पिछले एक दशक में भारत की पहचान सिर्फ एक बड़े डिजिटल बाजार की नहीं रही है, बल्कि वह दुनिया के सामने एक उदीयमान वैश्विक टेक-पावर बनकर उभरा है। पहले जहां भारत को केवल इंटरनेट प्लेटफॉर्म और डिजिटल सेवाओं के एक विशाल उपभोक्ता के रूप में देखा जाता था, वहीं आज हमारा देश अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वदेशी नवाचारों और दमदार स्टार्टअप इकोसिस्टम के दम पर पूरी दुनिया में तकनीक की दिशा तय कर रहा है।
निरंतर निवेश ने देश की तकनीकी क्षमता को न केवल विस्तार दिया है, बल्कि दुनिया में भारत की विश्वसनीयता को भी मजबूत किया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, क्वांटम टेक्नोलॉजी, सुपरकंप्यूटिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में चलाए जा रहे मिशन-मोड अभियानों ने देश में नवाचार की एक नई लहर पैदा कर दी है। आज हमारा भरोसेमंद डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, समावेशी डिजिटल गवर्नेंस और बढ़ती ग्लोबल पार्टनरशिप भारत को दुनिया के सामने एक विश्वसनीय तकनीकी साझेदार के रूप में स्थापित कर रहे हैं।
करीब एक दशक पहले, देश ने 'विकसित भारत' के संकल्प को सिद्ध करने के लिए तकनीक को अपना मुख्य आधार बनाने की एक दृढ़ यात्रा शुरू की थी। इसके बाद देश ने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण, नवाचार को सशक्त बनाने और हर नागरिक तक तकनीक की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए एक निरंतर और एकजुट राष्ट्रीय प्रयास किया। सरकार ने सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी, सुपरकंप्यूटिंग, ब्लॉकचेन और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी उभरती हुई तकनीकों में समर्पित 'मिशन-मोड' कार्यक्रमों के माध्यम से देश की तकनीकी क्षमता को नए शिखर पर पहुंचाया। दीर्घकालिक नीतिगत समर्थन और रणनीतिक निवेश के बल पर ही आज भारत स्वदेशी तकनीकों, सुरक्षित डिजिटल सिस्टम और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी इनोवेशन इकोसिस्टम को विकसित करने में सक्षम हो सका है।
भारत के इस बदलाव को राष्ट्रीय क्षमता विकास में किए गए बड़े निवेशों से जबर्दस्त ताकत मिली। इसके लिए बड़े पैमाने पर स्किलिंग प्रोग्राम, एडवांस्ड रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप सपोर्ट और इंडस्ट्री-एकेडेमिया सहयोग को बढ़ावा दिया गया। इसके साथ ही, देशभर में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, रिसर्च हब, सेमीकंडक्टर प्रयोगशालाओं और उभरती प्रौद्योगिकियों के संस्थानों की स्थापना की गई। इन सभी प्रयासों ने मिलकर देश के उभरते हुए क्षेत्रों में एक भविष्य के लिए तैयार कार्यबल को विकसित करने के अभूतपूर्व अवसर पैदा किए।
देश की इस बढ़ती क्षमता और व्यापक विस्तार ने वैश्विक स्तर पर भारत की तकनीकी विश्वसनीयता को और भी मजबूत किया है। आज भारत ने एक भरोसेमंद डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षित डिजिटल गवर्नेंस सिस्टम और मजबूत अंतर्राष्ट्रीय तकनीकी साझेदारियां खड़ी कर ली हैं। भारत ने पूरी दुनिया के सामने यह साबित करके दिखाया है कि कैसे समावेशन, सुलभता और किफायत को सुनिश्चित करते हुए इतनी बड़ी आबादी के स्तर पर तकनीक का सफल उपयोग किया जा सकता है। आज भारत न केवल वैश्विक तकनीकों को अपना रहा है, बल्कि एक भरोसेमंद, समावेशी और मानव-केंद्रित तकनीकी विकास को लेकर वैश्विक विमर्श और बहसों को नया आकार भी दे रहा है।
वर्ष 2015 में शुरू किए गए 'डिजिटल इंडिया प्रोग्राम' ने देशभर में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करके भारत के उभरते टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम की नींव रखी। ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क के तेजी से विस्तार ने हाई-स्पीड कनेक्टिविटी के लिए मजबूत आधार तैयार किया। ऑप्टिकल फाइबर कवरेज 2019 में 19.35 लाख रूट किलोमीटर से बढ़कर 2025 में 42.36 लाख रूट किलोमीटर हो गई है। इस विस्तार ने शहरी और ग्रामीण भारत में इंटरनेट की पहुंच, नेटवर्क की विश्वसनीयता और डिजिटल कनेक्टिविटी में सुधार किया है। भारत ने विश्व के सबसे तेज 5जी रोलआउट में से एक को भी हासिल किया है, जिसकी सेवाएं 99.9 प्रतिशत जिलों तक पहुंच चुकी हैं। इस उन्नत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर ने पूरे देश में इंटरनेट के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया।
