असत्य...", जैसे संवाद देर तक जेहन में रहते हैं। इनमें से ज्यादातर नाना पाटेकर के ही हिस्से में आए हैं।
मोहम्मद जीशान अयूब, नीरज काबी, क्रांति प्रकाश झा, कुब्रा सेत, सौरभ गोयल, भगवान तिवारी और मेघना मलिक अपनी भूमिकाओं में जमे हैं, जबकि संजय कपूर कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाते हैं।
पटकथा में कई झोल भी हैं। जैसे बेहद सुरक्षित गुरुकुल में कोई स्थानीय पत्रकार आसानी से बड़े-बड़े सीसीटीवी कैमरा लगा जाता है। छोटा सा गुप्त कैमरा लगाता तो ज्यादा सहज होता। इसी तरह, एक आईपीएस जिस तरह अपने डीएनए का नमूना देने जाता है, वैसा सामान्य जीवन में अक्सर नहीं होता है। नमूने के लिए खून देना भी जरूरी नहीं होता है। कई अन्य अतिरेक भी हैं, जिनसे बचा जा सकता था। इनसे बचते तो संपादन भी थोड़ा बेहतर हो जाता। कोई जरूरी नहीं है कि कहानी बताने के लिए अध्याय लंबे-लंबे ही रखे जाएं। कहानी में कई जगह 'ट्विस्ट' आते हैं, लेकिन वे चौंकाते नहीं हैं। सीरीज के अंत में कई सवालों के जवाब नहीं मिलते हैं। संभवतः अगले सीजन में इनके जवाब मिलेंगे।






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