एकदूसरे के पूरक हैं ईश्वर और उसकी माया


माया और योगमाया दोनों भगवान की शक्ति हैं और शक्ति कभी शक्तिमान से पृथक नहीं हो सकती है। उदाहरण के लिए एक आग है और एक आग में जलाने की शक्ति। अब यदि आग को अलग कर दें और जलाने की शक्ति बची रहे तो यह संभव नहीं है। इसी प्रकार, माया और योगमाया दोनों भगवान की शक्ति हैं।

योगमाया भगवान की अंतरंग शक्ति है। भगवान के जितने भी कार्य होते हैं, वे योगमाया से होते हैं। भगवान जो भी लीला करते हैं, वह भी योगमाया द्वारा करते हैं। भगवान जो भी सोचते हैं, वह योगमाया तुरंत कर देती है। उदाहरण से समझें तो आपने सुना होगा कि कृष्ण ने जब जन्म लिया तो द्वारपाल सो गए, द्वार अपने आप खुल गए और यमुना ने मार्ग दे दिया। ये सब योगमाया से हुआ।

जब भी भगवान का कोई असंभव माना जाने वाला कार्य संभव हो रहा हो तो समझ लीजिए कि यह योगमाया द्वारा हो रहा है। वेदों में कहा गया है कि भगवान स्वतंत्र हैं। वह किसी के अधीन नहीं है, लेकिन यशोदा मैया के डंडे से भगवान डर जाते हैं और स्वयं रस्सी से बंधे चले जाते हैं। एक सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सबको मुक्ति देने वाले भगवान मैया यशोदा की रस्सी से खुदबखुद बंध जाते हैं। आप दैनिक जीवन में देखिए, मां डांटती है तो हम डर जाते हैं। इसकी वजह भी योगमाया ही है।

तात्पर्य यह कि भगवान की जो भी लीलाएं हैं, वे योगमाया से ही संचालित होती हैं। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि भगवान जो कुछ भी करते हैं, वह सब योगमाया द्वारा कार्यान्वित होता है। केवल भगवान नहीं जितने भी संत, महात्मा या सिद्ध पुरुष हुए हैं, वे भी योगमाया की शक्ति से ही कार्य करते हैं।

योगमाया की शक्ति कुछ ऐसी है कि कार्य माया के करते हैं, लेकिन उनको माया प्रतीत नहीं होती है। उदाहरण के लिए, क्रोध माया का विकार है, लेकिन महापुरुष और भगवान भी क्रोध करते हैं, पर यह माया का क्रोध नहीं होता, तथापि वह योगमाया का क्रोध होता है। देखने में लगता है कि भगवान क्रोध कर रहे हैं, चेहरे पर गुस्सा है, लेकिन वह क्रोध योगमाया का है। अर्थात, चेहरे पर क्रोध है, लेकिन अंदर कोई गुस्सा नहीं है। यह योगमाया की विलक्षणता है।

माया भगवान की बहिरंग शक्ति है। यह माया भगवान से विमुख जीवों पर हावी रहती है। जिन्होंने भगवान को प्राप्ति कर लिया, उनसे भगवान माया को हटा देते हैं और उन्हें योगमाया की शक्ति दे देते हैं। इस तरह, संत और ऋषि मुनि माया के कार्य करते हैं, लेकिन माया से परे रहते हैं।

योगमाया दुर्गा, सीता, काली, राधा, लक्ष्मी, मंगला व पार्वती का मूर्त रूप है। इसी योगमाया से कृष्ण राधा का शरीर हैंऔर राधा कृष्ण का। इसीलिए, राधे श्याम हैं और सीता राम हैं। शंकर के घर भवानी हैं योगमाया। ये साधारण नारियां नहीं हैं बल्कि योगमाया के ही अभिनयस्वरूप प्रकट रूप में हैं।

योगमाया को स्त्री रूप नहीं समझना चाहिए। योगमाया भगवान की शक्ति है। यह कोई भी स्वरूप में हो सकती है। योगमाया बिना किसी स्वरूप के भी भगवान और महापुरुष के साथ होती है। नारद और तुलसीदास के पास कोई स्त्री नहीं है, लेकिन योगमाया की शक्ति है।

भगवान के परम व्यक्तित्व ने योगमाया को अपनी लीलाओं में उनके साथियों को चकित करने और कंस जैसे राक्षसों को भ्रमित करने का आदेश दिया। योगमाया अपने आंशिक विस्तार में महामाया बन जाती है और संबंधित आत्माओं को भ्रमित करती है।

इसे और आसान शब्दों में समझें तो संपूर्ण सृष्टि के दो भाग हैं। पारलौकिक या आध्यात्मिक और भौतिक। योगमाया आध्यात्मिक दुनिया का प्रबंधन करती है और महामाया के रूप में अपने आंशिक विस्तार से वह भौतिक दुनिया का प्रबंधन करती है। ‘नारदपंचरात्र’ में कहा गया है कि परम व्यक्तित्व में एक शक्ति है, जिसे कभी-कभी दुर्गा के रूप में वर्णित किया जाता है। ब्रह्म संहिता कहती है कि दुर्गा योगमाया से भिन्न नहीं है। जब व्यक्ति दुर्गा को उचित रूप से समझ जाता है, तो वह तुरंत बंधन-मुक्त हो जाता है। महामाया-शक्ति योगमाया का एक आवरण है। इसलिए, उसे आवरण शक्ति भी कहा जाता है। इस आवरण शक्ति से संपूर्ण भौतिक जगत भ्रमित है। निष्कर्ष यह है किसी भी जीवों को भ्रमित करना और भक्तों को मुक्त करना दोनों ही कार्य योगमाया के हैं। देवकी के गर्भावस्था को स्थानांतरित करना और मैया यशोदा को गहरी नींद में रखना दोनों योगमाया द्वारा किए गए कार्य थे। यद्यपि, महामाया के लिए मुक्त आत्माओं या भगवान के परम व्यक्तित्व को नियंत्रित करना संभव नहीं है। उन्होंने कंस को भ्रमित किया था। कंस के समक्ष स्वयं को प्रस्तुत करने का योगमाया का कार्य महामाया का था। योगमाया कंस जैसे भ्रष्ट व्यक्तियों को देख या छू भी नहीं सकती।

मार्कण्डेय पुराण के11वें अध्यायचण्डी में महामाया कहती हैं कि वह यशोदा की बेटी के रूप में जन्म लेंगी और विंध्याचलवासिनी के रूप में जानी जाएंगी। दोनों मायाओं के बीच के भेद को एक और तरह से समझ सकते हैं। गोपियों के साथ कृष्ण की रासलीला और उनके पतियों, श्वसुरों और ऐसे अन्य संबंधियों के बारे में गोपियों की घबराहट योगमाया का प्रबंध था। इसमें महामाया का कोई प्रभाव नहीं था। भागवत में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि शाल्व और दुर्योधन जैसे क्षत्रियों द्वारा नीत असुर थे, जो कृष्ण के वाहन गरुड़ और उनके विराट स्वरूप को देखने पर भी भक्ति सेवा से वंचित थे। वे यह नहीं समझ सके कि कृष्ण ही भगवान के परम व्यक्तित्व हैं। यह भी भ्रम था, लेकिन यह भ्रम महामाया के कारण था। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जो माया किसी व्यक्ति को भगवान के परम व्यक्तित्व से परे खींचती है, उसे ‘जड़माया’ कहा जाता है। दूसरी ओर, वह माया जो पारलौकिक स्तर पर कार्य करती है, उसे योगमाया कहा जाता है।



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