विविधा

वह दौर गुलामी का था। उस समय जंगल के भीतर बिरसा मुंडा, ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध प्रतिरोध का सबसे सशक्त स्वर बनकर उभरे थे। उन्होंने आदिवासी अस्मिता की रक्षा के लिए ही कदम नहीं उठाया, बल्कि उन्हें आर्थिक,सामाजिक और शैक्षिक रूप से सबल बनाने के लिए भी हरसंभव प्रयास किया। पूरा आलेख पढ़ने के अभी "सब्सक्राइब करें", महज एक रुपये में अगले पूरे 24 घंटों के लिए...

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अक्सर सड़कों पर दौड़ते ट्रक, टेपों या ऑटो इत्यादि अपने पीछे चलने वालों के दिमाग में कई तरह के संदेश छोड़ जाया करते हैं। दरअसल, बात इन वाहनों के पीछे अंकित और आमजन से निकली शायरी की हो रही है। जी हां, आमतौर पर लोग ऐसे शेर वाले संदेशों को वाहन-मालिक और उनके चालकों के आत्मसंतोष के रूप में ही देखा करते हैं। ऐसे में सवाल है कि कितनों ने महसूस किया कि ये शेर कई बार हमारी उदास यात्रा को भी हसीन बना देते हैं। आज दुनिया जब एक महामारी का दंश झेल रही है, देश में यह वाहन-शायरी हमें एक बड़ी सीख देती हुई भी नजर आ रही हैं...

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देश की आजादी में अनेक क्रांतिकारियों की भूमिका रही है। कुछ को हम जानते हैं और कुछ को नहीं। क्रांतिकारी कुंवर प्रताप सिंह बारहठ ऐसे ही देशभक्त थे। 24 मई 1893 को उदयपुर में जन्मे कुंवर प्रताप सिंह को देशभक्ति विरासत में मिली थी। इनके पिता केसरी सिंह एवं चाचा जोरावर सिंह प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे। पूरा आलेख पढ़ने के लिए अभी "सब्सक्राइब करें", महज एक रुपये में अगले पूरे 24 घंटों के लिए...

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अप्रतिम योगदान देने वाले चंद्रशेखर आजाद भी उनमें से ही एक हैं। वह आजीवन आजाद रहे और मौत भी उनकी आजादी छीन न सकी।

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आज 15 फरवरी है, लेकिन इतिहास के पन्नों में आज से 89 साल पहले क्या हुआ था, यह शायद कम लोग ही जानते होंगे। आजादी के लिए देश के कोने-कोने में लड़ी गई लड़ाइयां समय-समय पर कहानी और किताबों के माध्यम से सामने आती रही हैं। तारापुर के शहीदों की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

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दिल्ली हाट में चल रहे आदि महोत्सव में देश की समृद्धि जनजातीय संस्कृति की झलक लेने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। ‘जनजातीय भारत आदि महोत्सव’ का सबसे बड़ा आकर्षण यहां आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम हैं, जिनमें भारतीय जनजातीय समुदायों की विविधताओं का प्रदर्शन देखने को मिलता है।

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