देशभर में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को कम करने में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। निर्णायक हस्तक्षेपों के ज़रिए नक्सल प्रभावित सबसे अधिक जिलों की संख्या 2014 में 36 से घटकर 2025 में केवल तीन रह गई है और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित कुल जिलों की संख्या 2025 तक 126 से घटकर मात्र 11 रह गई है।
नरेंद्र मोदी सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ एक एकीकृत, बहुआयामी और कठोर रणनीति अपनाई है, जो पिछली सरकारों के बिखरे हुए दृष्टिकोण की जगह कामयाब साबित हुई है। संवाद, सुरक्षा और समन्वय के स्पष्ट सिद्धांतों पर चलते हुए, सरकार ने अगले साल मार्च तक प्रत्येक नक्सल प्रभावित क्षेत्र को पूर्णतः नक्सलमुक्त बनाने का दृढ़ लक्ष्य निर्धारित किया है।
Read in English: India moves towards becoming Naxal-free from the 'Red Corridor'...
नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी आंदोलन से हुई और यह ‘लाल गलियारे’ में फैल गया। इससे छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, केरल, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कुछ हिस्से प्रभावित हुए। हालांकि, माओवादी हाशिए पर पड़ी जनजातियों की रक्षा करने का दावा करते हैं, लेकिन असल में वे हिंसा और जबरन वसूली पर निर्भर रहते हैं। भारत की बहुआयामी उग्रवाद विरोधी रणनीति ने हिंसा को काफी हद तक कम किया है, आंदोलन को कमजोर किया है और जिलों का पुनर्एकीकरण किया है।
इस साल अब तक 317 नक्सलियों को मार गिराया गया है, 862 को गिरफ्तार किया गया है और 1,973 ने आत्मसमर्पण किया है। अकेले साल 2024 में 290 नक्सलियों को मार गिराया गया था, 1,090 को गिरफ्तार किया गया और 881 ने आत्मसमर्पण किया। कुल 28 शीर्ष नक्सली नेताओं को मार गिराया गया है, जिनमें 2024 में एक केंद्रीय समिति सदस्य और 2025 में पांच केंद्रीय समिति सदस्य शामिल हैं। प्रमुख सफलताओं में ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट में 27 कट्टर नक्सलियों का मारा जाना, इस साल 23 मई को बीजापुर में 24 का आत्मसमर्पण और अक्टूबर में छत्तीसगढ़ के 197 और महाराष्ट्र के 61 सहित कुल 258 का आत्मसमर्पण शामिल है। इनमें आत्मसमर्पण करने वालों में 10 वरिष्ठ नक्सली शामिल हैं।
छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए गए ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट में 27 कुख्यात माओवादियों को मार गिराया गया। इनमें सीपीआई-माओवादी के महासचिव और शीर्ष नेता तथा नक्सल आंदोलन की रीढ़ माने जाने वाले नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजु भी शामिल थे। भारत में नक्सलवाद के खिलाफ तीन दशकों से चल रही लड़ाई में यह पहली बार है कि किसी महासचिव स्तर के नेता को भारतीय सुरक्षा बलों ने मार गिराया है।
नक्सलवाद से सबसे अधिक प्रभावित जिलों की संख्या 2014 में 36 थी, जबकि केंद्र सरकार के अधीन साल 2025 में केवल तीन ही जिले ही शेष रह गए हैं। नक्सल प्रभावित जिलों की कुल संख्या साल 2014 में 126 से घटकर 2025 में मात्र 11 रह गई है। किलेबंद पुलिस स्टेशनों की संख्या 2014 तक केवल 66 थी, जो पिछले 10 वर्षों में बढ़कर 586 हो गई है। नक्सली घटनाओं को दर्ज करने वाले पुलिस स्टेशनों की संख्या 2013 में 76 जिलों में फैले 330 से घटकर जून 2025 तक केवल 22 जिलों में 52 रह गई है। इसके अलावा, पिछले छह वर्षों में 361 नए सुरक्षा शिविर स्थापित किए गए हैं और परिचालन पहुंच को मजबूत करने के लिए 68 रात्रिकालीन हेलीपैड बनाए गए हैं।
