बहुत पुरानी बात है, जब मोबाइल नहीं, पर मुंह बहुत चला करते थे। आगरा में मुगल बादशाह के जागीरदार का एक गांव था टेढ़ी बगिया के पास, ‘ठुमकपुर’। वहां की सबसे नामी ठुमकिया थी, चंपा देवी झटकनिया। नाम ऐसा कि सुनते ही पायल खुद बज उठे, पर असलियत कुछ और ही थी।
चंपा देवी ने बचपन में सपना देखा था कि एक दिन वह दरबार में नाचेगी, और राजा बोलेगा, “वाह चंपा, तू तो कला की मूरत है!” पर हुआ उल्टा। जब वह पहली बार नाची, तो राजा बोले, “वाह चंपा, तू तो मूर्खता की मूरत है, क्योंकि नाच कम, चिल्लाहट ज़्यादा सुनाई दी!”
अब गांव वालों ने कहा कि “थोड़ा अभ्यास कर लो”, लेकिन चंपा देवी ने जवाब दिया, “अरे नाच तो मैं खूब जानती हूं, पर ये तुम्हारा आंगन ही टेढ़ा है! मिट्टी गीली है, फर्श फिसलन वाला है, हवा गलत दिशा से बह रही है, बदबू अलग आ रही है!”
ढोलची की हर बार जब ताल बिगड़ती, चंपा के कदम बहकते या घूंघट कहीं अटक या सरक जाता, तो चंपा देवी का जवाब वही होता, “नाच तो मैं नाचूंगी, पर यह आंगन सीधा कौन करेगा?”
अंत में गांव के पंचों और लोहार ने तंग आकर कहा, “हम आंगन सीधा नहीं करेंगे, कहावत बना देंगे!”
और उसी दिन पैदा हुई — “नाच न जाने, आंगन टेढ़ा!”
कहते हैं तब से लेकर आज तक, जो अपनी गलती मानने से कतराता है, वह ऑटोमेटिकली चंपा देवी का आध्यात्मिक शिष्य बन जाता है।

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