औद्योगिक और राजनीतिक चुनौतियों का दस्तावेज़ है 'जीडीएन'

गोपालस्वामी दोरईस्वामी नायडू का व्यवसायिक दर्शन भारतीय औद्योगिक इतिहास में एक अनोखी मिसाल है। अपने समय में उन्होंने यह साबित किया कि व्यापार केवल लाभ कमाने का साधन ही नहीं है, बल्कि समाज को आत्मनिर्भर बनाने का माध्यम भी है। उनके जीवन का मूल मंत्र तकनीकी नवाचार, व्यावहारिक शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी था।

ब्रिटिश शासनकाल में जब भारत पूरी तरह आयातित मशीनों पर निर्भर था, तब नायडू ने स्थानीय स्तर पर विद्युत मोटर और स्वदेशी कार का निर्माण कर यह साबित किया कि भारतीय प्रतिभा किसी भी विदेशी तकनीक से कम नहीं है।

यही नहीं, उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, संधारित्र यानी कैपेसिटर और प्रतिरोधक सहित कई तरह के इलेक्ट्रॉनिक घटकों का निर्माण किया। उन्होंने कई तरह के कम लागत वाले रेडियो, कृषि उपकरण और उपभोक्ता उत्पाद बनाए। उन्होंने वोटिंग मशीनें, जूस निकालने की मशीनें, कपास छांटने की मशीन,  सिक्का संचालित फोनोग्राफ, इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर, खराद मशीनें, प्रोजेक्टर, पांच-वाल्व रेडियो, वेंडिंग मशीनें, केरोसिन से चलने वाले पंखे और फिल्म कैमरों के लिए दूरी समायोजक जैसे रोजमर्रा काम आने वाले उत्पाद भी बनाए।

इन अविष्कारों के चलते एक समय उन्हें 'भारत का एडिसन' भी कहा जाने लगा था। उनके लिए व्यापार का अर्थ केवल मुनाफा नहीं, बल्कि जन कल्याण था। अनुशासन और सादगी उनके व्यक्तित्व की पहचान थी। वह मानते थे कि एक छोटी-सी गलती भी एक नवाचार को कमजोर कर सकती है, इसलिए उनकी मशीनें और संस्थान सटीकता और सादगी का प्रतीक बने। उनका विश्वास था कि देश को अपनी परिस्थितियों के अनुसार तकनीकी समाधान विकसित करने चाहिए, ताकि आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिले।

शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका दृष्टिकोण व्यावहारिक था। उन्होंने पॉलिटेक्निक और इंडस्ट्रियल स्कूल की स्थापना की, जहां छात्रों को किताबों से अधिक मशीनों और उपकरणों के साथ काम करने का अवसर मिलता था। उनके अनुसार शिक्षा का मतलब केवल डिग्री नहीं, बल्कि वास्तविक समस्याओं का समाधान करने की क्षमता है। यही कारण है कि कोयंबटूर उनके प्रयासों से औद्योगिक केंद्र के रूप में उभरा। उन्होंने साबित किया कि दो वर्ष की अवधि में भी एक बेहतर अभियांत्रिकीय पाठ्यक्रम के जरिये विद्यार्थियों को अच्छी तरह प्रशिक्षित किया जा सकता है।

जीडीएन के प्रयोगों और संस्थानों ने स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा दिया और कोयंबटूर को औद्योगिक हब बना दिया। लेकिन, पहले तत्कालीन अंग्रेजी सरकार और आजादी के बाद कांग्रेसी सरकार के दौरान कराधान और औद्योगिक नीतियों में मौजूद अनियमितताओं ने उनके प्रयासों को कई बार बाधित किया। अत्यधिक कराधान और नौकरशाही की जटिलताओं ने उनके व्यावसायिक प्रयोगों को प्रभावित किया। यही कारण है कि उनके कराधान विवाद उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गए।

हालांकि, बाद की सरकारों ने औद्योगिक नीतियों और कराधान की पुरानी विसंगतियों को दूर करने के लिए कई सुधार किए। कई व्यावसायिक पहलों के जरिये विनिर्माण और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने की कोशिशें की गईं। चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि नायडू जैसे उद्यमियों की सोच आज भी नीति-निर्माताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

आर माधवन अभिनीत फ़िल्म 'जीडीएन' में उनके इस कठिन जीवन के इन पहलुओं को काफी खूबसूरती के साथ परदे पर उतारा गया है। यह फ़िल्म नायडू की जिज्ञासा, अनुशासन और तकनीकी आत्मनिर्भरता को उजागर करती है। माधवन ने नायडू के व्यक्तित्व को पूरी तरह आत्मसात कर लिया है। फ़िल्म का पहला हिस्सा ज्यादा प्रभावी है, जहां युवा नायडू की बेचैन जिज्ञासाएं और प्रयोगशीलता को विस्तार से दिखाया गया है।

हालांकि, पटकथा कभी-कभी घटनाओं को केवल क्रमबद्ध तरीके से ही जोड़ती जाती है, जिससे भावनात्मक गहराई कुछ कम लगने लगती है, लेकिन माधवन का अभिनय इसे संभालता जाता है। सत्यराज, प्रियामणि, दुशारा विजयन और जयाराम कहानी को संतुलित करते नजर आते हैं।

फिल्म की पटकथा में 'नाटकीयता' की गुंजाइश कम ही थी, लेकिन फिर भी नजर आती रहती है। कृष्ण कुमार का निर्देशन ठीकठाक है। अरविंद कमलनाथन की सिनेमेटोग्राफी में पिछली सदी के तीसरे और चौथे दशक का कोयंबटूर बेहद खूबसूरत नजर आता है। गोविंद वसंथा का संगीत फिल्म का साथ निभाता हुआ सा चलता रहता है।

यह फ़िल्म आज के समय में इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि यह हमें याद दिलाती है कि आत्मनिर्भरता का विचार नया नहीं है, बल्कि दशकों पहले ही इसकी मिसाल पेश की जा चुकी थी। यह फ़िल्म केवल एक 'बायोपिक' नहीं, बल्कि उस दौर की औद्योगिक और राजनीतिक चुनौतियों का दस्तावेज़ भी है। इस फिल्म के जरिये नई पीढ़ी को यह समझने का अवसर मिलता है कि नवाचार केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। नायडू का तकनीकी आत्मनिर्भरता, व्यावहारिक शिक्षा और जनकल्याण का दर्शन आज भी उतना ही ज़रूरी है जितना उनके समय में था।

फ़िल्म हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि यदि अतीत में नीतिगत सहयोग मिला होता, तो भारत का औद्योगिक परिदृश्य कहीं अधिक मज़बूत होता। और, आज जब सरकार औद्योगिक सुधारों और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में कदम बढ़ा रही है, तब नायडू की कहानी और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।



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