कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनके जरिये प्रेम में डूबे किसी युवा को अपने दिल की आवाज सुनाई देती है तो उम्र के अनुभवों से गुजर चुके व्यक्ति को उनमें अपने बीते दिनों की कसक महसूस होती है। साल 1981 में आई फिल्म ‘कुदरत’ का गीत ‘हमें तुमसे प्यार कितना...’ इसी श्रेणी का गीत है। इसके शब्दों में प्रेम की गहराई है, धुन में एक अनकही बेचैनी और गायकी में ऐसा भावनात्मक ठहराव है, जो सुनने वाले को 'स्वयं' से जोड़ देता है।
चेतन आनंद के निर्देशन में बनी ‘कुदरत’ अपने समय की उन फिल्मों में थी, जिन्होंने प्रेम कहानी को पुनर्जन्म, रहस्य और अतीत की स्मृतियों के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया। राजेश खन्ना, हेमा मालिनी, राज कुमार, विनोद खन्ना और प्रिया राजवंश जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म की कहानी शिमला की पहाड़ियों से शुरू होकर, पिछले जन्म के रिश्तों और अधूरी इच्छाओं की उलझनों तक पहुंचती है। फिल्म की नायिका 'चंद्रमुखी' को अपने वर्तमान जीवन में कुछ ऐसे अनुभव होते हैं, जिनका संबंध उसके किसी पुराने अस्तित्व से जुड़ता है। अतीत और वर्तमान के बीच का यह रहस्य फिल्म को केवल एक प्रेम कथा नहीं रहने देता है, बल्कि नियति, स्मृति और न्याय से जुड़े सवाल भी खड़े करता है।
इसी भावभूमि पर ‘हमें तुमसे प्यार कितना...’ का महत्व समझ में आता है। यह केवल प्रेमी द्वारा प्रेमिका के प्रति अपने आकर्षण का इजहार नहीं है बल्कि इसके अंदर उस प्रेम की अनुभूति भी है, जिसकी गहराई को स्वयं प्रेम करने वाला पूरी तरह शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाता है। गीत का केंद्रीय भाव यही है कि प्रेम को मापने का कोई पैमाना नहीं होता है। मनुष्य अपने मन की बेचैनी को महसूस तो कर सकता है, लेकिन उसकी सीमा निर्धारित नहीं कर सकता है। फिल्म की कहानी में जब अतीत की परछाइयां वर्तमान के संबंधों को प्रभावित करती हैं, तब इस गीत की भावनात्मक गूंज और गहरी हो जाती है।
इस गीत की रचना राहुल देव बर्मन ने की थी और इसके बोल मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे। इसे दो अलग-अलग गायन शैलियों में प्रस्तुत किया गया। किशोर कुमार की आवाज में इसका पुरुष संस्करण लोकप्रिय हुआ, जबकि शास्त्रीय गायिका बेगम परवीन सुल्ताना ने अपने विशिष्ट अंदाज में इसका स्त्री संस्करण गाया। दोनों प्रस्तुतियां एक ही भाव को अलग-अलग रंग से भर देती हैं। किशोर कुमार की गायकी में सहजता, आत्मीयता और प्रेम में डूबे व्यक्ति की निजी स्वीकारोक्ति सुनाई देती है तो परवीन सुल्ताना की आवाज में शास्त्रीय संगीत की गहराई, सुरों का विस्तार और भावों की ऐसी उठान है, जो गीत को एक अलग ऊंचाई प्रदान करती है।
राहुल देव बर्मन की संगीत प्रतिभा का विशेष पक्ष यह था कि वह भारतीय शास्त्रीय संगीत की बारीकियों को लोकप्रिय फिल्मी धुनों में इस तरह पिरो सकते थे कि संगीत के जानकार और सामान्य श्रोता, दोनों उससे जुड़ जाएं। ‘हमें तुमसे प्यार कितना...’ इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण है। इस गीत की धुन राग भैरवी पर आधारित है। भैरवी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का अत्यंत लोकप्रिय राग है, जिसमें कोमल स्वरों के प्रयोग से करुणा, विरह, अनुराग और आत्मीयता जैसे भावों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया जा सकता है।
राग भैरवी की विशेषता यह है कि उसकी धुन में एक ओर अपनापन महसूस होता है, तो दूसरी ओर मन के भीतर छिपी उदासी भी उभर आती है। ‘हमें तुमसे प्यार कितना...’ में प्रेम की मिठास के साथ विरह की आशंका और भावनात्मक निर्भरता का अहसास इसी कारण सहजता से सामने आता है। धुन न तो भावनाओं को अनावश्यक रूप से नाटकीय बनाती है और न उन्हें इतना हल्का करती है कि उनका असर समाप्त हो जाए। संगीत की यही संतुलित अभिव्यक्ति गीत को लंबे समय तक याद रहने वाला अनुभव बनाती है।
