अंतरिक्ष में उज्ज्वल है नए भारत का भविष्य

पिछले एक दशक में भारत की अंतरिक्ष यात्रा ‘विश्वास, विकास और जनकल्याण’ की भावना को प्रतिबिंबित कर रही है। भारत दुनिया की अग्रणी अंतरिक्ष शक्तियों में उभरकर सामने आया है। इस अवधि की प्रमुख उपलब्धियों में चंद्रयान-3 का चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सफलतापूर्वक उतरना, आदित्य-एल1 का सौर मिशन तथा गगनयान और राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की तैयारियां शामिल हैं।

अंतरिक्ष क्षेत्र में स्टार्टअप की संख्या जो 2014 में केवल एक थी, फरवरी 2026 तक बढ़कर 400 से अधिक हो गई है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के उदार बनाए गए नियमों, निजी क्षेत्र की बढ़ी हुई भागीदारी तथा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड के नेतृत्व में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण ने इस क्षेत्र की प्रगति को नई गति दी है। ये उपलब्धियां एक ऐसे आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर प्रस्तुत करती हैं, जो विकास, वैश्विक साझेदारी और समावेशी प्रगति के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग कर रहा है।

पिछले दशक में भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम राष्ट्रीय आत्मविश्वास, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक महत्वाकांक्षा का प्रतीक बनकर उभरा है। एक वैज्ञानिक प्रयास के रूप में शुरू हुई यात्रा, आज एक ऐसी रणनीतिक राष्ट्रीय संपदा में परिवर्तित हो चुकी है, जो विकास को गति देती है, राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करती है, नवाचार को बढ़ावा देती है और विश्व पटल पर भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाती है।

इस परिवर्तन को तीन प्रमुख आधारस्तंभों ने आकार दिया है। पहला, भारत की अंतरिक्ष क्षमता ने ऐतिहासिक अंतरिक्ष अभियानों, उन्नत प्रक्षेपण प्रणालियों और स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के माध्यम से देश की पहुंच पृथ्वी से कहीं आगे तक विस्तारित की है। इसके अतिरिक्‍त, राष्ट्रीय क्षमता निर्माण के अंतर्गत अंतरिक्ष-आधारित ऐप्‍लीकेशन का उपयोग कर सुशासन, संपर्क, आपदा प्रबंधन, कृषि, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और आर्थिक विकास को नई मजबूती प्रदान की गई है।

वैश्विक साझेदारी और सहयोगात्मक नेतृत्व ने भारत को एक विश्वसनीय अंतरिक्ष भागीदार के रूप में स्थापित किया है। इससे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का दायरा बढ़ा है तथा अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण और जिम्मेदार उपयोग के प्रति भारत की भूमिका और अधिक सुदृढ़ हुई है।

ये उपलब्धियां उस राष्ट्र की यात्रा को दर्शाती हैं, जो न केवल अंतरिक्ष के नए आयामों को छू रहा है, बल्कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग अपने नागरिकों को सशक्त बनाने, अपनी संस्थाओं को मजबूत करने और वैश्विक मंच पर भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए भी कर रहा है। यह एक ऐसी यात्रा है, जो राष्ट्रीय उद्देश्य से प्रेरित है और प्रत्येक नागरिक के जीवन को बेहतर बनाने पर केन्द्रित है।

पिछले दशक में भारत ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम के दायरे का लगातार विस्तार किया है। इसकी शुरुआत अंतरिक्ष अन्वेषण पर केन्‍द्रित प्रयासों से हुई थी, जो अब वैज्ञानिक अनुसंधान को आगे बढ़ाने, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के विकास और राष्ट्रीय क्षमताओं को सुदृढ़ करने के एक व्यापक प्रयास में परिवर्तित हो चुका है। आज भारत गहन अंतरिक्ष अन्वेषण, अंतरिक्ष विज्ञान, मानव अंतरिक्ष उड़ान और कक्षीय अवसंरचना के क्षेत्रों में महत्वाकांक्षी लक्ष्यों की दिशा में कार्य कर रहा है। ये उपलब्धियां भारत के बढ़ते आत्मविश्वास, तकनीकी परिपक्वता और वैश्विक अंतरिक्ष इकोसिस्‍टम में उसकी दीर्घकालिक भूमिका की कल्‍पना को दर्शाती हैं।