इंटरनेट कनेक्शन की संख्या 2014 में 25.15 करोड़ से बढ़कर 2026 में 102.86 करोड़ हो गई है। इंटरनेट के ज्यादा इस्तेमाल ने ब्रॉडबैंड पहुंच का और अधिक विस्तार किया है, जिससे ब्रॉडबैंड कनेक्शन 2014 के 6.1 करोड़ से बढ़कर दिसंबर 2025 में 99.56 करोड़ हो गए हैं।
इस डिजिटल विस्तार ने नागरिकों, स्टार्टअप, व्यवसायों, शैक्षणिक संस्थानों, स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों और सरकारी सेवाओं को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया है। तेज और अधिक विश्वसनीय कनेक्टिविटी ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग, ब्लॉकचेन, फिनटेक और अन्य डेटा-संचालित प्रौद्योगिकियों के विकास को भी सक्षम बनाया है।
किफायती मूल्यों पर उपलब्ध इंटरनेट ने लोगों के बीच प्रौद्योगिकी को अपनाने की गति को और तेज कर दिया है। औसत मासिक डेटा खपत 2014 में 61.66 एमबी से बढ़कर दिसंबर 2025 में 24.01 जीबी हो गई है। इसी अवधि के दौरान, डेटा की लागत ₹269 प्रति जीबी से घटकर ₹8-10 प्रति जीबी रह गई है।. इंटरनेट की कम लागत ने टेलीमेडिसिन, ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स और ई-गवर्नेंस सेवाओं तक पहुंच का विस्तार किया है। इस व्यापक डिजिटल उपयोग ने नवाचार, स्टार्टअप और डिजिटल एंटरप्रेन्योरशिप के लिए एक मजबूत यूजर इकोसिस्टम का निर्माण किया है।
पिछले 12 वर्षों में, 'डिजिटल इंडिया' प्रोग्राम भारत के डिजिटल रूपांतरण की रीढ़ बनकर उभरा है। इस प्रोग्राम ने न केवल डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को सुदृढ़ किया और कनेक्टिविटी का विस्तार किया, बल्कि सभी क्षेत्रों में टेक्नोलॉजी को अपनाने की प्रक्रिया भी तेज की है। इन प्रयासों ने भारत को एक वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी डिजिटल अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करने के साथ-साथ भविष्य की तैयारी और उभरती प्रौद्योगिकियों में राष्ट्रीय क्षमताओं को विस्तार देने के लिए एक सशक्त आधार तैयार किया है।
भारत एआई, सेमीकंडक्टर, क्वांटम टेक्नोलॉजी और सुपरकंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में निरंतर निवेश के माध्यम से भविष्य के लिए तैयार एक तकनीकी इकोसिस्टम का निर्माण कर रहा है। मिशन-आधारित कार्यक्रम विभिन्न क्षेत्रों में स्वदेशी नवाचार, अनुसंधान क्षमताओं और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर रहे हैं। ये पहल एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग और रणनीतिक प्रौद्योगिकी विकास को भी प्रोत्साहित कर रही हैं, साथ ही उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए भारत को एक विश्वसनीय और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी केंद्र के रूप में मजबूत बना रही हैं।
वर्ष 2015 में ₹4,500 करोड़ के परिव्यय के साथ शुरू किए गए नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन के अंतर्गत, भारत ने देश के अग्रणी संस्थानों में 47 पेटाफ्लॉप्स की संयुक्त कंप्यूटिंग क्षमता वाले 38 सुपरकंप्यूटर तैनात किए हैं। एक बड़ी उपलब्धि स्वदेशी 'परम रुद्र' सीरीज का विकास है, जिसे भारतीय-डिजाइन वाले हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के साथ तैयार किया गया है। यह हाई-परफ़ॉर्मेंस कंप्यूटिंग में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
सेमीकंडक्टर आधुनिक डिजिटल और उभरती हुई प्रौद्योगिकियों की नींव हैं। ये कम्युनिकेशन, मोबिलिटी, डिफेंस, मैन्युफैक्चरिंग आदि में इस्तेमाल होने वाले डिवाइस को चलाते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, 5जी और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी प्रौद्योगिकियां काफी हद तक सेमीकंडक्टर क्षमता पर ही निर्भर हैं।
