महामारी के बाद, मथुरा के मंदिरों में इस बार है जन्माष्टमी की जबर्दस्त धूम

महामारी के दो साल बीत जाने के बाद, इस बार की जन्माष्टमी बेहद खास है। मथुरा के मंदिरों में इस बार जन्माष्टमी के त्योहार का भव्य आयोजन किया जा रहा है।

आचार्य अमित भारद्वाज के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टम तिथि 18 अगस्त, गुरुवार की रात 9:21 से शुरू होगी। तिथि का समापन 19 अगस्त 2022 शुक्रवार की रात 10.50 पर होगा।

मथुरा ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व असीम श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता रहा है। पिछले दो वर्ष के दौरान, कोरोना के चलते, जन्माष्टमी के सभी आयोजन मंदिरों में तो परम्परागत तरीके से सम्पन्न हुए लेकिन, बाहरी लोगों का प्रवेश वर्जित रहा। लेकिन, इस बार श्रद्धालुओं द्वारा भगवान श्रीकृष्ण का जन्म पूरे धूमधाम से मनाया जा रहा है।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर ब्रज के कण-कण में अपूर्व हर्षोल्लास छा जाता है। इस दिन श्रद्धालु आपने घर-आंगन को गोबर से लीपकर, दरवाजों पर बंदरवार बांधकर, भव्य सजावट करके, मंगल सूचक थापे लगाकर और फूलों से घर में पालने सजाकर तैयारी करते हैं। इस अवसर पर मंदिरों को सजाया जाता है। कीर्तन गाए जाते हैं, घंटियां बजाई जाती हैं, शंख बजाया जाता है और भगवान कृष्ण की स्तुति में संस्कृत के भजन गाए जाते हैं। भगवान कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में इस समय विशेष आध्यात्मिक सभाओं का आयोजन किया जाता है। पूरे भारत के तीर्थयात्री इन उत्सव समारोहों में शामिल होते हैं।

ब्रज के घर-घर में भगवान को नए वस्त्र पहनाकर उनका श्रृंगार करके झांकियां सजाई जाती हैं। महिलाएं अपने यहां रखे शालिग्राम को एक खीरे में रखकर डोर से बांधकर मध्य रात्रि को पंचामृत स्नान कराती हैं। इस प्रकार से भगवान श्री कृष्ण का प्रतीक रूप में जन्म की भावनाएं संजोई जाती हैं। स्त्री, पुरुष और बच्चे सभी व्रत रखते हैं और श्री कृष्ण के जन्म के दर्शन के उपरान्त ही अपना व्रत खोलते हैं। हर घर में शंख, घन्टा, घड़ियाल की ध्वनि ऐसे गूंज उठती हैं मानो वहां किसी बालक का ही जन्म हुआ हो। ‘‘नन्द के आनन्द भए, जय कन्हैया लाल की’’ गाते हुए हर तरफ टोलियां नजर आने लगती हैं।

मथुरा के श्री रंगनाथ मंदिर में जन्माष्टमी का भव्य आयोजन होता है। दक्षिण भारतीय शैली में बने इस मंदिर में भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के दूसरे दिन नंदोत्सव की धूम रहती है। नन्दोत्सव के दौरान सुप्रसिद्ध लठ्ठे के मेले का आयोजन किया जाता है। जब भगवान रंगनाथ रथ पर विराजमान होकर मंदिर के पश्चिमी द्वार पर आते हैं तो लठ्ठे पर चढ़ने वाले पहलवान भगवान रंगनाथ को दण्डवत कर विजयश्री का आशीर्वाद लेकर लठ्ठे पर चढ़ना प्रारम्भ करते हैं। 35 फुट ऊंचे लठ्ठे पर जब पहलवान चढ़ना शुरू करते हैं तो उसी समय मचान के ऊपर से कई मन तेल और पानी की धार अन्य ग्वाल-वालों द्वारा लठ्ठे के सहारे गिराई जाती है। इससे पहलवान फिसलकर नीचे जमीन पर आ गिरते हैं। इसे देखकर श्रद्धालुओं में रोमांच की अनुभूति होती है। पुनः भगवान का आशीर्वाद लेकर पहलवान एक दूसरे को सहारा देकर लठ्ठे पर चढ़ने का प्रयास करते है। कई घंटों की मशक्कत के बाद आखिर पहलवानों को भगवान के आशीर्वाद से लठ्ठे पर चढ़कर जीत हासिल करने का मौका मिलता है।

बांके बिहारी मंदिर में जन्माष्टमी की रात ढाई बजे अभिषेक होता है। प्रातः पांच बजे से मंगला आरती के दर्शन होते हैं। यहां की एक विशेषता यह है कि बांके बिहारी जी की निकुंज सेवा होने के कारण आरती में कोई शंख, घण्टा, घड़ियाल नहीं बजते बल्कि शान्त भाव में आरती होती है।

दूसरी ओर, उत्तर भारतीय स्थापत्य शैली में लाल पत्थर से बने वृंदावन स्थित प्राचीनतम श्रीगोविंद देव मंदिर में जन्माष्टमी के दिन विधि-विधान से पूजा-अर्चना और अभिषेक का कार्यक्रम होता है।

इसके साथ-साथ, अंग्रेज मंदिर यानी इस्कॉन मंदिर में जन्माष्टमी के दिन भजन कीर्तन तथा प्रसाद वितरण होता है। रात्रि में अभिषेक का कार्यक्रम होता है। भजन के साथ-साथ हरी नाम संकीर्तन के साथ नृत्य किया जाता है।

द्वारिकाधीश मन्दिर में इस दिन 108 शालिग्राम का पंचामृत अभिषेक होता है तथा यहां अष्टभुजा द्वारकानाथ के श्रीविग्रह का भी पंचामृत अभिषेक किया जाता है।

श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर जन्माष्टमी की रात को 12 बजे श्रीविग्रह का पंचामृत अभिषेक होता है। इसके बाद श्रद्धालु नाचते, गाते, कीर्तन करते हुए भाव विभोर हो जाते हैं।

प्राचीन केशवदेव मंदिर में जन्माष्टमी एक दिन पूर्व मनाई जाती है। यहां पंचामृत अभिषेक के पश्चात आकर्षक झांकियों में सजी कृष्ण की चर्तुभुज प्रतिमा के हजारों की संख्या में दर्शनार्थी मध्य रात्रि तक भगवान केशव देव के अभिषेक के दर्शन करते हैं। यहां भजन, कीर्तन, नाच गाने के बीच हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में त्योहार मनाया जाता है। पुरानी केशवदेव प्रतिमा को बाहर लाया जाता है। रात्रि में ठीक 12 बजे गोस्वामियों द्वारा अभिषेक सम्पन्न कराया जाता है। इसमें दही, मधु, शक्कर, दूध व यमुना जल से अभिषेक कराने के बाद भव्य दर्शन होते हैं।

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