एक बार मार्टिन लूथर किंग किसी सार्वजनिक सभा में भाषण दे रहे थे कि तभी किसी प्रतिक्रियावादी श्रोता ने उन पर जूता दे मारा। जूता किंग के पास पहुंचा ही था कि सभा में खलबली मच गई। सभा के आयोजकों के चेहरों पर हवाईयां उड़ने लगीं मगर किंग अविचलित खड़े रहे।
किंग ने जूते को बड़े प्यार से उठाया और बड़ी मृदुता से बोले, धन्य है वह देश, जिसके वासी अपने खिदमतगारों का इतना ख्याल रखते हैं। पैदल चलने वाले मुझ तुच्छ सेवक के प्रति किन्हीं कृपालु सज्जन ने सचमुच बड़ी उदारता का परिचय दिया है, किन्तु खेद है कि यह जूता सिर्फ एक पांव का है।
थोड़ा रुककर वह बोले, कृपालु सज्जन से मेरा विनम्र आग्रह है कि वह दूसरा जूता भी मुझे देने की कृपा करें। ऐसा करके सचमुच वह मुझे उपकृत करेंगे।
लूथर किंग के मुंह से ऐसी बात सुनकर सभी स्तब्ध रह गए और फिर मार्टिन लूथर किंग के जयजयकार से आसमान गूंज उठा। लूथर किंग के मुख पर चिर-परिचित, सहज मुस्कान उभर आई।






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