कल्पना कीजिए, श्याम बेनेगल की मशहूर फिल्म ‘अंकुर’ का वह आखिरी दृश्य। गांव का एक छोटा लड़का सब कुछ चुपचाप देख रहा है- जमींदार की हुकूमत, गरीबों की बेबसी और अन्याय का खेल। फिर अचानक वह एक पत्थर उठाता है। पत्थर हवेली की ओर उछलता है। स्क्रीन लाल हो जाती है। एक छोटा-सा पत्थर, मगर उसके भीतर बगावत का एक बड़ा बीज छिपा है। आज 2026 के भारत में वही दृश्य फिर याद आता है।
इस बार पत्थर असली नहीं है। कभी वह परीक्षा में पेपर लीक के खिलाफ नारा बनता है। कभी सोशल मीडिया का मीम बनता है। कभी जंतर-मंतर पर छात्रों की भीड़ बन जाता है। और अब वही आवाज उत्तर प्रदेश के गांवों के स्कूलों तक पहुंच रही है।
उन्नाव, लखनऊ, कन्नौज और हमीरपुर में बच्चे सवाल पूछ रहे हैं। खाना ठीक क्यों नहीं है? पीने का पानी कहां है? शिक्षक पूरे क्यों नहीं हैं? स्कूल तक पहुंचने के लिए सड़क क्यों नहीं है? हमीरपुर के चंदूपुर और आसपास के गांवों में सैकड़ों बच्चे अपनी मांग लेकर कलेक्ट्रेट तक पहुंच गए। उनकी मांग कोई आसमान से तारे तोड़ने वाली नहीं थी। बस स्कूल तक जाने के लिए एक ठीक सड़क चाहिए थी। बच्चों को समझाने और दबाव डालने की कोशिशें हुईं। मगर इस बार बच्चे चुप रहने को तैयार नहीं थे।
असल में यह आग कहीं और भड़की थी। दिल्ली के जंतर-मंतर पर। शुरुआत हुई परीक्षा के पेपर लीक से। खासकर नीट जैसी बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा ने लाखों युवाओं का भरोसा हिला दिया। छात्रों को लगा कि वे सालों पढ़ें, कोचिंग में लाखों खर्च करें और आखिर में कोई पेपर चुरा ले जाए; तो मेहनत का मतलब क्या रह जाता है?
कुछ युवा प्रदर्शनकारियों ने अपने समूह को मजाकिया अंदाज में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ कहा। नाम अजीब था, तरीका भी नया था। पुराने छात्र संगठनों और लंबे-लंबे भाषणों की जगह मीम थे, इंस्टाग्राम था, वीडियो थे और सोशल मीडिया का शोर था। मगर धीरे-धीरे हंसी के पीछे का गुस्सा साफ दिखाई देने लगा।
सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे। 20 जुलाई को संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव पैदा हुआ। पुलिस ने रोका, प्रदर्शनकारियों ने दबाव बनाए रखा। और फिर हुआ वह, जिसकी शायद किसी ने उम्मीद नहीं की थी।
सड़क का दबाव सत्ता के दरवाजे तक पहुंच गया। 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह मोदी दौर की राजनीति में एक असाधारण घटना मानी गई। पहली बार लगा कि सड़क पर खड़े साधारण छात्रों की आवाज किसी बड़े मंत्री की कुर्सी तक पहुंच सकती है।
इसके बाद कार्रवाई का सिलसिला शुरू हुआ। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी से जुड़े करीब 600 अधिकारियों को हटाया गया। परीक्षा प्रश्नपत्रों की जांच के लिए नई चार-स्तरीय व्यवस्था बनाई गई। परीक्षा केंद्रों की गोपनीयता की सुरक्षा कड़ी की गई।
15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग और एक करोड़ युवाओं को एआई प्रशिक्षण देने की घोषणा की। इसके बाद मंत्री विश्वविद्यालय परिसरों में सीधे पहुंचने लगे। ‘वन डे, वन यूनिवर्सिटी’ जैसे कार्यक्रम शुरू हुए।
