कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें सुनते हुए लगता है जैसे समय ठहर गया हो। जैसे, किसी पुराने महल की दीवारों में सदियों से कैद कोई प्रेमकथा अचानक सांस लेने लगी हो। जैसे, किसी विरहिणी के दिल में दबे हुए आंसू सुर बनकर बाहर आ गए हों। और, जैसे, संगीत के सामने राजसत्ता, वैभव और दुनिया की तमाम चकाचौंध छोटी पड़ गई हो।
साल 1960 में जब के आसिफ की फ़िल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’ पर्दे पर आई, तो दर्शकों ने महज एक प्रेमकथा ही नहीं देखी बल्कि उन्होंने एक ऐसा सिनेमाई संसार देखा, जिसमें शहंशाह का रुतबा था, शहज़ादे की बग़ावत थी, अनारकली का प्रेम था और उस प्रेम की पीड़ा को आवाज़ देने वाला ऐसा संगीत था, जिसकी गूंज आज भी कम नहीं हुई है।
इसी फ़िल्म में एक जगह ऐसी आती है, जहां बड़े ग़ुलाम अली ख़ान की आवाज़ सुनाई देती है। गीत है, ‘प्रेम जोगन बन के...’। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि शास्त्रीय संगीत की उस विरासत का सिनेमाई प्रवेश था, जिसे अपने भीतर समेटने की हिम्मत हर फ़िल्मकार नहीं कर सकता था।
कहानी कुछ यूं है कि के आसिफ अपनी फ़िल्म को लेकर कोई समझौता करने के मूड में नहीं थे। वह चाहते थे कि ‘मुग़ल-ए-आज़म’ का संगीत भी उसी शान और गरिमा वाला हो, जैसी उसकी भव्यता थी। नौशाद फ़िल्म के संगीतकार थे और उन्हें मालूम था कि इस ऐतिहासिक प्रेमकथा के कुछ क्षणों को साधारण फ़िल्मी गायकी से अलग, किसी असाधारण आवाज़ की ज़रूरत है। और, उनकी निगाह पहुंची उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान पर।
लेकिन, ख़ान साहब फ़िल्मों के लिए गाने को लेकर उत्साहित नहीं थे। वह शास्त्रीय संगीत के अपने संसार में प्रतिष्ठित थे। उनके लिए संगीत कोई ऐसा सामान नहीं था, जिसे फ़िल्म की ज़रूरत के मुताबिक़ ढाल दिया जाए। उनकी गायकी की अपनी गरिमा थी और वह उसे बनाए रखना चाहते थे।
यह जानकर, नौशाद और के आसिफ, खान साहब को मनाने उनके पास पहुंचे। मगर उस्ताद कहां आसानी से तैयार होने वाले थे। बड़े गुलाम अली खान ने उन्हें टरकाने के लिए एक बड़े पारिश्रमिक की मांग कर दी। कहा जाता है कि बड़े ग़ुलाम अली ख़ान ने एक गीत के लिए 25,000 रुपये मांग लिए। यह रकम उस समय के फ़िल्मी गायकों को मिलने वाले पारिश्रमिक से कई गुना अधिक थी। उन दिनों लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी जैसे शीर्ष पार्श्वगायकों को भी लगभग 300-400 रुपये प्रति गीत मिलते थे। कहा जाता है कि खान साहब को उम्मीद थी कि इतनी बड़ी रकम सुनकर फ़िल्मकार पीछे हट जाएंगे। लेकिन, के आसिफ ने इस शर्त को स्वीकार कर लिया। उनके लिए ‘मुग़ल-ए-आज़म’ का स्तर किसी भी समझौते से ऊपर था। अब उस्ताद के सामने भी फ़िल्म के लिए गाने से इनकार करने की गुंजाइश कम रह गई थी।
रिकॉर्डिंग हुई और बड़े ग़ुलाम अली ख़ान ने ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के लिए दो रचनाएं गाईं, ‘प्रेम जोगन बन के...’ और ‘शुभ दिन आयो राज दुलारा...’। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना थी। एक ऐसे शास्त्रीय गायक की आवाज़, जो सामान्यतः फ़िल्मी संगीत की दुनिया से दूर रहता था, अब भारतीय सिनेमा की सबसे महत्वाकांक्षी फ़िल्मों में सुनाई देने वाली थी।
लेकिन ‘प्रेम जोगन बन के...’ का पर्दे पर आना अपने आप में एक अलग कहानी बन गया। सलीम और अनारकली प्रेम में डूबे हुए हैं। दृश्य में कोई बड़ी हलचल नहीं है। कोई युद्ध नहीं, कोई दरबार नहीं, कोई भारी-भरकम संवाद नहीं। बस, वातावरण में एक अजीब सी शांति है। सलीम बेहद कोमलता से एक पंख अनारकली के चेहरे पर फेरता है। कैमरा दोनों के चेहरों पर ठहरता है और तभी बड़े ग़ुलाम अली ख़ान की आवाज़ वातावरण में उतरती है, ‘प्रेम जोगन बन के...’
