बॉलीवुड की फिल्मों में भगवान के प्रति आस्था को अक्सर प्रार्थना, भजन और समर्पण के जरिए व्यक्त किया जाता रहा है, लेकिन कुछ दृश्य ऐसे भी हैं, जिनमें नायक अपने आराध्य के सामने सिर झुकाने के बजाय उनसे सवाल करते हैं। वे अपने दुख का कारण जानना चाहते हैं, अपने साथ हुए अन्याय का हिसाब मांगते हैं और कभी-कभी भगवान को ही अपने उलाहनों के घेरे में खड़ा कर देते हैं। हिंदी सिनेमा में ऐसे दो दृश्य खास तौर पर याद आते हैं। एक है फिल्म ‘दीवार’ में अमिताभ बच्चन का ‘आज खुश तो बहुत होगे तुम...’ वाला दृश्य और दूसरा है फिल्म ‘सुर संगम’ में गिरीश कर्नाड पर फिल्माया गया गीत ‘हे शिवशंकर...’। दोनों दृश्यों का अंदाज एकदम अलग है, लेकिन दोनों में भगवान शिव से शिकायत का भाव समान है।
साल 1975 में रिलीज हुई फिल्म ‘दीवार’ में अमिताभ बच्चन ने विजय का किरदार निभाया था। विजय ऐसा व्यक्ति है, जिसके भीतर बचपन से ही परिस्थितियों के प्रति गहरा आक्रोश जमा है। परिवार के साथ हुए अन्याय और जीवन के संघर्षों ने उसे व्यवस्था से ही नहीं, बल्कि उस ईश्वर से भी दूर कर दिया है, जिस पर उसकी मां सुमित्रा देवी का अटूट विश्वास है। मां की आस्था और बेटे का विद्रोह फिल्म में दो विपरीत ध्रुवों की तरह दिखाई देते हैं। विजय मंदिर जाने और भगवान के सामने सिर झुकाने से इनकार करता है, लेकिन जब मां की जिंदगी खतरे में पड़ती है, तो उसे उसी दरवाजे पर पहुंचना पड़ता है, जिससे वह हमेशा दूर रहा है।
मंदिर में भगवान शिव के सामने खड़े विजय के मुंह से निकला संवाद ‘आज खुश तो बहुत होगे तुम...’ हिंदी सिनेमा के यादगार दृश्यों में शामिल है। यह किसी भक्त की सामान्य प्रार्थना नहीं है, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति का उलाहना है, जो अपने जीवन की परिस्थितियों से हारकर भी अपनी नाराजगी छोड़ने को तैयार नहीं है। वह भगवान से पूछता है कि आखिर उसके परिवार को ही इतने दुख क्यों मिले? जिस मां ने जीवनभर ईश्वर पर भरोसा किया, उसी को इतनी पीड़ा क्यों सहनी पड़ रही है? विजय की शिकायत में व्यंग्य है, चुनौती है और वर्षों से भीतर दबा आक्रोश भी। वह मां की जिंदगी बचाने के लिए भगवान के सामने आया जरूर है, लेकिन उसकी जुबान पर समर्पण से पहले सवाल हैं।
विजय का यह व्यवहार उसके 'एंग्री यंग मैन' वाले व्यक्तित्व के अनुरूप है। वह किसी के सामने अपनी कमजोरी जाहिर नहीं करना चाहता। भगवान के सामने खड़े होकर भी वह अपनी बेबसी को गुस्से और व्यंग्य के पीछे छिपाने की कोशिश करता है। उसकी शिकायत केवल वर्तमान संकट को लेकर नहीं है, बल्कि उन तमाम परिस्थितियों को लेकर है, जिन्होंने उसे इस मुकाम तक पहुंचाया है। वह मानो भगवान को याद दिलाना चाहता है कि जब जीवन में सब कुछ उसके खिलाफ हो रहा था, तब ईश्वर ने उसकी पुकार क्यों नहीं सुनी। अब जब वह मजबूरी में उनके सामने खड़ा है, तो इस क्षण को वह अपनी हार के साथ-साथ भगवान के सामने एक सवाल के रूप में भी देखता है।
इसके ठीक अलग अंदाज में फिल्म ‘सुर संगम’ में गिरीश कर्नाड का चरित्र पंडित शिवशंकर शास्त्री भगवान शिव से अपनी शिकायत व्यक्त करता है। लेकिन, यहां सलीम-जावेद का संवाद नहीं बल्कि पंडित राजन मिश्र का गाया एक बेहतरीन गीत है। साल 1985 में रिलीज हुई इस फिल्म में नायक शास्त्रीय संगीत का साधक है, जिसके लिए संगीत केवल कला या आजीविका का साधन नहीं, बल्कि ईश्वर की आराधना है। उसके सुरों में शिव का वास है और उसकी साधना का आधार भी वही हैं। लेकिन, जब उसके संगीत और साधना को सामाजिक संकीर्णता तथा विरोध का सामना करना पड़ता है, तो उसकी पीड़ा भगवान शिव तक पहुंचती है। इसी भावभूमि में ‘हे शिवशंकर...’ गीत सामने आता है।
"मेरे भीतर तुम गाते हो, सुन लो तुम अपना ये स्वर…" में पंडित शिवशंकर शास्त्री का स्वर विनम्र जरूर है, लेकिन उसकी शिकायत कम गहरी नहीं है। वह भगवान शिव के सामने अपनी व्यथा रखता है। उसके भाव का मर्म यह है कि जब ईश्वर स्वयं उसके भीतर गायन करते हैं, जब उसके सुरों में उन्हीं की अभिव्यक्ति है, तो उसके साथ जो कुछ घट रहा है, वह केवल एक साधक के साथ घटने वाली घटना कैसे रह सकती है? अगर उसके भीतर शिव हैं और उसकी संगीत-साधना उन्हीं को समर्पित है, तो फिर उसकी साधना का अपमान उसका नहीं बल्कि खुद भगवान शिव का है? वह मानो अपने आराध्य से पूछ रहा है कि जब तुम मेरे भीतर रहते हो, तो मेरे साथ होने वाली पीड़ा से अलग कैसे रह सकते हो?