भारत की चंद्र यात्रा वैज्ञानिक खोज और तकनीकी प्रगति के प्रति एक स्‍थायी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। इसकी नींव 2008 में चंद्रयान-1 के साथ रखी गई थी, जो भारत का चंद्रमा पर पहला मिशन था। इस मिशन ने चंद्रमा की सतह पर जल अणुओं और हाइड्रॉक्सिल की उपस्थिति के साक्ष्य खोजकर चंद्रमा के संसाधनों की वैश्विक समझ को बदल दिया। इसकी चन्‍द्र प्रभाव जांच ने चंद्रमा के बाह्यमंडल के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की। इसके बाद 2019 में प्रक्षेपित चंद्रयान-2 ने भारत के चन्‍द्र कार्यक्रम को और मजबूत किया। 100 किलोमीटर की ऊंचाई से इसने चन्‍द्रमा की सतह की अत्यंत उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाली कुछ बेहतरीन छवियां प्रदान कीं और 30 सेंटीमीटर तक सूक्ष्म विवरणों को भी पकड़ा।

चंद्रयान-1 और चंद्रयान-2 ने भारत को वैश्विक चन्‍द्र विज्ञान में एक गंभीर और महत्वपूर्ण योगदानकर्ता के रूप में स्थापित किया तथा भविष्य के अन्वेषण के लिए मजबूत आधार तैयार किया। यह आधार 23 अगस्त 2023 को एक ऐतिहासिक अभूतपूर्व उपलब्धि के रूप में सामने आया। चंद्रयान-3 ने भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला विश्व का पहला देश और अमेरिका, रूस और चीन के बाद चन्‍द्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला चौथा देश बना दिया।

विक्रम लैंडर ने 69.3° दक्षिण अक्षांश पर उतरकर वह क्षेत्र छुआ जहाँ पहले कोई भी अंतरिक्ष यान नहीं पहुंचा था। इसके वैज्ञानिक उपकरणों ने स्थल पर अध्ययन किए और प्रत्यक्ष तत्वीय विश्लेषण के माध्यम से सल्फर की उपस्थिति की पुष्टि की। भारत की चन्‍द्र महत्वाकांक्षाएँ लगातार बढ़ रही हैं। 2027 के लिए प्रस्तावित चंद्रयान-4 का उद्देश्य चंद्रमा पर उतरकर नमूने एकत्र करना और उन्हें पृथ्वी पर वापस लाना है। चंद्रयान-5/लूनर पोलर एक्‍सप्‍लोरेशन मिशन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के नजदीक स्थायी रूप से छाया वाले क्षेत्रों में जल और अन्य वाष्पशील पदार्थों की खोज करेगा, जिससे भारत चंद्रमा अन्वेषण के अगले युग में और गहराई तक प्रवेश करेगा।

मार्स ऑर्बिटर मिशन, जिसे ‘मंगलयान’ के नाम से जाना जाता है, ने भारत को ग्रहों के बीच अन्वेषण में प्रवेश दिलाया। 24 सितम्‍बर 2014 को इस अंतरिक्ष यान ने सफलतापूर्वक मंगल की कक्षा में प्रवेश किया, जिससे भारत अपने पहले ही प्रयास में मंगल तक पहुंचने वाला विश्व का पहला देश बन गया। इस उपलब्धि के साथ इसरो अमेरिका की नासा, रूस की रोसकॉसमॉस और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद मंगल की कक्षा में किसी अंतरिक्ष यान को स्थापित करने वाली दुनिया की चौथी अंतरिक्ष एजेंसी बन गया।

मूल रूप से छह महीने के मिशन के लिए तैयार किया गया मंगलयान आठ वर्षों से अधिक समय तक सक्रिय रहा, जो अपेक्षाओं से कहीं अधिक था। इस मिशन ने मंगल के वायुमंडल, बाह्यमंडल, सतही संरचनाओं और सूर्य के उत्सर्जित आवेशित कणों की धारा के लगातार ग्रहों, धूमकेतु या अंतरिक्ष में अन्‍य खगोलीय पिंडों के बीच होने टक्करों पर मूल्यवान वैज्ञानिक आंकड़े प्रदान किए। इसके अलावा अपने वैज्ञानिक योगदानों से आगे बढ़कर, मंगलयान ने जटिल गहन अंतरिक्ष मिशनों को अत्यंत दक्षता के साथ संचालित करने की भारत की क्षमता को प्रदर्शित किया और ग्रहों के अन्वेषण में देश को एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में स्थापित किया।

आदित्य-एल1 के साथ भारत ने ग्रहों के अन्वेषण से आगे बढ़ते हुए अपनी अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं का विस्तार किया, जो देश का पहला समर्पित सौर मिशन है। 2023 में प्रक्षेपित इस अंतरिक्ष यान को सफलतापूर्वक सूर्य-पृथ्वी एल1 लैग्ररेंज प्‍वाइंट के चारों ओर प्रभामंडल कक्षा में स्थापित किया गया, जो पृथ्वी से लगभग 1.5 मिलियन किलोमीटर दूर है। यह विशिष्ट स्थिति सूर्य और उसकी गतिशील गतिविधियों के निरंतर और निर्बाध अवलोकन को संभव बनाती है। यह मिशन सूर्य के कोरोना, सौर वायु और अंतरिक्ष मौसम संबंधी घटनाओं का अध्ययन करता है, जो पृथ्वी के पर्यावरण और तकनीकी प्रणालियों को प्रभावित करते हैं।