टेक्नोलॉजिकल आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के उद्देश्य से, भारत ने दिसंबर 2021 में ₹76,000 करोड़ के परिव्यय के साथ 'सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम' शुरू किया। इस कार्यक्रम ने सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, डिस्प्ले फैब्रिकेशन, चिप डिजाइन, पैकेजिंग, टेस्टिंग, टैलेंट डेवलपमेंट और रिसर्च सहयोग को प्रोत्साहित किया। यह पहल भारत को ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स वैल्यू चेन का हिस्सा बनाने के लिए थी। इस गति को आगे बढ़ाते हुए, केंद्रीय बजट 2026–27 में 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0' की घोषणा की गई, जिसमें वित्त वर्ष 2026–27 के लिए ₹1,000 करोड़ का प्रारंभिक प्रावधान रखा गया है। आईएसएम 2.0 मुख्य रूप से इक्विपमेंट, मटीरियल, स्वदेशी बौद्धिक संपदा, मजबूत सप्लाई चेन, रिसर्च, ट्रेनिंग और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं पर केंद्रित है, जो भारत को सेमीकंडक्टर के एक वैश्विक प्रतिस्पर्धी केंद्र के रूप में स्थापित कर रहा है।
वर्ष 2021 में शुरू की गई डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम, भारत के फैबलेस सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को विकसित करने में एक प्रमुख भूमिका निभा रही है। 'सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम' के तहत कार्यान्वित यह योजना स्टार्टअप, एमएसएमई और शैक्षणिक संस्थानों को फाइनेंशियल इंसेंटिव और एडवांस्ड डिजाइन इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से सहायता प्रदान करती है। यह योजना सेमीकंडक्टर डिजाइन के संपूर्ण लाइफसाइकिल को कवर करती है। स्वदेशी चिप डिजाइन क्षमताओं को सुदृढ़ करके, यह योजना आयात पर निर्भरता को कम करती है और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में घरेलू मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देती है। मार्च 2026 तक, डीएलआई योजना के तहत 24 कंपनियों को वित्तीय सहायता प्राप्त हुई है और 105 आवेदकों को ईडीए टूल्स का समर्थन मिला है। साथ ही, 16 टेप-आउट से सात चिप्स का निर्माण किया गया है, जिनमें एडवांस्ड 12 नैनोमीटर डिजाइन भी शामिल हैं।
जून 2026 तक की स्थिति के अनुसार, 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन' के तहत लगभग ₹1.64 लाख करोड़ की लागत वाली 12 परियोजनाओं को स्वीकृति दी जा चुकी है। इनमें एक सेमीकंडक्टर फैब, दो कंपाउंड सेमीकंडक्टर फैब और नौ पैकेजिंग यूनिट शामिल हैं। यह पहल देश में सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग के स्वदेशी इकोसिस्टम का निर्माण कर रही है और आयात पर निर्भरता को कम कर रही है।
इधर, क्वांटम टेक्नोलॉजी इक्कीसवीं सदी के उन निर्णायक क्षेत्रों के रूप में उभर रही हैं जो भविष्य की दिशा तय करेंगे। ये टेक्नोलॉजी क्वांटम मैकेनिक्स या फिजिक्स के उन नियमों पर आधारित हैं, जो सब-एटॉमिक पार्टिकल्स पर लागू होते हैं। यह क्षेत्र संभावनाओं के सिद्धांतों पर आधारित है, जहां तत्व एक साथ कई अवस्थाओं में विद्यमान रह सकते हैं। इस तकनीक पर आधारित टूल अत्यंत शक्तिशाली कंप्यूटिंग क्षमता से लैस हैं और सामान्य उपकरणों की तुलना में कहीं अधिक संवेदनशील और सुरक्षित हैं। इनमें स्वास्थ्य सेवा, वित्त, लॉजिस्टिक्स और क्लाइमेट मॉडलिंग जैसे क्षेत्रों में कई अवस्थाओं में परिवर्तन लाने की क्षमता है।
साथ ही, ये बेहद सुरक्षित कम्युनिकेशन और एडवांस्ड डेटा प्रोसेसिंग को संभव बनाते हैं। जैसे-जैसे राष्ट्र इन क्षमताओं को हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, क्वांटम प्रौद्योगिकियां आर्थिक विकास, तकनीकी नेतृत्व और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कारक बनती जा रही हैं।
क्वांटम तकनीक के रणनीतिक महत्व को पहचानते हुए, सरकार ने अप्रैल 2023 में ₹6,003.65 करोड़ के परिव्यय के साथ 'नेशनल क्वांटम मिशन' को मंजूरी दी। यह मिशन चार प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित है: क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम कम्युनिकेशन, क्वांटम सेंसिंग एवं मेट्रोलॉजी और क्वांटम मटीरियल एंड डिवाइसेस। इस मिशन का उद्देश्य स्वदेशी क्वांटम प्रौद्योगिकियों का विकास करना, रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना, कुशल प्रतिभाओं का निर्माण करना, स्टार्टअप को सपोर्ट करना, उद्योग-शिक्षा जगत के बीच सहयोग को बढ़ावा देना और भारत को विश्व के अग्रणी क्वांटम प्रौद्योगिकी संपन्न राष्ट्रों की पंक्ति में स्थापित करना है।
