हवा महल के आसपास की हलचल से आगे बढ़ते हुए जब जयपुर के जंतर-मंतर में प्रवेश किया तो वातावरण कुछ अलग लगा। सामने फैली ज्यामितीय आकृतियां, ऊंची दीवारें, कोण बनाती संरचनाएं और विशाल चाप मन में स्वाभाविक जिज्ञासा पैदा करते हैं। यह कोई पारंपरिक महल या मंदिर नहीं है, फिर भी पूरा परिसर अपने आप में असाधारण दिखाई देता है।
जयपुर का जंतर-मंतर महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 18वीं शताब्दी में बनवाया था। वह खगोल विज्ञान और गणित में गहरी रुचि रखते थे। उन्होंने भारत के अलग-अलग स्थानों पर ऐसी वेधशालाएं बनवाईं और खगोलीय गणनाओं को अधिक सटीक बनाने के लिए विशाल यंत्रों का निर्माण कराया। जयपुर का जंतर-मंतर इन वेधशालाओं में सबसे बड़ा और सबसे प्रसिद्ध है।
परिसर में प्रवेश करते ही सबसे पहले यह बात ध्यान खींचती है कि यहां इस्तेमाल किए गए यंत्रों का आकार आखिर इतना बड़ा क्यों रखा गया होगा। आधुनिक युग में जब मोबाइल फोन कुछ सेकंड में समय, दिशा और ग्रहों की स्थिति से जुड़ी जानकारी दे सकते हैं, तब पत्थर और चूने से बने इतने विशाल उपकरणों की कल्पना करना अपने आप में रोचक है। लेकिन, उस समय यही विशालता गणना की सटीकता बढ़ाने का माध्यम थी।
जंतर-मंतर का सबसे प्रसिद्ध यंत्र संभवतः 'सम्राट यंत्र' है। इसकी विशाल त्रिकोणीय संरचना को देखकर पहली नजर में उसके वैज्ञानिक उद्देश्य का अनुमान लगाना आसान नहीं है। लेकिन, यही संरचना सूर्य की छाया के आधार पर समय मापने के लिए इस्तेमाल की जाती थी। सीढ़ीनुमा विशाल ढलान और उसके दोनों ओर बनी संरचनाओं को देखकर यह महसूस होता है कि खगोल विज्ञान को समझने के लिए उस समय कितनी सूक्ष्म गणनाओं की आवश्यकता होती होगी।
सम्राट यंत्र के पास कुछ देर खड़े होकर समय के बारे में सोचने का अनुभव भी अलग था। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में घड़ी की सुइयां समय को सहज बना देती हैं। यहां समय किसी डिजिटल अंक के रूप में नहीं, बल्कि सूर्य की गति और उसकी छाया के माध्यम से दिखाई देता है। यह अनुभव हमें याद दिलाता है कि घड़ी के आविष्कार से बहुत पहले मनुष्य प्रकृति की गति को देखकर समय को समझता था।
जंतर-मंतर के दूसरे यंत्र भी अलग-अलग खगोलीय गणनाओं के लिए बनाए गए थे। ग्रहों और तारों की स्थिति जानने, समय निर्धारित करने और आकाशीय पिंडों की गति का अध्ययन करने के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता था। हर यंत्र का आकार, कोण और संरचना किसी गणितीय सोच पर आधारित है। उन्हें देखकर यह समझना आसान होता है कि प्राचीन और मध्यकालीन वैज्ञानिक परंपराओं में गणित और खगोल विज्ञान एक-दूसरे से कितने गहरे जुड़े हुए थे।
इस परिसर की सबसे दिलचस्प बात शायद यह है कि यहां विज्ञान किसी बंद कमरे में रखी किताब या प्रयोगशाला के उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि खुले आकाश के नीचे दिखाई देता है। सूर्य सामने है, उसकी छाया जमीन पर पड़ रही है और पत्थर की संरचनाएं उस छाया को पढ़ने का माध्यम बन रही हैं। यह अनुभव विज्ञान को देखने और महसूस करने का एक अलग तरीका देता है।
जंतर-मंतर को देखते हुए सवाई जय सिंह द्वितीय की उस जिज्ञासा की कल्पना भी होती है, जिसने इतने बड़े पैमाने पर वेधशालाओं के निर्माण को संभव बनाया। उस समय आज जैसी आधुनिक तकनीक उपलब्ध नहीं थी। फिर भी आकाशीय घटनाओं को समझने, गणनाओं को बेहतर बनाने और समय को अधिक सटीकता से मापने का प्रयास इतना गंभीर था कि उसके लिए विशाल स्थापत्य संरचनाएं खड़ी कर दी गईं।
मेरे लिए जंतर-मंतर की यात्रा केवल ऐतिहासिक स्मारक देखने का अनुभव नहीं रही। यहां घूमते हुए यह एहसास हुआ कि विज्ञान की शुरुआत भी शायद उसी जिज्ञासा से होती है, जो किसी अनजान चीज को देखकर मन में सवाल पैदा करती है। सूर्य कहां है? छाया क्यों बदल रही है? दिन कितना बीत चुका है? आकाश में दिखाई देने वाला कोई पिंड किस दिशा में है? ऐसे साधारण लगने वाले सवाल ही आगे चलकर जटिल गणनाओं और वैज्ञानिक उपकरणों का आधार बने होंगे।
कुल मिलाकर, जंतर-मंतर मनुष्य की वैज्ञानिक जिज्ञासा का स्मारक है। यह बताता है कि इतिहास केवल युद्धों, राजाओं और महलों का नहीं होता; वह उन लोगों का भी होता है जिन्होंने आकाश को देखकर सवाल पूछे और उन सवालों के उत्तर खोजने के लिए पत्थरों में गणित को आकार दिया।
जंतर-मंतर से बाहर निकलते समय मेरे मन में सबसे अधिक यही विचार था कि समय को मापने के लिए बनाए गए ये यंत्र स्वयं समय की परीक्षा से गुजरकर आज हमारे सामने खड़े हैं। कभी जिन उपकरणों से आकाश को समझा जाता था, वे आज इतिहास और विज्ञान की विरासत बन चुके हैं। फिर भी उनका मूल संदेश अब भी वही है—आकाश को देखिए, सवाल पूछिए और चीजों को समझने की कोशिश कीजिए।

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