आदित्य-एल1 को प्रस्ताव-आधारित वेधशाला के रूप में राष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय के लिए भी उपलब्ध कराया गया है। वैज्ञानिक आंकड़े नियमित रूप से सार्वजनिक किए जाते हैं, जिससे वैश्विक सौर अनुसंधान को मजबूती मिलती है। अब तक 27 टेराबाइट से अधिक सौर अवलोकन डेटा साझा किया जा चुका है, जिससे यह मिशन अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक जानकारी में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता बन गया है।

भारत ने खगोल विज्ञान और कक्षा-आधारित प्रौद्योगिकी प्रदर्शन के माध्यम से उन्नत अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी स्थिति को और मजबूत किया है। भारत की पहली बहु-वैवलैंग्‍थ अंतरिक्ष वेधशाला, एस्ट्रोसैट ने सितम्‍बर 2025 में कक्षा में अपने 10 वर्ष पूरे किए और इसने कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजों में योगदान दिया है। एक जनवरी 2024 को प्रक्षेपित एक्सपोसैट ने एक्स-रे खगोल विज्ञान में भारत की क्षमताओं का और विस्तार किया है। ये दोनों मिशन प्रस्ताव-आधारित वेधशालाओं के रूप में विश्वभर के शोधकर्ताओं की सेवा करते हुए निरन्‍तर कार्य कर रहे हैं।

भारत ने जनवरी 2025 में स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट के माध्यम से एक महत्वपूर्ण तकनीकी सफलता भी हासिल की। इस मिशन ने भारत को अमेरिका, रूस और चीन के बाद अंतरिक्ष में स्वायत्त डॉकिंग और अनडॉकिंग का प्रदर्शन करने वाला विश्व का चौथा देश बना दिया। इसरो ने डॉक किए गए उपग्रहों के बीच ऊर्जा स्थानांतरण का प्रदर्शन भी किया तथा सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण में रोबोटिक आर्म का परीक्षण किया। स्वदेशी ‘भारतीय डॉकिंग सिस्टम’ का सफल विकास एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जो भारत के आगामी प्रमुख मिशनों—जैसे भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन, चंद्रयान-4 और गगनयान—के निर्बाध संचालन को संभव बनाएगा।

चंद्रमा और मंगल पर अपनी उपलब्धियों के आधार पर भारत अब शुक्र ग्रह के लिए अपने पहले मिशन की तैयारी कर रहा है। भारत सरकार द्वारा अनुमोदित शुक्र ऑर्बिटर मिशन को मार्च 2028 में प्रक्षेपित करने का लक्ष्य रखा गया है। यह मिशन शुक्र ग्रह की भूगर्भीय संरचना, सतह की संरचना, वायुमंडल, आयनमंडल तथा पुनर्सतहीकरण प्रक्रियाओं का अध्ययन करेगा। वैज्ञानिक यह भी जांच करेंगे कि सूर्य की गतिविधियां इस ग्रह के वायुमंडल और निकट-अंतरिक्ष पर्यावरण को कैसे प्रभावित करती हैं।

यह मिशन भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी छलांग होगी। इसमें एयरोब्रेकिंग और उन्नत थर्मल प्रबंधन प्रणालियों जैसी क्षमताओं का प्रयास किया जाएगा, ताकि शुक्र की अत्यंत कठिन परिस्थितियों में कार्य किया जा सके। इन तकनीकों का उपयोग इसरो द्वारा पहली बार किया जा रहा है और यह भारत की गहन अंतरिक्ष अन्वेषण तथा ग्रह विज्ञान में विशेषज्ञता को और मजबूत करेगा।

जनवरी 2019 में अनुमोदित इस मिशन का उद्देश्य तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को लगभग 400 किलोमीटर की कक्षा में तीन दिन तक भेजना और फिर उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाना है। इस कार्यक्रम में दो मानव रहित मिशन और एक मानवयुक्त मिशन शामिल हैं। यह कार्यक्रम 2025 में अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है। अंतरिक्ष अन्वेषण से आगे बढ़कर, गगनयान भारतीय उद्योग को सशक्त बना रहा है, नई प्रौद्योगिकियों का विकास कर रहा है और भारत को उन चुनिंदा देशों के और करीब ला रहा है, जिनके पास स्वतंत्र रूप से मनुष्यों को अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता है।

