मोदी की तीसरी पारी, बगल में बैसाखी या हाथों में लाठी...!


बीजेपी का दावा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले 10 सालों के दौरान लगातार देश व जनता के उत्थान के लिए कठिन परिश्रम किया, जिसके फलस्वरूप उसे यह आशा थी कि जनता उसके उम्मीदवारों को 400 सीटों पर विजयश्री दिलाने में पूर्ण सहयोग करेगी।

लेकिन, आशानुरूप समर्थन न मिलने के कारण पार्टी को महज 240 सीटों से ही संतोष करना पड़ा, जो कि बहुमत के आंकड़े 272 से काफी कम है। केन्द्र में सत्तासीन होने के लिए 272 का आंकड़ा आवश्यक है, परन्तु नई परिस्थितियों में भाजपा के लिए टीडीपी एवं जेडीयू से सहयोग लेना आवश्यक हो गया। इन दोनों दलों के बिना केन्द्र में सरकार बनाना सम्भव ही नहीं था। अब सवाल यह है कि मोदी के दोनों हाथों में सहारे के लिए यो दोनों दल दो लाठियां हैं या बगल में लगी बैसाखियां हैं।

दोनों ही सहयोगियों का चरित्र मोदी की बीजेपी के चरित्र से पूर्णतया भिन्न है। जहां एक ओर मोदी हिन्दुत्व का झंड़ा लिए हुए आगे बढ़ रहे थे, वहीं दूसरी ओर, नीतीश कुमार एवं चन्द्र बाबू नायडू दोनो ही सहयोगियों की छवि अभी तक मुस्लिम तुष्टिकरण में विश्वास रखने वाले नेताओं के रूप में रही है। इसी मुस्लिम तुष्टीकरण नीति के कारण नायडू सत्तासीन हो पाए हैं। उन्होंने मुस्लिमों को चार फीसदी आरक्षण तथा मस्जिदों के रखरखाव के लिए प्रतिमाह पांच हजार रुपये देने का वचन दिया हुआ है, जो कि मोदी की रणनीति से पूर्णतया भिन्न है।

दूसरे सहयोगी के रूप में बिहार के नीतीश कुमार हैं, जिनकी पिछली कार्यशैली के कारण उन पर कोई भी विश्वास नहीं कर पा रहा है। केन्द्र सरकार को अपने कंधे पर साधे रखने के बदले नीतीश कुमार की अनेक इच्छाएं हैं। बिहार को एक विशेष राज्य का दर्जा दिया जाना तथा समान नागरिक संहिता व अग्निवीर योजना की समीक्षा आदि विषयों पर उनका रुझान मोदी से सर्वथा विपरीत है। इसके अतिरिक्त, वह प्रधानमंत्री पद के अभिलाषी के रूप में भी नजर आते रहे हैं। अब चिंता की बात यह है कि केन्द्र में सरकार बनने के पश्चात इन तीनों केन्द्र बिन्दुओं की विचारधारा प्रमुख विषयों पर एकमत कैसे हो पाएगी।

चुनावों से पूर्व, मोदी ने पीओके को स्वतंत्र कराने का जो वचन दिया था, अब जनता उस वचन के पूर्ण होने की व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रही है। भारत का प्रत्येक नागरिक यह चाहता है कि किसी भी प्रकार से पाकिस्तान का दमन होकर पीओके शीघ्रातिशीघ्र भारत का एक अभिन्न अंग बन जाए।

इसके अलावा देश में बेरोजगारी, मंहगाई और व्यापारी वर्ग पर जीएसटी के भार का अधिक होना आदि अन्य समस्याएं भी हैं। पिछले लोकसभा चुनावों में व्यापारी वर्ग ने इस आशा से मोदी को उन्मुक्त हृदय से सहयोग दिया था कि वे जीसटी के प्रतिशत को अवश्य ही कम कर देंगे। यदि इस वर्ग की आशाओं के अनुरूप कार्य नहीं हुआ तो आगामी विधानसभा चुनावों में इसका असर पड़ना तय है।

अब मोदी के समक्ष उपरोक्त समस्त समस्याओं के समाधान व बैसाखियों को नियन्त्रण में रखने की चुनौती है। उन्हें अपने मुकुट की शोभा में बाधक समस्त कांटों को हटाना ही होगा, तभी उनका ताज फूलों की सुगंध से महक पाएगा।

(लेखक आईआईएमटी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं। यहां व्यक्त विचार उनके स्वयं के हैं।)



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