‘फ्रंटियर्स इन मेडिसिन’ के हाल ही में प्रकाशित एक बड़े बहु-केंद्रित क्लिनिकल अध्ययन में पाया गया है कि 24 सप्ताह तक अश्वगंधा मूल अर्क के दैनिक सेवन से लिवर या किडनी को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है।
यह अध्ययन नौ संस्थानों के 45 शोधकर्ताओं की बहु-विषयक टीम द्वारा किया गया, जिसमें केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद, अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान तथा कई अन्य संस्थान शामिल थे।
अध्ययन में आयुर्वेद, क्लिनिकल मेडिसिन, रूमेटोलॉजी, कॉम्प्लीमेंटरी एवं इंटीग्रेटिव हेल्थ तथा संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया गया। रैंडमाइज्ड, डबल-ब्लाइंड, प्लेसीबो-नियंत्रित इस क्लिनिकल ट्रायल में 18 से 70 वर्ष की आयु के 1,200 ऐसे स्वस्थ वयस्क शामिल थे, जिन्हें कोविडशील्ड वैक्सीन की पहली, दूसरी या बूस्टर खुराक प्राप्त हुई थी। प्रतिभागियों को यादृच्छिक रूप से प्रतिदिन 500 मिलीग्राम मानकीकृत अश्वगंधा मूल अर्क, जो चार ग्राम कच्ची अश्वगंधा जड़ के चूर्ण के बराबर है, दिया गया। अध्ययन भारत के सात केंद्रों पर किया गया तथा इसमें क्लिनिकल, प्रयोगशाला और इम्यूनोलॉजिकल आकलन शामिल थे।
प्रतिभागियों को 24 सप्ताह तक यह दिया गया और 28वें सप्ताह तक उनका फॉलो-अप किया गया। अध्ययन में शामिल 1,200 प्रतिभागियों में से 1,032 प्रतिभागियों, लगभग 86 प्रतिशत, ने अध्ययन पूरा किया।
अध्ययन में 24 सप्ताह की अवधि के दौरान मानकीकृत अश्वगंधा मूल अर्क की अनुकूल सुरक्षा और सहनशीलता प्रोफाइल पाई गई। लिवर और किडनी के कार्य से संबंधित मानक अध्ययन में रिपोर्ट की गई संदर्भ सीमाओं के भीतर रहे। लिवर एंजाइम, बिलीरुबिन, क्रिएटिनिन और ब्लड यूरिया सहित किए गए आकलनों में उपचार से संबंधित लिवर या किडनी की क्षति का कोई प्रमाण नहीं मिला।
अध्ययन में किसी गंभीर प्रतिकूल घटना को अध्ययन में दिए गए हस्तक्षेप से संबंधित नहीं पाया गया तथा प्रतिकूल घटना के कारण किसी भी प्रतिभागी ने अध्ययन से नाम वापस नहीं लिया।
आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा कि यह निष्कर्ष मानकीकृत आयुर्वेदिक हस्तक्षेपों की सुरक्षा और उचित उपयोग का समर्थन करने वाले मजबूत वैज्ञानिक साक्ष्यों में योगदान करते हैं। उन्होंने कहा, “उच्च गुणवत्ता वाले क्लिनिकल अनुसंधान से आयुर्वेद के वैज्ञानिक साक्ष्य-आधार को मजबूती मिलती है और समकालीन स्वास्थ्य सेवा के संदर्भ में इसकी संभावनाओं की बेहतर समझ विकसित होती है। कठोर क्लिनिकल अध्ययनों से प्राप्त साक्ष्यों का बढ़ता आधार स्वास्थ्य और वेलनेस के विभिन्न क्षेत्रों में आयुर्वेद और इसके हस्तक्षेपों के जिम्मेदार वैश्विक उपयोग को भी समर्थन प्रदान कर रहा है।”
अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ अरविंद चोपड़ा ने निष्कर्षों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, “यह बड़ा, बहु-केंद्रित, रैंडमाइज्ड क्लिनिकल ट्रायल 24 सप्ताह तक मानकीकृत अश्वगंधा की सुरक्षा और सहनशीलता के संबंध में महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रदान करता है। पूरे अध्ययन के दौरान लिवर और किडनी के कार्य से संबंधित मानक शारीरिक संदर्भ सीमाओं के भीतर रहे और उपचार से संबंधित लिवर या किडनी की क्षति नहीं पाई गई।
अध्ययन ने यह भी प्रदर्शित किया कि अश्वगंधा ने वैक्सीन से उत्पन्न प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया तथा अश्वगंधा और प्लेसीबो दोनों समूहों में वायरस को निष्क्रिय करने वाली गतिविधि का स्तर उच्च बना रहा। ये निष्कर्ष मानकीकृत आयुर्वेदिक तैयारियों के मूल्यांकन के लिए कठोर और सुव्यवस्थित क्लिनिकल अनुसंधान के महत्व को रेखांकित करते हैं।”
अध्ययन के सह-लेखक प्रो भूषण पाटवर्धन ने आयुर्वेद के लिए उच्च गुणवत्ता वाले वैज्ञानिक साक्ष्य तैयार करने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “यह अध्ययन इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि आयुर्वेद का मूल्यांकन उसकी पारंपरिक आधारभूमि को ध्यान में रखते हुए मजबूत और समकालीन क्लिनिकल अनुसंधान के माध्यम से कैसे किया जा सकता है। 24 सप्ताह के दौरान सुरक्षा और सहनशीलता से जुड़े अनुकूल निष्कर्ष मानकीकृत अश्वगंधा तैयारियों से संबंधित क्लिनिकल साक्ष्यों में योगदान करते हैं और स्वास्थ्य सेवा में इनके जिम्मेदार समावेशन के लिए साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण के महत्व को रेखांकित करते हैं।”
प्रो (वैद्य) रबिनारायण आचार्य ने आयुर्वेदिक हस्तक्षेपों के संबंध में मजबूत क्लिनिकल साक्ष्य तैयार करने के महत्व पर जोर देते हुए कहा, “इस बहु-केंद्रित क्लिनिकल ट्रायल के निष्कर्ष नियंत्रित परिस्थितियों में 24 सप्ताह तक मानकीकृत अश्वगंधा मूल अर्क के उपयोग की सुरक्षा और सहनशीलता से संबंधित महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रदान करते हैं। इस प्रकार के सुव्यवस्थित क्लिनिकल अध्ययन आयुर्वेद के वैज्ञानिक साक्ष्य-आधार को मजबूत करने तथा मानकीकृत आयुर्वेदिक तैयारियों के जिम्मेदार और साक्ष्य-आधारित उपयोग को समर्थन देने के लिए महत्वपूर्ण हैं।”

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