गगनयान की तैयारियों के अंतर्गत, भारत ने 2025 में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए इसरो-नासा समर्थित एक्सिओम-4 मिशन में भाग लिया। ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने 25 जून 2025 को फाल्कन 9 द्वारा प्रक्षेपित स्पेसएक्स ड्रैगन अंतरिक्ष यान में यात्रा की। इस मिशन के दौरान उन्होंने भारतीय अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित सात सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण प्रयोग किए। इन अध्ययनों में मांसपेशियों के पुनर्जनन, शैवाल की वृद्धि, फसल की उपयुक्तता, सूक्ष्मजीवों की जीवित रहने की क्षमता, संज्ञानात्मक प्रदर्शन तथा अंतरिक्ष में साइनोबैक्टीरिया के व्यवहार का परीक्षण शामिल था।

यह मिशन 15 जुलाई 2025 को सफलतापूर्वक अनडॉकिंग, पुनः प्रवेश और स्प्लैशडाउन के साथ संपन्न हुआ। अपने वैज्ञानिक परिणामों से आगे बढ़कर, एक्सिओम-4 मिशन ने भारत को अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण, मानव अंतरिक्ष उड़ान प्रक्रियाओं, माइक्रोग्रैविटी अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में मूल्यवान परिचालन अनुभव प्रदान किया, जिससे देश की भविष्य की मानवयुक्त मिशनों के लिए तैयारी और अधिक सुदृढ़ हुई। 

भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन भारत का प्रस्तावित अंतरिक्ष स्टेशन है और ‘स्पेस विज़न 2047’ का एक प्रमुख स्तंभ है। बीएएस पृथ्वी की निम्न कक्षा में स्थित एक पांच मॉड्यूल वाला अंतरिक्ष स्टेशन होगा, जिसे दीर्घकालिक मानव अंतरिक्ष मिशनों और सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण में उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए तैयार किया गया है। सितम्‍बर 2024 में केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल ने इसके पहले मॉड्यूल बीएएस-01 के विकास और प्रक्षेपण को 2028 तक स्वीकृति दी, जो विस्तारित गगनयान कार्यक्रम का हिस्सा है। यह स्टेशन जीवन विज्ञान, चिकित्सा और उभरती प्रौद्योगिकियों में अनुसंधान को सक्षम बनाएगा, साथ ही पृथ्वी की कक्षा से परे भविष्य के मानव अन्वेषण मिशनों में भी सहयोग करेगा।

भारत की अंतरिक्ष में प्रगति स्पष्ट रूप से क्षमता बढ़ाने से नेतृत्व स्थापित करने की ओर एक बदलाव को दर्शाती है। देश न केवल वैज्ञानिक खोज की सीमाओं का विस्तार कर रहा है, बल्कि उन तकनीकों का भी विकास कर रहा है जो भविष्य के अंतरिक्ष अन्वेषण को आकार देंगी। महत्वाकांक्षी मिशनों, उन्नत अनुसंधान कार्यक्रमों और एक मजबूत दीर्घकालिक रूपरेखा के साथ, भारत विश्व के प्रमुख अंतरिक्ष-यात्रा करने वाले देशों में अपनी स्थिति को मजबूत कर रहा है।

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम एक वैज्ञानिक प्रयास से राष्ट्रीय विकास के एक शक्तिशाली साधन में बदल गया है। निजी क्षेत्र द्वारा भारत के अंतरिक्ष परिवर्तन को गति देने, विस्तारित स्वदेशी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी स्टैक, भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली एनएवीआईसी के विकास, उन्नत प्रक्षेपण यानों और अंतरिक्ष-आधारित सार्वजनिक सेवाओं के माध्यम से, भारत ने शासन, संपर्क, आपदा-प्रतिरोधक क्षमता, नवाचार और आर्थिक विकास में राष्ट्रीय क्षमता को मजबूत किया है। आज, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी न केवल पृथ्वी से आगे मिशनों को संभव बना रही है, बल्कि देशभर में दैनिक जीवन को भी बदल रही है।

भारत ने अपने अंतरिक्ष क्षेत्र को सरकार के नेतृत्‍व वाले कार्यक्रम से एक जीवंत राष्ट्रीय इकोसिस्‍टम में बदल दिया है। वर्ष 2020 में निजी क्षेत्र के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र को खोलने तथा इसके बाद लागू की गई भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 ने अंतरिक्ष मूल्य श्रृंखला के सभी क्षेत्रों में निजी भागीदारी को बढ़ावा दिया। आज स्टार्ट-अप, उद्योग और अनुसंधान संस्थान नवाचार, विनिर्माण, प्रक्षेपण सेवाओं तथा उपग्रह एप्‍लीकेशनों में लगातार पहले से अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सरकार की विभिन्न पहलों, जैसे उदारीकृत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति, इन-स्‍पेस सीड फंड योजना, प्री-इन्क्यूबेशन उद्यमिता कार्यक्रम, 1,000 करोड़ रुपये का वेंचर कैपिटल फंड तथा 500 करोड़ रुपये का प्रौद्योगिकी स्‍वीकार करने के कोष ने इस इकोसिस्‍टम को और अधिक सशक्त बनाया है।