इसके परिणाम अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। देश के अग्रणी संस्थानों में चार समर्पित थीमैटिक हब स्थापित किए गए हैं, जो 43 विभिन्न संगठनों के 152 से अधिक शोधकर्ताओं को एक साथ जोड़कर इस मिशन को गति दे रहे हैं। इस मिशन ने 17 स्टार्टअप को सहायता प्रदान की है, जिनमें नौ डीप-टेक वेंचर्स भी शामिल हैं, जो भारत के इनोवेशन इकोसिस्टम को और अधिक सुदृढ़ बना रहे हैं। भारत ने 1,000 किलोमीटर के सुरक्षित क्वांटम कम्युनिकेशन नेटवर्क का सफल प्रदर्शन किया है और यह उपलब्धि निर्धारित समय से छह वर्ष पूर्व ही प्राप्त कर ली है। इस दृष्टि को और आगे बढ़ाते हुए, फरवरी 2026 में अमरावती में भारत की पहली 'क्वांटम वैली' की आधारशिला रखी गई। यह भविष्य के क्वांटम अनुसंधान, नवाचार और रणनीतिक क्षमताओं के लिए एक समर्पित इकोसिस्टम का निर्माण करेगी।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तेजी से काम करने वाले ऑटोमेशन, बेहतर प्रोडक्टिविटी और आधुनिक औद्योगिक नवाचार के माध्यम से अर्थव्यवस्थाओं को परिवर्तित कर रहा है। अपने मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और बड़ी टेक्नोलॉजी वर्कफोर्स के सहयोग से, भारत भी एक प्रमुख ग्लोबल एआई इकोसिस्टम के रूप में उभरा है।
इस प्रगति में तेजी लाने के लिए, भारत ने 2024 में ₹10,300 करोड़ से अधिक के परिव्यय के साथ 'इंडिया एआई मिशन' को मंजूरी दी। यह मिशन स्वदेशी एआई कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण और हाई-एंड जीपीयू सुविधाओं तक पहुंच बढ़ाने पर केंद्रित है। इसके साथ ही, यह मिशन एआई रिसर्च, स्टार्टअप डेवलपमेंट, युवाओं के कौशल विकास और सार्वजनिक सेवा में नवाचार को भी समर्थन देता है। तकनीकी विकास के साथ-साथ, यह मिशन सुरक्षित, समावेशी और जिम्मेदार एआई सिस्टम को बढ़ावा देता है। इन प्रयासों का उद्देश्य भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए एक वैश्विक स्तर पर विश्वसनीय केंद्र के रूप में स्थापित करना है।
अपनी शुरुआत के दो वर्षों के भीतर, इस मिशन ने भारत के एआई इकोसिस्टम को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मार्च 2026 तक की स्थिति के अनुसार, भारत में लगभग 1.8 लाख स्टार्टअप हैं, जिनमें से लगभग 89 प्रतिशत नए स्टार्टअप एआई समाधानों का उपयोग कर रहे हैं। एडवांस्ड एआई इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुंच को आसान बनाने के लिए 38,000 से अधिक जीपीयू की एक कॉमन कंप्यूटिंग सुविधा स्थापित की जा रही है। एआई कोश प्लेटफॉर्म पर 20 क्षेत्रों में 12,115 डेटासेट और 306 एआई मॉडल होस्ट किए गए हैं, जो बड़े पैमाने पर नवाचार और अनुसंधान को सक्षम बना रहे हैं। ये पहल कंप्यूटिंग पावर, डेटा और एआई टूल्स तक पहुंच बढ़ा रही है, जिससे भारत को एआई विकास के लिए एक अग्रणी केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद मिल रही है।
क्लाउड, इंटरनेट के माध्यम से स्टोरेज, सर्वर, सॉफ्टवेयर और डेटा प्रोसेसिंग जैसी कंप्यूटिंग सेवाएं प्रदान करता है, जो गवर्नेंस, बिजनेस और वित्त जैसे विविध क्षेत्रों में स्केलेबल, लागत-प्रभावी और सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करती हैं। जैसे-जैसे भारत का डिजिटल इकोसिस्टम विस्तृत हो रहा है, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर डेटा सोवर्जिनिटी, डिजिटल गवर्नेंस और जन-सेवा वितरण के लिए एक अपरिहार्य आवश्यकता बन गया है।
भारत के स्वदेशी क्लाउड इकोसिस्टम की शुरुआत 2014 में 'मेघराज' के शुभारंभ के साथ हुई, जो सरकार के राष्ट्रीय क्लाउड प्लेटफॉर्म के रूप में कार्य करता है। इसके उपरांत, 'मेघराज 2.0' ने हाइब्रिड क्लाउड आर्किटेक्चर और बेहतर साइबर सुरक्षा के माध्यम से इस इकोसिस्टम को और अधिक सशक्त बनाया। इसने सरकारी विभागों को डेटा पर अपना पूर्ण नियंत्रण बनाए रखते हुए, एडवांस्ड क्लाउड संसाधनों का सुरक्षित रूप से उपयोग करने में सक्षम बनाया है।