बस, यहीं से दृश्य साधारण प्रेम-दृश्य नहीं रह जाता है। मधुबाला की आंखों में प्रेम, संकोच और समर्पण के भाव उभरते हैं। सलीम के रूप में दिलीप कुमार भी खामोश है। दोनों के बीच संवाद शब्दों से नहीं, आंखों और भाव-भंगिमाओं से होता है। पर्दे के पीछे बड़े ग़ुलाम अली ख़ान की आवाज़ उस खामोशी को अर्थ देती जाती है।
बड़े गुलाम अली खान की आवाज़ में प्रेम कोई हल्का या क्षणिक आकर्षण नहीं लगता है। उसमें एक तरह की तन्मयता है, जैसे प्रेम स्वयं साधना बन गया हो। यही ‘प्रेम जोगन बन के...’ का सबसे प्रभावशाली पक्ष है। शास्त्रीय गायकी की गहराई और मधुबाला के अभिनय की कोमलता एक-दूसरे में इस तरह घुल जाती है कि दर्शक गीत को केवल सुनता नहीं बल्कि उसे दृश्य के साथ महसूस करता जाता है।
पर्दे पर इस गीत को जिस तरह प्रस्तुत किया गया, उसमें भी के आसिफ की सिनेमाई समझ दिखाई देती है। विशाल सेट और भव्यता के लिए प्रसिद्ध ‘मुग़ल-ए-आज़म’ में यह क्षण अपेक्षाकृत शांत और अंतरंग है। कैमरा चेहरे के भावों को पकड़ता है और संगीत को दृश्य के भीतर सांस लेने की जगह देता है। बड़े ग़ुलाम अली ख़ान पर्दे पर दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन उनकी आवाज़ दो प्रेमियों के बीच मौजूद, मगर दिखाई न देने वाला एक किरदार बन जाती है।
यही वह प्रयोग था जिसने ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के संगीत को अलग ऊंचाई दी। फ़िल्म में लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी और शमशाद बेगम जैसे लोकप्रिय गायकों की भी आवाज़ें थीं, लेकिन बड़े ग़ुलाम अली ख़ान की आवाज़ का रंग बिल्कुल अलग था। वह आवाज़ फ़िल्म को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की उस परंपरा से जोड़ती है, जिसकी गंभीरता और गरिमा कहानी के मुग़लिया वातावरण के अनुकूल थी। ‘मुग़ल-ए-आज़म’ की सफलता में ‘प्रेम जोगन बन के...’ की भूमिका को इसी संदर्भ में समझना चाहिए।
यह कहना ठीक नहीं होगा कि फ़िल्म केवल इस गीत की वजह से ही सफल हुई। फ़िल्म की लोकप्रियता में उसकी कहानी, अभिनय, संवाद, भव्य निर्माण और संगीत बराबर महत्वपूर्ण थे। ‘प्यार किया तो डरना क्या...’, ‘मोहे पनघट पे...’ और ‘तेरी महफ़िल में...’ जैसे गीतों ने उसे घर-घर पहुंचा दिया। लेकिन, ‘प्रेम जोगन बन के...’ ने उस प्रेमकथा में एक ऐसी शास्त्रीय गहराई जोड़ दी, जो फ़िल्म के दूसरे गीतों से अलग थी।
ये गाने बड़े ग़ुलाम अली ख़ान के लिए फ़िल्मी संसार में किसी लंबी पारी की शुरुआत नहीं बने। उन्होंने ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के लिए ये दो गाने गाए और फिर अपने शास्त्रीय संगीत के संसार में लौट गए। फ़िल्मों में नियमित पार्श्वगायन उनके संगीत जीवन का हिस्सा नहीं बना। इसीलिए, ‘मुग़ल-ए-आज़म’ में उनकी आवाज़ का आना और भी विशेष बन जाता है, जैसे किसी महान कलाकार ने अपनी विशाल संगीत-यात्रा से सिनेमा को कुछ अनमोल क्षण उधार दे दिए हों।
समय बीतता गया। ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के सेट पुराने हो गए, तकनीक बदल गई, सिनेमाई पर्दे का रंग बदल गया और सिनेमा की भाषा भी बदलती चली गई। लेकिन, ‘प्रेम जोगन बन के’ का वह दृश्य आज भी अपनी जगह पर जमा हुआ है।
बड़े ग़ुलाम अली ख़ान की आवाज़ ने कुछ मिनटों के लिए पर्दे पर मौजूद प्रेम को समय से बाहर कर दिया। दृश्य समाप्त हो जाता है, लेकिन उसकी अनुभूति बनी रहती है। और, यही वजह है कि ‘प्रेम जोगन बन के...’ को याद करते हुए ‘मुग़ल-ए-आज़म’ महज एक भव्य फ़िल्म ही नहीं रह जाती बल्कि वह एक ऐसी प्रेमकथा बन जाती है, जिसमें संगीत भी एक किरदार है, एक ऐसा किरदार, जो दिखाई नहीं देता, मगर कहानी खत्म होने के बहुत देर तक सुनाई देता रहता है।

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