फरवरी 2024 में सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति को उदार बनाया, जिसके तहत चयनित कार्यों में 100 प्रतिशत तक एफडीआई की अनुमति दी गई। उपग्रह निर्माण एवं संचालन, उपग्रह डेटा उत्पादों तथा ग्राउंड/यूज़र सेगमेंट सेवाओं में 74 प्रतिशत तक एफडीआई की स्वचालित मार्ग के तहत अनुमति है। वहीं, प्रक्षेपण यानों, उनसे संबंधित प्रणालियों तथा स्पेसपोर्ट्स में 49 प्रतिशत तक एफडीआई की अनुमति है, जबकि उपग्रह एवं ग्राउंड-सेगमेंट के घटकों और उप-प्रणालियों के निर्माण में 100 प्रतिशत एफडीआई की स्वचालित मार्ग के तहत अनुमति है।

निजी क्षेत्र की भागीदारी को और बढ़ावा देने के लिए भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केन्‍द्र ने वर्ष 2024 में मानदंड, दिशानिर्देश एवं प्रक्रियाएं 2024 लागू किए। यह ढांचा अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए प्राधिकरण, पात्रता और अनुपालन संबंधी आवश्यकताओं को स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है, जिससे भारत के तेजी से विकसित हो रहे अंतरिक्ष इकोसिस्‍टम में अधिक पारदर्शिता, पूर्वानुमेयता और निवेशकों का विश्वास बढ़ा है।

परिवर्तन का पैमाना अत्यंत उल्लेखनीय है। वर्ष 2014 में भारत में केवल एक पंजीकृत अंतरिक्ष स्टार्ट-अप था। फरवरी 2026 तक यह संख्या 400 से अधिक हो चुकी है। भारतीय अंतरिक्ष स्टार्ट-अप्स में 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का निवेश हो चुका है, जिसमें से लगभग 150 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश केवल वर्ष 2025 में प्राप्त हुआ। पिक्‍सल, ध्रुव स्‍पेस, स्‍काईरूट एयरोस्‍पेस, अग्निकुल कॉसमॉस और बेलाट्रिक्‍स एयरोस्‍पेस जैसी कंपनियां भारत के नए अंतरिक्ष युग में अग्रणी बनकर उभरी हैं।

भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का वर्तमान मूल्य लगभग आठ अरब अमेरिकी डॉलर है, जो वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में 2–3 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखती है। अगले एक दशक में इसके पांच गुना बढ़कर 40–45 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है तथा वर्ष 2030 तक वैश्विक हिस्सेदारी आठ प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। पिछले दशक में सरकार महत्वपूर्ण संस्थागत सुधारों और निजी क्षेत्र की भागीदारी के माध्यम से अंतरिक्ष क्षेत्र के व्यावसायीकरण में उल्लेखनीय तेजी लाई है।

न्‍यूस्‍पेस इंडिया लिमिटेड, जिसकी स्थापना वर्ष 2019 में हुई, तथा इंडियन नेशनल स्‍पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर, जिसकी स्थापना वर्ष 2022 में हुई, ने उद्योग की भागीदारी, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और निजी निवेश के लिए एक सुदृढ़ संस्थागत ढांचा तैयार किया है। जहां एनएसआईएल इसरो की प्रौद्योगिकियों, प्रक्षेपण सेवाओं और उपग्रह सेवाओं का व्यावसायीकरण करता है, वहीं इन-स्‍पेस एकल-खिड़की व्यवस्था के माध्यम से निजी क्षेत्र की अंतरिक्ष गतिविधियों को सुगम बनाने और उन्हें अधिकृत करने का कार्य करता है।

इन सुधारों के परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 के अनुसार, एनएसआईएल का राजस्व वित्त वर्ष 2021–22 में 321.77 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2024–25 में 3,246.09 करोड़ रुपये हो गया। 31 जनवरी 2026 तक इन-स्‍पेस ने उद्योगों और स्टार्ट-अप्स को इसरो की 71 प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण को सुगम बनाया। छह भारतीय गैर-सरकारी संस्थाओं ने 18 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया, जबकि 25 पेलोड पीएसएलवी ऑरबिटल एक्‍सपेरीमेंटल मॉड्यूल प्लेटफ़ॉर्म पर प्रक्षेपित किए गए या उनके प्रक्षेपण की योजना बनाई गई। वर्ष 2026 में सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत पृथ्वी अवलोकन उपग्रह समूह को मंजूरी तथा वर्ष 2025 में एसएसएलवी प्रौद्योगिकी का एचएएल को हस्तांतरण, भारत के वाणिज्यिक अंतरिक्ष इकोसिस्‍टम को और अधिक सुदृढ़ करने वाले महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुए।