जून 2026 तक की स्थिति के अनुसार, मेघराज क्लाउड प्लेटफॉर्म को अपनाने वाले सरकारी विभागों की संख्या 2015-16 के 342 से बढ़कर 2,323 हो गई है। यह प्लेटफॉर्म डिजीलॉकर, माईगव और नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल जैसे प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को संचालित करते हुए सुशासन को नई गति प्रदान कर रहा है।
केंद्रीय बजट 2026-27 ने क्लाउड और एआई इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को गति देने के लिए प्रमुख नीतिगत प्रोत्साहन घोषित किए हैं। इसमें 2047 तक टैक्स हॉलिडे, डेटा सेंटर सेवाओं के लिए 15 प्रतिशत का 'सेफ हार्बर' मार्जिन और आईटी सेवाओं के लिए सेफ हार्बर मानदंडों के तहत पात्रता सीमा को ₹300 करोड़ से बढ़ाकर ₹2,000 करोड़ करना शामिल है। ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस को और बेहतर बनाने के लिए ऑटोमेटेड अप्रूवल सिस्टम की भी शुरुआत की गई है।
दूसरी ओर, ब्लॉकचेन एक सुरक्षित और छेड़छाड़-रहित डिजिटल लेजर है, जो मध्यवर्ती इकाई के बिना एक डिस्ट्रिब्यूटेड नेटवर्क पर ट्रांज़ैक्शन को रिकॉर्ड करता है। पारदर्शिता, अपरिवर्तनीयता, ट्रेस करने की क्षमता और विकेंद्रीकरण जैसी इसकी मुख्य विशेषताएं इसे गवर्नेंस, वित्त, सप्लाई चेन, जूडिशरी और डिजिटल सर्विस डिलीवरी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती हैं। इस क्षमता को पहचानते हुए, इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 2021 में ₹64.76 करोड़ के परिव्यय के साथ 'नेशनल ब्लॉकचेन फ्रेमवर्क' की शुरुआत की। इसका उद्देश्य नागरिक-केंद्रित गवर्नेंस और डिजिटल विश्वास के लिए एक सुरक्षित, स्केलेबल और इंटरऑपरेबल ब्लॉकचेन इकोसिस्टम का निर्माण करना है।
अनुकूल सरकारी नीतियों के समर्थन से, भारत का ब्लॉकचेन इकोसिस्टम विश्वास्या ब्लॉकचेन स्टैक, एनबीएफलाइट सैंडबॉक्स, प्रामाणिक ऐप वेरिफिकेशन सिस्टम और नेशनल ब्लॉकचेन पोर्टल जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्मों के माध्यम से विस्तारित हुआ है। यह फ्रेमवर्क भुवनेश्वर, पुणे और हैदराबाद स्थित एनआईसी डेटा सेंटरों के माध्यम से ब्लॉकचेन-एज-अ-सर्विस, BaaS, को सहायता प्रदान करता है। ब्लॉकचेन एप्लिकेशन पहले से ही सुरक्षित दस्तावेज सत्यापन, न्यायिक रिकॉर्ड, दवा सप्लाई-चेन ट्रैकिंग और प्रॉपर्टी मैनेजमेंट के जरिए गवर्नेंस को बदल रहे हैं। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ रही है और धोखाधड़ी में कमी आ रही है, बल्कि यह 'डिजिटल इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' के विजन को भी मजबूती प्रदान कर रहा है।
अक्टूबर 2025 तक, ब्लॉकचेन प्लेटफॉर्म के माध्यम से 34 करोड़ से अधिक संपत्ति दस्तावेजों का सत्यापन किया जा चुका है, जिससे छेड़छाड़-रहित रिकॉर्ड तैयार हुए हैं और भूमि संबंधी विवादों में कमी आई है। एनआईसी ने अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी में एक सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस की स्थापना की है। भारतीय रिज़र्व बैंक ने डिजिटल रुपया, e₹, के पायलट प्रोजेक्ट शुरू किए हैं, जबकि भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ने स्पैम पर अंकुश लगाने के लिए ब्लॉकचेन-आधारित डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी को अपनाया है। इसके अतिरिक्त, नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड भी सुरक्षित ऑडिट ट्रेल के लिए ब्लॉकचेन का उपयोग कर रही है।
इनके अलावा, डेटा सेंटर ऐसी सुरक्षित सुविधाएं हैं जो डिजिटल सूचनाओं को स्टोर करने, प्रोसेस करने और उसे एक जगह से दूसरी जगह भेजने का काम करती हैं। ये क्लाउड सेवाओं, एआई, ब्लॉकचेन एप्लिकेशन और भविष्य की प्रौद्योगिकियों जैसे क्वांटम कंप्यूटिंग का आधार हैं। विश्वसनीय डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, सुरक्षित डिजिटल सेवाओं और रियल-टाइम डेटा एक्सेस को सक्षम बनाती है। भारत के लिए, यह तकनीकी आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करता है, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का सपोर्ट करता है, निवेश को आकर्षित करता है, उच्च-कुशल रोजगार के अवसर पैदा करता है और वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में देश की भूमिका को बढ़ाता है।
