बात उन दिनों की है जब लालबहादुर शास्त्री ने इलाहाबाद के सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया ही था और जन सेवा का काम बड़ी रुचि के साथ करने लगे थे। वह एक कर्तव्यनिष्ठ स्वयंसेवक थे। अखबारी प्रचार-प्रसार में उनका ज्यादा विश्वास नहीं था।
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बात उन दिनों की है जब लालबहादुर शास्त्री ने इलाहाबाद के सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया ही था और जन सेवा का काम बड़ी रुचि के साथ करने लगे थे। वह एक कर्तव्यनिष्ठ स्वयंसेवक थे। अखबारी प्रचार-प्रसार में उनका ज्यादा विश्वास नहीं था।
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राज्यसभा के इतिहास में प्रश्नोत्तर काल के दौरान सबसे पहला सवाल तत्कालीन सदस्य सीता परमानंद ने पूछा था। इसके बाद, दूसरा सवाल सावित्री देवी और तीसरा सवाल एक अन्य राज्यसभा सदस्य पार्वती देवी ने पूछा। उस समय राज्यसभा का संचालन पहले अध्यक्ष सर्वपल्ली राधाकृष्णन कर रहे थे। ऐसा संयोग देखकर उन्हें एक मजाक सूझा।
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बात तब की है जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना महामना पंडित मदनमोहन मालवीय द्वारा की जा चुकी थी। इस संस्थान से उन्हें बहुत लगाव था।
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बात उन दिनों की है जब पंडित जवाहर लाल नेहरू तत्कालीन इलाहाबाद नगर महापालिका के अध्यक्ष थे।
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एक बार डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने देखा कि उनकी किसी किताब के कई पन्ने फटे हुए हैं। उन्हें यह बात समझते देर नहीं लगी कि जरूर यह बच्चों का ही काम है।
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बात उन दिनों की है जब महामना मदन मोहन मालवीय काशी हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण कार्य के लिए दान एकत्र करने के काम में लगे हुए थे। इसी सिलसिले में वह हैदराबाद के तत्कालीन निजाम के पास भी गए। लेकिन, निजाम ने किसी भी तरह की मदद करने से इनकार कर दिया।
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एक बार पंडित मोती लाल नेहरू को तेज जुकाम हो गया। स्वदेशी आंदोलन का दौर था और उस समय महात्मा गांधी के आह्वान पर सभी लोग खादी के प्रयोग को प्राथमिकता दे रहे थे। इसके चलते मोती लाल नेहरू भी खादी का रुमाल प्रयोग में ला रहे थे। खादी का रुमाल चूंकि खुरदरा होता है तो इस वजह से उनकी नाक लाल हो गई थी।
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बात उन दिनों की है जब ब्रिटिश हुकूमत ने वीर सावरकर को काला पानी की सजा देकर अंडमान जेल में भेज दिया था। उन्हें 40 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी। और, इसके लिए उनके गले में एक पट्टा डाला गया था जिस पर ‘40 साल का कारावास’ लिखा था।
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सुभाष चंद्र बोस के जीवन का एक ही लक्ष्य था, देश को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराना। इसी उद्देश्य को लेकर द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान महात्मा गांधी और उनके बीच हुई एक बातचीत हमारे गौरवशाली इतिहास की धरोहर है।
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महात्मा गांधी द्वारा सत्य के अनुसरण की तमाम मिसालें दी जाती हैं। हमेशा सत्य का पालन करने की एक ऐसी ही घटना तब घटी जब वह नौवीं कक्षा में पढ़ते थे।
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