भारत ने वर्तमान में संचालित पीएसएलवी, जीएसएलवी और एलवीएम3 प्रक्षेपण यानों के माध्यम से निम्न पृथ्वी कक्षा में 10 टन तथा भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा में 4.2 टन तक के उपग्रहों के प्रक्षेपण हेतु अंतरिक्ष परिवहन प्रणालियों में आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली है। इन प्रक्षेपण यानों ने पृथ्वी अवलोकन, संचार, नेविगेशन तथा अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए उपग्रहों को स्वतंत्र रूप से अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता प्रदान की है।

अंतरिक्ष क्षेत्र के विस्तारित दृष्टिकोण के अनुरूप प्रक्षेपण क्षमता को और बढ़ाने के लिए सरकार ने अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यान के विकास को मंजूरी दी है। यह प्रक्षेपण यान निम्न पृथ्वी कक्षा में 30 टन तक का अधिकतम पेलोड ले जाने में सक्षम होगा। अंतरिक्ष तक कम लागत वाली पहुंच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकियों का भी विकास किया जा रहा है। इनमें एनजीएलवी का आंशिक रूप से पुनः प्रयोज्य संस्करण भी शामिल है, जो एलईओ में 14 टन तक का पेलोड ले जाने में सक्षम होगा। इसके अतिरिक्त, पंखयुक्त ऊपरी चरण का भी विकास किया जा रहा है, जो कक्षा से पृथ्वी पर वापस लौटकर स्वतंत्र रूप से रनवे पर सुरक्षित लैंडिंग कर सकेगा।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन लगातार अंतरिक्ष परिवहन प्रणालियों की अगली पीढ़ी का निर्माण कर रहा है। इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम से लेकर उन्नत क्रायोजेनिक और सेमी-क्रायोजेनिक इंजनों तक, ये तकनीकी प्रगति उपग्रह मिशनों की लचीलापन क्षमता, पेलोड प्रदर्शन और लागत दक्षता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाएंगी। इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम से युक्त पहला उपग्रह मिशन वर्ष 2026–27 में प्रक्षेपित किए जाने का लक्ष्य है, जो अधिक दक्ष और दीर्घकालिक अंतरिक्ष अभियानों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

भारत ने विकास इंजन के उपयोग को प्रतिबंधित या नियंत्रित करने की क्षमता में भी महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं, जो पुन: प्रयोज्य रॉकेटों की ऊर्ध्वाधर टेक-ऑफ और लैंडिंग क्षमताओं की दिशा में एक महत्‍वपूर्ण कदम है। इसके साथ ही सीई20 क्रायोजेनिक इंजन के लिए विकसित बूटस्ट्रैप इग्निशन तकनीक ने मिशन के दौरान कई बार इंजन रीस्टार्ट करने की क्षमता प्रदान की है, जिससे परिचालन लचीलापन बढ़ा है। वहीं, स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल के उन्नत ऊपरी चरण ने स्‍टेज मास को कम किया है और पेलोड क्षमता में लगभग 90 किलोग्राम की वृद्धि की है, जिससे भारत की किफायती छोटे उपग्रह प्रक्षेपण क्षमता और अधिक मजबूत हुई है।

इसरो का आरएलवी-टीडी कार्यक्रम कम लागत और पुन: प्रयोज्य अंतरिक्ष परिवहन प्रणालियों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह एक उन्‍नत त‍कनीक वाले भविष्य के विमान की तरह तैयार किया गया पंख वाला वाहन है, जो प्रक्षेपण यानों और विमानों—दोनों की जटिल तकनीकों का संयोजन है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य पूर्णतः पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण प्रणालियों के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण तकनीकों का विकास करना है, जिससे अंतरिक्ष तक पहुंचने की लागत को काफी हद तक कम किया जा सके। आरएलवी-टीडी एक फ्लाइंग टेस्ट बेड के रूप में कार्य करता है, जिसमें हाइपरसोनिक उड़ान, स्वतंत्र लैंडिंग और एकीकृत उड़ान प्रबंधन  जैसी उन्नत तकनीकों का परीक्षण किया जाता है।

इस कार्यक्रम के तहत भारत ने पहले ही महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। इसरो ने 23 मई 2016 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केन्‍द्र एसएचएआर से आरएलवी-टीडी का सफल उड़ान परीक्षण किया, जिसमें स्वतंत्र नेविगेशन, मार्गदर्शन एवं नियंत्रण प्रणाली, पुन: प्रयोज्य तापीय सुरक्षा प्रणाली और पुन: प्रवेश मिशन प्रबंधन तकनीकों का सत्यापन किया गया। इसके बाद इस कार्यक्रम के अंतर्गत अब तक तीन सफल स्वायत्त रनवे लैंडिंग प्रयोग भी पूरे किए जा चुके हैं।