भारत के डेटा सेंटर क्षेत्र ने तीव्र विस्तार देखा है, जहां इसकी क्षमता 2020 के लगभग 375 एमडब्ल्यू से बढ़कर 2025 तक लगभग 1,500 एमडब्ल्यू हो गई है। मुंबई, नवी मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, नोएडा और जामनगर में प्रमुख डेटा सेंटर हब के रूप में उभरकर सामने आए हैं। साथ ही, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में कई बड़े हाइपरस्केल और एआई-केंद्रित डेटा सेंटरों का विकास किया जा रहा है, जो भारत के भविष्य के लिए तैयार डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर इकोसिस्टम को और अधिक सशक्त बना रहे हैं।
साथ ही, बायोटेक्नोलॉजी एक अहम टेक्नोलॉजी सेक्टर के रूप में उभर रही है, जो टेक्नोलॉजी-आधारित इंडस्ट्रियल एप्लीकेशन में इनोवेशन को बढ़ावा दे रही है। जीनोमिक्स, सटीक चिकित्सा, सिंथेटिक बायोलॉजी और डिजिटल बायोटेक्नोलॉजी में हुई प्रगति अर्थव्यवस्थाओं को रूपांतरित कर रही है और स्वास्थ्य एवं खाद्य सुरक्षा प्रणालियों को सुदृढ़ बना रही है। जैसे-जैसे वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं बायो-इकोनॉमी से जुड़ी ग्रोथ में निवेश बढ़ा रही हैं, बायोटेक्नोलॉजी भविष्य की इंडस्ट्रियल कॉम्पिटिटिवनेस, साइंटिफिक इनोवेशन और आर्थिक मजबूती का एक अहम आधार बनती जा रही है।
पिछले एक दशक में, भारत ने मिशन-संचालित नीतियों और रणनीतिक निवेशों के माध्यम से बायोटेक्नोलॉजी इकोसिस्टम को अत्यधिक सहयोग प्रदान किया है। बायोटेक्नोलॉजी विभाग और बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल ने इनोवेशन, एंटरप्रेन्योरशिप और बायो-मैन्युफैक्चरिंग में तेजी लाने के लिए लक्षित खास कदम उठाए हैं। प्रमुख पहलों में 2017 में ₹1,500 करोड़ के परिव्यय के साथ स्वीकृत नेशनल बायोफार्मा मिशन, 2023 में शुरू की गई बायो-ई3 नीति, बायोनेस्ट इनक्यूबेटर, और 'इंटेंसिफाइंग द इम्पैक्ट ऑफ इंडस्ट्रियल इनोवेशन', i4, तथा 'प्रमोटिंग एकेडमिक रिसर्च कन्वर्जन टू एंटरप्राइज' जैसी नवाचार योजनाएं शामिल हैं। भारत ने स्वदेशी नवाचार और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बायोटेक्नोलॉजी इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए ट्रांसलेशनल रिसर्च इन्फ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर सहायता और बायोटेक्नोलॉजी इनक्यूबेशन सुविधाओं का भी विस्तार किया है।
भारत के जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र ने पिछले एक दशक में महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की है। इसने 2023 में 150 बिलियन अमेरिकी डॉलर के आंकडे को पार कर लिया, जिससे 'नेशनल बायोटेक डेवलपमेंट स्ट्रैटेजी 2021' का लक्ष्य समय से दो साल पहले ही हासिल कर लिया गया। 2024 के अंत तक यह क्षेत्र 165.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है। नवाचार क्षमता को सुदृढ़ करने के लिए, डीबीटी-बीआईआरएसी ने 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 94 बायो-इंक्यूबेटर स्थापित किए हैं और स्टार्टअप्स एवं अनुसंधान-संचालित उद्यमों को 50 लाख रुपये से लेकर 10.5 करोड़ रुपये तक की वित्तीय सहायता प्रदान की है।
भारत, निरंतर सरकारी निवेश और उन्नत प्रौद्योगिकी इकोसिस्टम में मिशन-मोड प्रोग्राम के माध्यम से भविष्य की तैयारियों को मजबूत कर रहा है। रणनीतिक नीतिगत समर्थन और उद्योग जगत की साझेदारियां स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास और नवाचार-आधारित विकास को गति प्रदान कर रही हैं। ये पहल एक सशक्त राष्ट्रीय नवाचार इकोसिस्टम का निर्माण कर रही हैं और भारत को अगली पीढ़ी की टेक्नोलॉजी के लिए एक भरोसेमंद ग्लोबल हब के रूप में स्थापित कर रही हैं। भारत 'विकसित भारत' के विजन के अनुरूप एक ग्लोबल टेक्नोलॉजी पावरहाउस के रूप में निरंतर उभर रहा है।
