अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध हास्य लेखक मार्क ट्वेन को एक आम सभा में भाषण देने का निमंत्रण मिला। निश्चित तिथि को वह उस नगर में पहुंच गए।
जब वह शहर में पहुंचे तो उन्हें ऐसा लगा कि उक्त कार्यक्रम का शायद ठीक से प्रचार नहीं किया गया हैं क्योंकि नगर की दीवारों और रेलवे स्टेशन के आसपास पर्याप्त पोस्टर दिखाई नहीं पड़े। सो, उन्होंने यह जायजा लेने के लिए कि नागरिकों को कार्यक्रम की जानकारी है या नहीं, एक दुकान की ओर मुड़ गए। उन्होंने काउंटर पर पूछा, क्यों भाई, क्या आज शहर में कोई ऐसा मनोरंजक कार्यक्रम होने वाला है, जिससे कोई यात्री शाम का समय अच्छी तरह गुजार सके और अपनी थकान मिटा सके?
दुकानदार ने अजनबी को तसल्ली सी देते हुए कहा कि मेरा अनुमान है, आज शहर में कोई भाषण होने वाला है।
जवाब में ट्वेन बोले कि किस आधार पर तुम्हें ऐसा लग रहा है?
दुकानदार बोला, बात दरअसल यह है कि आज यहां दिनभर अंडों की खूब बिक्री हुई है और इतना कहकर वह अपने काम में मशगूल हो गया।
ट्वेन का एक यह किस्सा भी बहुत प्रसिद्ध है। एक बार उनके एक दूर बसे प्रशंसक ने उनके जन्मदिन पर उन्हें एक अभिनन्दन पत्र लिखा और अंत में उनके दीर्घायु होने की कामना व्यक्त की। लेकिन, अजीब बात यह थी कि उसे मार्क ट्वेन का तत्कालीन पता मालूम नहीं था। इसलिए, उसने पत्र को एक लिफाफे में डाला, उस पर टिकट लगाया और पते की जगह पर कुछ इस तरह लिख दिया- श्रीयुत मार्क ट्वेन, पता नहीं मालूम, ईश्वर करें, यह पत्र उन्हें मिल जाए। और, उसे डाक में डाल दिया।
कुछ दिनों के बाद उस प्रशंसक पाठक को मार्क ट्वेन का वापसी धन्यवाद पत्र मिला। उत्सुकता से उसने पत्र को खोला तो पत्र में सिर्फ इतना लिखा था- ईश्वर ने कृपा कर दी है। नीचे, मार्क ट्वेन के हस्ताक्षर मौजूद थे।






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