सवाल यह है कि यह सब किसने कराया? न कोई बड़ा विपक्षी आंदोलन। न कोई अनुभवी राजनीतिक दल। न कोई स्थापित छात्र यूनियन। यह काम उन युवाओं ने किया, जिन्हें राजनीति अक्सर नासमझ समझती रही है। दिलचस्प बात यह भी रही कि जिस विपक्ष से सरकार को चुनौती देने की उम्मीद थी, वह लंबे समय से दिशा खोजता नजर आया। राहुल गांधी के नेतृत्व वाला विपक्ष लगातार चुनावी हार और संगठनात्मक कमजोरियों से जूझता रहा। इंडी गठबंधन भी कोई ऐसी साफ कहानी नहीं बना पाया, जो आम मतदाता को एक मजबूत विकल्प दिखाई दे।
संसद में हंगामा हुआ, विरोध हुआ, नारे लगे। मगर सत्ता की चमक पर कोई खास खरोंच नहीं आई। फिर अचानक जंतर-मंतर पर यह अजीब-सी हलचल शुरू हुई। ‘कॉकरोच’ वाला तमाशा, तीखी भाषा, गालियां और निजी हमले, कुछ लोगों को भद्दा लगा लड़कियों द्वारा गालियां बकना; लड़के तो लड़के होते हैं! मगर राजनीति के ठहरे हुए तालाब में किसी ने पत्थर जरूर फेंक दिया था। लहरें उठीं।
इसे 1970 के दशक के जयप्रकाश नारायण आंदोलन से मिलाना आसान है। तब भी छात्र फीस, भ्रष्टाचार और व्यवस्था से परेशान थे। बाद में आंदोलन ‘संपूर्ण क्रांति’ तक पहुंच गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण एक नैतिक चेहरा बने। इस बार सोनम वांगचुक ने भी युवाओं के गुस्से को एक नैतिक ताकत देने की अधूरी कोशिश की। मगर दोनों आंदोलनों में बड़ा फर्क है।
जेपी आंदोलन पूरी व्यवस्था बदलना चाहता था। 2026 के छात्रों की मांगें ज्यादा सीधी थीं, पेपर लीक बंद करो, जिम्मेदारों को हटाओ, परीक्षा व्यवस्था ठीक करो। और सबसे बड़ी बात, इनकी राजनीति व्हाट्सऐप, मीम और इंस्टाग्राम पर बनी। यह यूनियन के दफ्तरों की राजनीति नहीं थी। यह मोबाइल फोन की राजनीति थी। लेकिन, कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
जंतर-मंतर का छोटा पत्थर अब उत्तर प्रदेश के गांवों तक पहुंच गया है। अब बच्चे पेपर लीक के खिलाफ ही नहीं, स्कूल पहुंचने की सड़क, साफ पानी, अच्छा खाना और शिक्षक की मांग कर रहे हैं। यही असली इम्तिहान है।
मंत्री का इस्तीफा हो जाना आसान है। कुछ अफसरों को हटाना भी आसान है। नई नीति की घोषणा करना तो सबसे आसान काम है। मुश्किल काम है व्यवस्था को बदलना। भारत की कोचिंग संस्कृति अभी भी जवान है। परीक्षा का जुनून अभी भी बेकाबू है। गांवों के स्कूलों की हालत कई जगहों पर खराब है। डिग्री और रोजगार के बीच की खाई भी जस की तस है। फिर भी एक बात साफ हो गई है। जब बड़े लोग सो जाते हैं, कभी-कभी बच्चे घंटी बजा देते हैं। ‘अंकुर’ के उस बच्चे ने एक पत्थर फेंका था। 2026 के बच्चों ने भी पत्थर फेंका है।
अब देखना यह है कि सत्ता पक्ष उस पत्थर को सिर्फ एक शरारत समझती है, या उसके भीतर उगते नए ‘अंकुर’ को पहचानती है। गनीमत है कि केंद्र सरकार ने इसे पॉजिटिव दृष्टि से लिया है, और तत्परता से आवश्यक पहलें की हैं।

बृज खंडेलवाल





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