आगरा की सूखी नदियां, ग़ायब होते तालाब और अतिक्रमणग्रस्त नहरें


आगरा, जो कभी मुग़लिया सल्तनत की शान और ताजमहल की रूहानी खूबसूरती के लिए मशहूर था, आज अपनी प्यास बुझाने को तरस रहा है।

यह शहर एक ऐसे भविष्य की तस्वीर पेश कर रहा है, जहां पानी की कमी एक बर्बर हकीकत बन चुकी है। यमुना, जो कभी जीवन की धारा हुआ करती थी, आज जहर की नदी बन चुकी है। सीवेज और औद्योगिक कचरे से लबालब यह नदी, दशकों के कुप्रबंधन और जलवायु परिवर्तन की मार झेल रही है। 

कुल 140 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन, जो दूर से गंगाजल लाती है, शहर को सिर्फ़ एक अस्थायी राहत देती है। यह नाज़ुक जीवन रेखा, हालांकि तात्कालिक ज़रूरतों को पूरा करती है, लेकिन यह गहरी और व्यवस्थागत समस्याओं को छिपा लेती है।

पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं, "गंगाजल पाइपलाइन पर अत्यधिक निर्भरता ने एक खतरनाक आत्मसंतुष्टि को जन्म दिया है, जिससे यमुना का क्षरण बेरोकटोक जारी है। ताजमहल के नीचे प्रस्तावित बैराज और यमुना के कायाकल्प के वादे, चाहे वे राष्ट्रीय नेतृत्व के हों या राज्य सरकार के, सभी अधूरे हैं। 2015 में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा दिल्ली से आगरा तक नौका सेवा शुरू करने का वादा भी आज तक हवा-हवाई है।"

यह संकट शहर के केंद्र से बाहर तक फैला हुआ है। ताजमहल से कुछ ही दूरी पर स्थित पचगाई पट्टी गांव के लोग एक मूक त्रासदी झेल रहे हैं। उनका एकमात्र जल स्रोत, भूजल, फ्लोराइड की अधिकता से दूषित हो चुका है, जिससे पीढ़ियों को गंभीर विकृतियों का सामना करना पड़ रहा है। पाइप के जरिये गंगाजल की उनकी गुहार को अनसुना कर दिया गया है।

आगरा सिविल सोसायटी के अनिल शर्मा कहते हैं कि पिछले 25 सालों में, शहर के 90 फीसदी तालाब ग़ायब हो चुके हैं। ये तालाब अनियंत्रित शहरीकरण और भूमि अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए हैं। यमुना की सहायक नदियां भी तलछट और कचरे से भरी हुई हैं, जो उन्हें समान रूप से संकटग्रस्त बना रही हैं। चंबल नदी, जो एक महत्वपूर्ण जल स्रोत है, कम प्रवाह का सामना कर रही है, जबकि उतंगन जैसी छोटी धाराएं पहले ही सूख चुकी हैं।

स्थानीय लोग निर्वाचित अधिकारियों पर उंगलियां उठा रहे हैं, उन पर वादे तोड़ने और निष्क्रियता का आरोप लगा रहे हैं। लेकिन, आगरा का जल संकट कोई अकेली मिसाल नहीं है। पूरा भारत भूजल संकट से जूझ रहा है। उत्तरी भारत ने सिर्फ़ 2002 से 2021 के बीच 450 क्यूबिक किलोमीटर भूजल खो दिया है। विश्व बैंक के अनुसार, 2025 तक भारत के 60 फीसदी भूजल ब्लॉक गंभीर स्तर पर पहुंच जाएंगे। प्रदूषण एक और बड़ी चिंता है, जहां 440 जिलों में भूजल में नाइट्रेट की अत्यधिक मात्रा पाई गई है, जो अनियंत्रित उर्वरक उपयोग और औद्योगिक अपशिष्ट का सीधा नतीजा है। 

समाजशास्त्री प्रो. पारस नाथ चौधरी के मुताबिक वैश्विक स्तर पर भी हालात कम चिंताजनक नहीं हैं। 1980 के दशक से पानी की खपत में सालाना एक फीसदी की वृद्धि हुई है, और 2050 तक मांग में 30 फीसदी की बढ़ोतरी का अनुमान है। दो अरब से ज़्यादा लोग पहले से ही जल-तनाव वाले इलाकों में रह रहे हैं, और चार अरब लोग हर साल कम से कम एक महीने के लिए गंभीर कमी का सामना करते हैं।

दुनिया का 80 फीसदी अपशिष्ट जल, जो मानव और औद्योगिक विषाक्त पदार्थों से भरा हुआ है, बिना उपचारित किए पारिस्थितिकी तंत्र में बहाया जा रहा है। प्लास्टिक प्रदूषण ने जलीय जीवन को और भी बर्बाद कर दिया है। यह नदियों और महासागरों को अवरुद्ध कर रहा है। 

आगरा का संघर्ष इस वैश्विक आपातकाल का एक साफ़ नज़ारा है। अगर तत्काल और निर्णायक कार्रवाई नहीं की गई, तो यह शहर एक ऐसे भविष्य का डरावना नमूना बन जाएगा, जहां पानी की कमी और प्रदूषण अरबों लोगों की ज़िंदगी तबाह हो चुकी है। खोखले वादों और टुकड़ों में समाधान का समय अब खत्म हो चुका है। हमारे बहुमूल्य जल संसाधनों के संरक्षण, प्रबंधन और सुरक्षा के लिए एक ठोस, वैश्विक प्रयास ही उस भविष्य को टाल सकता है, जहां कुएं सूख जाएंगे और नदियां जहर बन जाएंगी।



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