किशोर कुमार के संस्करण में धुन का प्रवाह अपेक्षाकृत सहज और सीधा लगता है। मुखड़े के बाद पहले ही अंतरे से गीत अपनी ऊंचाई पर पहुंच जाता है। उनकी आवाज में ऐसा अपनापन है, मानो कोई व्यक्ति अपने प्रिय के सामने बिना किसी बनावट के अपने मन की बात कह रहा हो। दूसरी ओर, परवीन सुल्ताना का संस्करण उनकी शास्त्रीय साधना के अनुरूप सुरों के विस्तार और आलाप की संभावनाओं को सामने लाता है। इस तरह एक ही गीत प्रेम की दो अलग अनुभूतियां बन जाता है। यह अंतर केवल पुरुष और स्त्री की आवाज का नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की दो संगीत परंपराओं का भी है। परवीन सुल्ताना को इस गीत के लिए 1982 में फिल्मफेयर का 'सर्वश्रेष्ठ गायिका' का पुरस्कार मिला था। किशोर कुमार को भी पुरुष संस्करण के लिए नामांकन मिला।
गीत की सफलता में मजरूह सुल्तानपुरी के शब्दों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। प्रेम को व्यक्त करने के लिए बड़े-बड़े रूपकों, कठिन शब्दों या असाधारण कल्पनाओं की आवश्यकता नहीं होती है, यह गीत इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। इसके बोल एक ऐसे सामान्य अनुभव को छूते हैं, जिसे अलग-अलग परिस्थितियों में लगभग हर व्यक्ति महसूस कर सकता है। प्रेम में डूबा मन अपने भावों की गहराई जानना चाहता है, लेकिन उसी समय उसे यह भी लगता है कि शब्द उस अनुभूति को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकते हैं।
फिल्म में इस गीत का बार-बार आना भी उसके महत्व को बढ़ाता है। इसकी धुन केवल मनोरंजन के लिए नहीं आती है, बल्कि फिल्म के भावनात्मक वातावरण को मजबूत करती है। ‘कुदरत’ में अतीत और वर्तमान के बीच संबंध धीरे-धीरे खुलते हैं। ऐसे में प्रेम की धुन स्मृति, बिछोह और उन रिश्तों की ओर संकेत करती है, जिनका असर समय बीत जाने के बाद भी समाप्त नहीं होता है। फिल्म का रहस्य दर्शक को यह जानने के लिए उत्सुक रखता है कि घटनाओं के पीछे क्या सच है, जबकि गीत उसके भीतर पात्रों के भावनात्मक संसार से जुड़ाव पैदा करता है।
नई पीढ़ी इस गीत को अपनी पहली मोहब्बत, आकर्षण या किसी अनकहे रिश्ते से जोड़ती है, जबकि पुरानी पीढ़ी के लिए यह बीते समय की स्मृतियों और जीवन के उन क्षणों को फिर से महसूस करने का माध्यम बनता है।
इस गीत में आवाज, शब्द और संगीत एक-दूसरे पर हावी होने के बजाय एक-दूसरे को पूरा करते हैं। इसे सुनने के लिए किसी विशेष संगीत ज्ञान की आवश्यकता नहीं है, लेकिन शास्त्रीय संगीत की समझ रखने वाला श्रोता इसमें राग की छाया, सुरों की बारीकी और गायकी के अंतर का आनंद ढूंढ लेता है।
किसी श्रोता को किशोर कुमार की सहज और आत्मीय आवाज अधिक पसंद आ सकती है, तो कोई परवीन सुल्ताना के शास्त्रीय अंदाज में डूबना चाहेगा। एक ही रचना को दो अलग अनुभवों के रूप में सुनने की यह सुविधा गीत को बार-बार सुनने योग्य बनाती है।
दरअसल, किसी गीत का कालजयी होना केवल उसकी लोकप्रियता से तय नहीं होता है। जरूरी यह है कि समय बदलने के बाद भी उसमें व्यक्त भावना अपना अर्थ न खोए। ‘हमें तुमसे प्यार कितना...’ आज भी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि यह प्रेम को किसी उपलब्धि या दावे की तरह प्रस्तुत नहीं करता है। इसमें प्रेम एक ऐसी अनुभूति है, जिसे महसूस किया जा सकता है, लेकिन पूरी तरह समझ लेना संभव नहीं है। यही अनिश्चितता इसे मानवीय बनाती है।
चार दशक से अधिक समय गुजर जाने के बावजूद, यह गीत श्रोताओं को इसलिए आकर्षित करता है क्योंकि इसकी धुन में शास्त्रीय संगीत की मिठास, शब्दों में सरलता और गायकी में भावनात्मक ईमानदारी है। शायद इसी कारण इसे सुनने वाला हर नया श्रोता इससे जुड़ जाता है।

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