इसरो ने सेमीकंडक्टर लेबोरेटरी, चंडीगढ़ के साथ मिलकर उच्च विश्वसनीयता वाले अंतरिक्ष मिशनों के लिए कल्‍पना32 के साथ-साथ भारत का पहला पूर्णतः स्वदेशी 32-बिट स्पेस माइक्रोप्रोसेसर विक्रम3201, विकसित किया है। इससे विदेशी घटकों पर निर्भरता कम होती है और मिशनों की सुरक्षा एवं विश्वसनीयता में वृद्धि होती है।

भारत की बढ़ती अंतरिक्ष क्षमता पिछले 12 वर्षों में हुए व्यापक राष्ट्रीय परिवर्तन की कहानी को दर्शाती है। तकनीक, अवसंरचना और नवाचार में निरंतर निवेश ने देश की क्षमताओं का विस्तार किया है और बाहरी प्रणालियों पर निर्भरता को कम किया है। ये प्रयास विज्ञान, उद्योग और विकास के नए अवसर उत्पन्न कर रहे हैं। ये भारत को विकसित भारत की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ा रहे हैं और एक प्रमुख अंतरिक्ष-यात्रा करने वाले राष्ट्र के रूप में इसकी स्थिति को और मजबूत कर रहे हैं।

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत से ही अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, इसकी आधारशिला रहा है। पिछले दशक के दौरान वर्षों में भारत ने वैश्विक अंतरिक्ष साझेदारियों का उल्लेखनीय विस्तार किया है, जिससे वैज्ञानिक सहयोग, प्रौद्योगिकी आदान-प्रदान और संयुक्त मिशन विकास को मजबूती मिली है। इसरो ने 1990 के दशक से 2014 तक कुल 35 विदेशी उपग्रहों का प्रक्षेपण किया था। वहीं, वर्ष 2014 के बाद से मार्च 2026 तक यह संख्या बढ़कर 399 विदेशी उपग्रह प्रक्षेपणों तक पहुंच गई।

इसके अतिरिक्त, वर्ष 2026 तक भारत ने 61 देशों और 5 बहुपक्षीय संगठनों के साथ 300 से अधिक अंतरिक्ष सहयोग समझौते किए हैं। ये साझेदारियां उपग्रह मिशनों, डेटा साझाकरण, ग्राउंड स्टेशन सहयोग, वैज्ञानिक अनुसंधान और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों को शामिल करती हैं। पिछले दशक में विकसित प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और रणनीतिक साझेदारियां नीचे दर्शाई गई हैं।

भारत अपनी ‘पड़ोसी प्रथम नीति’ के अंतर्गत बिम्‍सटेक अंतरिक्ष कार्यक्रम की अगुवाई कर रहा है। यह पहल अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, आपदा प्रबंधन और क्षमता निर्माण के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करती है। नॉर्थ-ईस्‍टर्न स्‍पेस एप्‍लीकेशन्‍स सेंटर बिम्‍सटेक देशों के लिए अंतरिक्ष एप्‍लीकेशनों और उपग्रह प्रौद्योगिकी पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करता है। भारत ने जलवायु और आपदा प्रबंधन के लिए क्षेत्रीय स्तर पर नैनो-उपग्रहों, स्थानीय ग्राउंड स्टेशनों की स्थापना तथा साझा पृथ्वी अवलोकन का भी प्रस्ताव दिया है। इसके अतिरिक्त, बिम्‍सटेक मौसम एवं जलवायु केन्‍द्र क्षेत्रीय मौसम पूर्वानुमान और आपदा तैयारी में योगदान देता है। वहीं, अंतरिक्ष सुरक्षा सहयोग पर विशेषज्ञ समूह क्षेत्रीय लचीलापन और रणनीतिक सहयोग को और मजबूत करता है।

भारत का मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम रूस के साथ लंबे समय से चली आ रही साझेदारी से लाभान्वित हुआ है। अंतरिक्ष सहयोग के दशकों पुराने अनुभव पर आधारित रहते हुए, गगनयान मिशन को समर्थन प्रदान करने के लिए इसरो और रॉसकोसमॉस ने वर्ष 2018 में एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। इसके अंतर्गत रूस ने अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण, तकनीकी विशेषज्ञता तथा जीवन-रक्षक प्रणाली, चालक दल की सुरक्षा और मानव अंतरिक्ष उड़ान से संबंधित तकनीकों जैसे महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों में सहायता प्रदान की। इस साझेदारी ने भारत की पहली स्वदेशी मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान के लिए उसकी तैयारी को मजबूत किया और यह भारत की बढ़ती अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के विश्वास को भी दर्शाता है।

अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा प्रमुख वैश्विक अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ उसके सहयोग में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार मिशन है, जिसे इसरो और नासा ने संयुक्त रूप से विकसित किया है और जिसे 30 जुलाई 2025 को श्रीहरिकोटा से जीएसएलवी-एफ16 रॉकेट द्वारा प्रक्षेपित किया गया। एनआईएसएआर मिशन भूमि, हिमनदों, वनों और महासागरों में होने वाले परिवर्तनों की निगरानी करेगा, जिससे वैज्ञानिकों को जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरणीय चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिलेगी। यह मिशन दुनिया की दो अग्रणी अंतरिक्ष एजेंसियों की विशेषज्ञता को एक साथ लाता है और जटिल अंतर्राष्ट्रीय परियोजनाओं को सफलतापूर्वक संचालित करने की भारत की क्षमता को दर्शाता है।

भारत की विस्तृत होती वैश्विक साझेदारियां ‘तृष्‍णा’ यानी ‘थर्मल इन्‍फ्रारेड इमेजिंग सेटलाइट फॉर हाई-रेजोल्‍यूशन नेचुरल रिसॉर्स असेसमेंट’ मिशन में भी परिलक्षित होती हैं, जिसे इसरो और फ्रांस की अंतरिक्ष एजेंसी सीएनईएस संयुक्त रूप से विकसित कर रहे हैं। यह मिशन वर्ष 2026 में प्रक्षेपित किए जाने की योजना है, तृष्‍णा पृथ्वी के स्थलीय एवं तटीय क्षेत्रों की उच्च-रिज़ॉल्यूशन थर्मल इमेजिंग प्रदान करेगा, जिसकी रीविजिट फ्रीक्‍वेन्‍सी वर्तमान मिशनों की तुलना में अधिक उन्नत होगी।

यह उपग्रह फसल जल तनाव, सिंचाई आवश्यकताओं, जल संसाधनों, शहरी इकोसिस्‍टम, हिमनदों और जलवायु से जुड़े परिवर्तनों की निगरानी में सहायता करेगा। सीएनईएस के थर्मल इन्फ्रारेड उपकरण और इसरो के ऑप्टिकल सेंसर का मेल, यह मिशन उन्नत पृथ्वी अवलोकन और जलवायु विज्ञान में भारत के एक भरोसेमंद वैश्विक भागीदार के रूप में भारत की बढ़ती विश्वसनीयता को दर्शाता है, साथ ही यह दुनियाभर में स्‍थायी कृषि और पर्यावरण प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

भारत की गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण में बढ़ती विश्वसनीयता चन्‍द्रयान-5/ल्‍यूपेक्‍स मिशन में भी परिलक्षित होती है, जो इसरो और जापान एयरोस्‍पेस एक्‍सप्‍लोरेशन एजेंसी के बीच एक महत्वपूर्ण सहयोगात्मक परियोजना है। यह मिशन वर्ष 2027–28 में जापान के एच3 रॉकेट से प्रक्षेपित किए जाने की योजना है। चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्र का विस्तृत अन्वेषण करने के लिए इसमें भारत द्वारा विकसित एक लैंडर और जापान द्वारा विकसित एक रोवर शामिल होगा।

चन्‍द्रयान-3 की सफलता और चन्‍द्रयान-4 के प्रस्तावित सैंपल रिटर्न की योजना पर आगे बढ़ते हुए, ल्‍यूपैक्‍स मिशन का उद्देश्य चन्‍द्रमा की सतह पर पानी और बर्फ की खोज करना, सतह के नीचे ड्रिलिंग करना और आसपास उन्नत वैज्ञानिक अध्ययन करना है। इस मिशन में नासा और यूरोपियन अंतरिक्ष एजेंसी के उपकरण भी शामिल हैं, जो भारत की जटिल अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष परियोजनाओं का नेतृत्व करने की क्षमता और वैश्विक चंद्र अन्वेषण के अगले चरण में उसके महत्वपूर्ण योगदान को दर्शाता है।

ईएसए और इसरो ने 7 मई 2025 को भविष्य के मानव अंतरिक्ष मिशनों पर सहयोग के लिए एक औपचारिक संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर किए। यह साझेदारी मुख्य रूप से लो अर्थ ऑर्बिट गतिविधियों और भविष्य में चन्‍द्रमा अन्वेषण पर केन्‍द्रित है। दोनों एजेंसियां ऐसी तकनीकों पर कार्य करेंगी, जो विभिन्न देशों के अंतरिक्ष यानों, साथ ही अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण और अंतरिक्ष अनुसंधान में भी सहयोग को बढ़ावा देंगी। यह समझौता यूरोपीय अंतरिक्ष यात्रियों के भारत के प्रस्तावित भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन से संबंधित मिशनों में भाग लेने की संभावनाएं भी खोलता है, साथ ही चंद्रमा पर संयुक्त वैज्ञानिक मिशनों का मार्ग भी प्रशस्त करता है।

एक्‍सीओम एएक्‍स-4 मिशन में सहयोग के अनुभव पर आगे बढ़ते हुए, ईएसए और इसरो मिलकर भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों को अधिक जुड़ा हुआ, कुशल और सहयोगात्मक बनाने की दिश<



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