एक बार डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने देखा कि उनकी किसी किताब के कई पन्ने फटे हुए हैं। उन्हें यह बात समझते देर नहीं लगी कि जरूर यह बच्चों का ही काम है।
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