भविष्य को आकार देने वाली प्रौद्योगिकियों के लिए केवल इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश की ही आवश्यकता नहीं है, बल्कि इसके लिए एक कुशल कार्यबल, मजबूत अनुसंधान संस्थान और नवाचार की संस्कृति का होना भी अनिवार्य है। इस आवश्यकता को पहचानते हुए, भारत ने ह्यूमन कैपिटल बनाने, रिसर्च इकोसिस्टम को मज़बूत करने और अगली पीढ़ी को टेक्नोलॉजी पर आधारित भविष्य के लिए तैयार करने की दिशा में व्यापक प्रयास शुरू किए हैं। अनुसंधान, कौशल विकास, उच्च शिक्षा और उद्योग जगत की साझेदारियों में निवेश के माध्यम से, भारत सरकार उन आधारभूत स्तंभों का निर्माण कर रही है जो उभरते हुए प्रौद्योगिकी युग में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए आवश्यक हैं।
इस दिशा में एक बड़ा कदम 2024 में 'अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन' का परिचालन है। एएनआरएफ उच्च-प्रभाव वाले अनुसंधान और नवाचार को गति देने के लिए शिक्षा जगत, उद्योग, स्टार्टअप्स और सरकारी संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ावा देता है। इसके फोकस क्षेत्रों में एआई, सेमीकंडक्टर्स, एडवांस्ड मटीरियल और अन्य अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियां शामिल हैं। 'मिशन फॉर एडवांसमेंट इन हाई-इम्पैक्ट एरियाज', 'पार्टनरशिप्स फॉर एक्सीलरेटेड इनोवेशन एंड रिसर्च' और 'एएनआरएफ ट्रांसलेशनल रिसर्च एंड इनोवेशन' जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से, यह फाउंडेशन लैब में हुए रिसर्च को व्यावहारिक जीवन में इस्तेमाल के लायक बनाने में मदद कर रहा है।
एएनआरएफ ने युवा शोधकर्ताओं, पोस्ट-डॉक्टरल स्कॉलर्स और विदेशों में कार्यरत भारतीय वैज्ञानिकों के लिए फेलोशिप और ग्रांट भी प्रारंभ किए हैं। मार्च 2026 तक, हाई-इम्पैक्ट टेक्नोलॉजी वाले क्षेत्रों में 264.70 करोड़ रुपये की ग्रांट दी जा चुकी थी। डीप-टेक नवाचार को और अधिक मजबूती प्रदान करने के लिए, सरकार ने जुलाई 2025 में एक लाख करोड़ रुपये के कोष के साथ 'अनुसंधान विकास और नवाचार' योजना को मंजूरी दी है। एएनआरएफ के अंतर्गत संचालित और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा कार्यान्वित यह योजना, निजी क्षेत्र के अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए दीर्घकालिक और सुलभ वित्तीय सहायता प्रदान करती है। इसके प्रमुख क्षेत्रों में एआई, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियां, डीप-टेक स्टार्टअप और रणनीतिक उद्योग शामिल हैं। एएनआरएफ और आरडीआई वैज्ञानिक अनुसंधान, औद्योगिक नवाचार और आर्थिक विकास के मध्य एक सशक्त आधार का निर्माण कर रहे हैं।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्किल्स के मुंबई और अहमदाबाद परिसरों का पहला चरण, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत 9 अक्टूबर 2024 को शुरू हुआ, जिसमें टाटा आईआईएस ऑपरेटिंग पार्टनर है। इन संस्थानों का मुख्य उद्देश्य इंडस्ट्री 4.0 के लिए एक कुशल कार्यबल तैयार करना है। इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मेक्ट्रोनिक्स, डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग, डेटा एनालिटिक्स, फैक्ट्री ऑटोमेशन और एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग जैसे आधुनिक क्षेत्रों में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है, जो भारत के उभरते प्रौद्योगिकी और उन्नत विनिर्माण इकोसिस्टम को मजबूती प्रदान कर रहा है।
भारत की प्रौद्योगिकी महत्वाकांक्षाओं को साकार करने के लिए एक ऐसा कार्यबल अनिवार्य है जो उभरते डिजिटल कौशल से सुसज्जित हो। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए साल 2018 में 'फ्यूचरस्किल्स प्राइम' कार्यक्रम लॉन्च किया। यह कार्यक्रम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिग डेटा एनालिटिक्स, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, साइबर सिक्योरिटी, ब्लॉकचेन और ऑगमेंटेड एवं वर्चुअल रियलिटी जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में स्किलिंग, री-स्किलिंग और अप-स्किलिंग पर केंद्रित है। शिक्षार्थी उद्योग-मानकों के अनुरूप ऑनलाइन पाठ्यक्रमों तक पहुंच प्राप्त कर सकते हैं और सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त प्रमाणपत्र अर्जित कर सकते हैं।
