लोकतंत्र में नेता नहीं, जनता होती है ‘जनार्दन’…!


चुनावी जीत हासिल कर लेने के बाद नेता इस तथ्य को पूरी तरह विस्मृत कर देते हैं कि अब उनको अगले पांच साल के बाद एक बार फिर से उसी जनता-जनार्दन के समक्ष जाना होगा जिनके सहयोग से वर्तमान में उनकी नैया पार हो पाई है।

जिस प्रकार मनुष्य के कर्मों का लेखा-जोखा ईश्वर के समक्ष प्रस्तुत होता है और फल की प्राप्ति होती है, ठीक, उसी प्रकार जनता अपने नेता को सुनने के पश्चात प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उसकी समस्त गतिविधियों पर दृष्टि बनाए रखने के बाद अपना फैसला सुनाती है। इस विलक्षणता को साल 2024 के चुनाव परिणामों ने पूर्णतया स्पष्ट भी किया है।

वर्ष 2024 के चुनावी परिणाम अचम्भित करने वाले रहे हैं। देश के एक बड़े भाग को इन अप्रत्याशित परिणामों की आशंका नहीं थी। जहां एक ओर नरेंद्र मोदी 400 से अधिक सीटों पर जीत की आशा कर रहे थे, वहीं उनको महज 240 सीटें ही प्राप्त हो पाईं और भाजपा बहुमत के लिए आवश्यक न्यूनतम 272 सीटों पर भी विजय प्राप्त नहीं कर पाई।

अब सोचने वाली बात यह है कि बीते एक दशक के दौरान जनता के हित में किए गए मोदी के कई काम उन्हें एक बार फिर अतीत सदृश अशातीत सफलता क्यों नहीं दिला पाए। भारतीय राजनीति का वास्तविक नेतृत्व अब कौन करेगा, कौन किस गठबंधन में रहेगा, कौन किस गठबंधन को छोड़ेगा, यह वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। भारतीय राजनीति में एक बड़ी उठापटक वाला दौर शुरू हो चुका है।

मोदी को सबसे अधिक आहत उत्तर प्रदेश ने किया, क्योंकि उन्हें यहां से 70 सीटें प्राप्त करने की उम्मीद थी, परन्तु परिणाम विपरीत प्राप्त हुए। वह 33 के आंकड़े तक ही पहुंच पाए। उत्तर प्रदेश की डबल इंजन सरकार जनता का विश्वास क्यों नहीं जीत पाई...? यह सवाल भाजपा नेतृत्व को परेशान करता रहेगा।

चुनावी प्रक्रिया के दौरान विपक्ष ने जिस प्रकार से जनता को अपनी ओर आकर्षित किया, उससे सिद्ध होता है कि प्रदेश सरकार ने जनता के हित में जो भी कार्य किए वे या तो जनता के समक्ष पहुंच नहीं पाए या उन्हें जनता के समक्ष पहुंचने नहीं दिया गया। उत्तर प्रदेश की जनता में भाजपा के प्रति इतनी अधिक निराशा क्यों उत्पन्न हुई, इस प्रश्न का उत्तर जनता के मध्य पहुंचकर ही समझना होगा।

जनता से मिले इस प्रतिकार के पीछे यह बात भी निकलकर आ रही है कि ज्यादातर अहंकारग्रस्त भाजपा उम्मीदवारों को यह आशा थी कि बिना जनता का विश्वास जीते और जनता के कार्य किए बिना भी मोदी और योगी के काम उनकी नैया को पार लगा देंगे। लेकिन, लोगों ने सांसदों की अकर्मण्यता के लिए उन्हें पर्याप्त सजा दी है।

अब नए चुनाव परिणामों से नेताओं को यह सीख ले ही लेनी चाहिए कि विन्रमता ही नेता का सबसे जरूरी गुण होता है। घमंड, प्रपंच और बनावटीपन जनता को ज्यादा देर तक भ्रम में नहीं रख सकते, क्योंकि जनता ईश्वर सदृश अपने नेताओ की गतिविधियों का लगातार आंकलन करती रहती है और उसी के आधार पर चुनावों में अपनी प्रतिक्रिया देती है।

 (लेखक आईआईएमटी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं। यहां व्यक्त विचार उनके स्वयं के हैं)



Related Items

  1. विरासतपरस्ती और जमींदारी ने लोकतंत्र को बनाया गिरवी

  1. लोकतंत्र की वर्तमान उदासी और युवाओं की सियासत से दूरी

  1. भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष कब बनेगा बेहतरीन विकल्प?




Mediabharti