यहां शिकायत का तरीका विजय से बिल्कुल अलग है। पंडित शिवशंकर शास्त्री भगवान को व्यंग्य से चुनौती नहीं देता है, और ना ही अपने आक्रोश को किसी तीखे संवाद में बदलता है। उसका संगीत ही उसके मन की बात कहता है। वह भगवान की महिमा स्वीकार करते हुए उनसे जवाब चाहता है। उसकी विनम्रता को उसकी पीड़ा की कमजोरी नहीं समझा जा सकता है। दरअसल, उसके उलाहने की गहराई इसी विश्वास से पैदा होती है कि ईश्वर उसके भीतर मौजूद हैं। जब साधक अपने आराध्य को अपने अस्तित्व का हिस्सा मानता है, तो उसके साथ होने वाला अन्याय उसे अपने आराध्य की उपस्थिति पर भी सवाल करने के लिए विवश कर देता है।
यहीं ‘दीवार’ और ‘सुर संगम’ के दोनों दृश्य एक ही भाव को दो अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत करते हैं। विजय भगवान शिव से अपने जीवन और अपनी मां के दुख का हिसाब मांगता है, जबकि पंडित शिवशंकर शास्त्री उन्हें अपनी साधना और अपने अस्तित्व से जोड़कर सवाल करता है। एक का स्वर विद्रोह से भरा है, दूसरे का विनम्रताभरी आक्रमकता से। एक भगवान के सामने खड़े होकर अपनी नाराजगी सीधे शब्दों में जाहिर करता है, दूसरा सुरों के माध्यम से अपने आराध्य को अपनी पीड़ा का सहभागी बनाता है और उनसे सवाल करता है। फिर भी दोनों की शिकायत का मूल एक ही है, जब ईश्वर पर भरोसा है, तो जीवन में इतना दुख और अन्याय क्यों हैं?
इन दृश्यों की खासियत यह है कि वे शिकायत को आस्था का विरोध बनाकर नहीं दिखाते हैं। इसके उलट, शिकायत करने वाले दोनों नायक किसी न किसी रूप में भगवान से जुड़े हुए हैं। विजय अपनी मां की आस्था और उसे खो देने के भय के कारण मंदिर पहुंचता है, जबकि पंडित शिवशंकर शास्त्री का विश्वास है कि उसके अंदर स्वयं शिव का वास है। दोनों भगवान से इसलिए सवाल करते हैं, क्योंकि उनके लिए ईश्वर का महत्व बना हुआ है। यदि यह जुड़ाव न होता, तो न विजय को मंदिर में जाकर उलाहना देने की जरूरत पड़ती और न शिवशंकर शास्त्री अपने संगीत के माध्यम से भगवान को अपनी पीड़ा सुनाने की कोशिश करता।
आस्था का अर्थ हमेशा हर परिस्थिति को चुपचाप स्वीकार कर लेना नहीं होता है। कभी-कभी अपने आराध्य से शिकायत करना भी उसी संबंध की अभिव्यक्ति होता है, जिसमें मनुष्य उनसे अपने दुख को समझने और उसका उत्तर पाने की उम्मीद रखता है। ‘दीवार’ का विजय और ‘सुर संगम’ का पंडित शिवशंकर शास्त्री इसी मानवीय भाव के दो अलग-अलग चेहरे हैं। एक की आवाज में उलाहने से भरी गुस्सा है तो दूसरे की आवाज में गुस्सा से भरी करुणा, लेकिन दोनों के मन में एक ही उलझन है। भगवान उनके लिए केवल पूजने की वस्तु नहीं है, बल्कि ऐसे अपने हैं, जिनसे वे पूछ सकते हैं कि आखिर उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है।
शायद यही वजह है कि ये दोनों दृश्य आज भी दर्शकों के मन में विशिष्ट जगह बनाए हुए हैं। वे भगवान के सामने खड़े दो व्यक्तियों की एक कहानी भर नहीं हैं, बल्कि उस मनुष्य की व्यथा को व्यक्त करते हैं, जो दुख के क्षणों में अपने सबसे बड़े सहारे से ही जवाब मांगने लगता है। तरीके अलग हैं, लेकिन दोनों की पुकार में एक ही सवाल है कि "मेरे साथ ऐसा क्यों...?"

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