फ्यूचरस्किल्स प्राइम भारत की सबसे बड़ी डिजिटल कौशल पहल में से एक के रूप में उभरी है। मार्च 2026 तक, इस प्लेटफॉर्म पर 27.53 लाख से अधिक उम्मीदवारों ने पंजीकरण कराया है, जबकि 17.14 लाख से अधिक शिक्षार्थियों ने नामांकन या प्रशिक्षण पूर्ण कर लिया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि लगभग 80 प्रतिशत शिक्षार्थी टियर-2 और टियर-3 शहरों से हैं, जो प्रमुख शहरी केंद्रों से आगे अवसरों के विस्तार में मदद कर रहे हैं। यह व्यापक भागीदारी भारत की डिजिटल टैलेंट पाइपलाइन को मजबूत कर रही है और प्रौद्योगिकी अर्थव्यवस्था में समावेशन को बढ़ावा दे रही है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी ने तकनीकी प्रतिभा को विकसित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अपने 56 केंद्रों, 750 संबद्ध संस्थानों और 9,000 से अधिक सुविधा केंद्रों के माध्यम से कार्यरत, एआई, साइबर सुरक्षा, ब्लॉकचेन, आईओटी, क्लाउड कंप्यूटिंग, तथा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम डिज़ाइन और मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्रों में प्रशिक्षण प्रदान करता है। जुलाई 2024 में डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी का दर्जा प्राप्त करने वाले इस संस्थान ने अब तक देशभर में एक करोड़ से अधिक उम्मीदवारों के लिए परीक्षाएं आयोजित की हैं। संस्थान ने 27 केंद्रों पर इंडियाएआई डेटा लैब्स स्थापित किए हैं और आकांक्षी जिलों में डिजिटल कौशल कार्यक्रम कार्यान्वित किए हैं। ये प्रयास एक भौगोलिक रूप से विविध और भविष्य के लिए तैयार कार्यबल के निर्माण में सहायक सिद्ध हो रहे हैं।
संस्थान के केंद्र अगरतला, आइजोल, अजमेर, औरंगाबाद, बालासोर, भुवनेश्वर, बीकानेर, बक्सर, कालीकट, चंडीगढ़, चेन्नई, चित्रदुर्ग, चुचुयिमलांग, चुराचांदपुर, दमन, दिल्ली, पूर्वी दिल्ली, दक्षिण-पश्चिम दिल्ली, डिब्रूगढ़, दीमापुर, गंगटोक, गोरखपुर, गुवाहाटी, हरिद्वार, हैदराबाद, इंफाल, ईटानगर, जम्मू, जोरहाट, कारगिल, कोहिमा, कोलकाता, कोकराझार, कुरुक्षेत्र, लेह, लखनऊ, लुंगलेई, माजुली, मंडी, मुजफ्फरपुर, नोएडा, पासीघाट, पटना, पाली, पीलीभीत, रांची, रोपड़, सेनापति, शिलांग, शिमला, सिलचर, श्रीनगर, तेजपुर, तेजू, तिरुपति और तुरा में स्थित हैं।
भारत एआई के क्षेत्र में लीडरशिप हासिल करने के लिए खास संस्थानों में भी निवेश कर रहा है। भारत ने कुल ₹1,490 करोड़ के बजट से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में चार सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस स्थापित किए हैं। ये सेंटर शिक्षा, हेल्थकेयर, सस्टेनेबल शहरों और खेती पर ध्यान केंद्रित करते हैं और इनका नेतृत्व क्रमशः इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मद्रास, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बेंगलुरु, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी कानपुर और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी रोपड़ कर रहे हैं।
उत्कृष्टता केंद्र पहले से ही प्रैक्टिकल समाधान प्रदान कर रहे हैं। 'सस्टेनेबल सिटीज़' एआई-आधारित यातायात और बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली विकसित कर रहा है। 'हेल्थकेयर CoE' ओरल कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर, रेटिना से जुड़ी बीमारियों और डायबिटीज़ जैसी बीमारियों का पता लगाने के लिए एआई उपकरण तैयार कर रहा है। 'एग्रीकल्चर CoE' ने क्लाइमेट-स्मार्ट खेती को समर्थन देने और कृषि संबंधी निर्णय लेने की क्षमता में सुधार करने के लिए ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन लगाए हैं। ये पहल प्रदर्शित करती हैं कि एआई किस प्रकार भारत की नवाचार क्षमताओं को मजबूत करते हुए वास्तविक दुनिया की चुनौतियों का समाधान कर सकती ह

समीक्षा भारती न्यूज सर्विस





Related Items
एक दर्दनाक फैसले ने यूं भारत की सभ्यतागत धारा को बचाए रखा...
उत्तर प्रदेश बन रहा है भारत की धड़कन, कोई ‘बीमारू’ नहीं…
लोहिया की बेचैन विरासत, कांग्रेस-मुक्त भारत का पहला खाका