केंद्र सरकार ने एनआईए में एक समर्पित विभाग बनाकर नक्सलियों के वित्तपोषण पर प्रभावी ढंग से लगाम लगा दी है। इस विभाग ने 40 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जब्त की है, जबकि राज्यों ने भी 40 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जब्त की है और प्रवर्तन निदेशालय ने 12 करोड़ रुपये कुर्क किए हैं। इस एक साथ की गई कार्रवाई से शहरी नक्सलियों को गंभीर नैतिक और मनोवैज्ञानिक क्षति पहुंची है और उनके सूचना युद्ध नेटवर्क पर नियंत्रण और भी कड़ा हो गया है।
केंद्र सरकार ने प्रमुख सुरक्षा एवं ढ़ांचागत योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता और लक्षित सहायता बढ़ाकर वामपंथी उग्रवाद प्रभावित राज्यों की क्षमता को मजबूत किया है। पिछले 11 वर्षों में सुरक्षा संबंधी व्यय योजना के तहत वामपंथी उग्रवाद प्रभावित राज्यों को 3,331 करोड़ रुपये जारी किए, जो पिछले 10 वर्ष में जारी की गई धनराशि में 155 फीसदी की वृद्धि दर्शाता है।
विशेष ढ़ांचागत योजना के तहत, केंद्र सरकार ने राज्य विशेष बलों और विशेष खुफिया शाखाओं को मजबूत करने के लिए 371 करोड़ रुपये और मूल चरण में 246 किलेबंद पुलिस स्टेशनों के लिए 620 करोड़ रुपये स्वीकृत किए। योजना को 2026 तक बढ़ाया गया और विस्तारित अवधि में, एसएफ, एसआईबी और जिला पुलिस को और मजबूत करने के लिए 610 करोड़ रुपये और 56 अतिरिक्त एफपीएस के लिए 140 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। पिछले आठ वर्षों में 1,757 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई और अब तक केंद्र सरकार द्वारा 445 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं।
वर्ष 2014 से अब तक कुल 586 किलेबंद पुलिस स्टेशन निर्मित किए गए हैं तथा विशेष केंद्रीय सहायता योजना के अंतर्गत 3,817.59 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए गए हैं। केंद्रीय एजेंसियों को सहायता योजना के तहत पिछले 10 वर्ष में शिविरों के बुनियादी ढांचे के लिए 125.53 करोड़ रुपये और अस्पतालों के उन्नयन व स्थापना के लिए 12.56 करोड़ रुपये जारी किए गए।
भारत सरकार ने वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क और मोबाइल कनेक्टिविटी का विस्तार करके बुनियादी ढांचे को काफी मजबूत किया है, जिससे पहुंच, सुरक्षा प्रतिक्रिया और सामाजिक-आर्थिक एकीकरण में सुधार हुआ है।
मई 2014 से अगस्त 2025 तक, केंद्र सरकार ने वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में 12 हजार किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया है, जबकि कुल 17,589 किलोमीटर की परियोजनाओं को 20,815 करोड़ रुपये की लागत से स्वीकृत किया गया है। इससे दुर्गम क्षेत्रों में हर मौसम में संपर्क और आवागमन सुनिश्चित हो सकेगा।
पहले चरण में 4,080 करोड़ रुपये की लागत से 2,343 (2जी) मोबाइल टावर लगाए गए। दूसरे चरण में 2,210 करोड़ रुपये के निवेश से 2,542 टावरों को मंजूरी दी गई। इनमें से 1,154 टावर पहले ही लगाए जा चुके हैं। इसके अलावा, आकांक्षी जिलों और 4जी सेचुरेशन योजनाओं के तहत 8,527 (4जी) टावरों को मंजूरी दी गई है। इनमें से क्रमशः 2,596 और 2,761 टावर अब चालू हैं। इससे नक्सल प्रभावित प्रमुख क्षेत्रों में संचार और खुफिया जानकारी की पहुंच में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
केंद्र सरकार ने नक्सल प्रभावित जिलों में 1,804 बैंक शाखाएं, 1,321 एटीएम और 37,850 बैंकिंग संवाददाता स्थापित करके व्यापक वित्तीय समावेशन सुनिश्चित किया है। इसके अलावा, 90 जिलों में 5,899 डाकघर खोले गए, जिनकी कवरेज हर पांच किलोमीटर पर है। इससे नक्सली प्रभाव वाले दूरस्थ समुदायों में बैंकिंग, डाक और धन प्रेषण सेवाएं सीधे पहुंच सकेंगी।
केंद्र सरकार ने नक्सल प्रभावित 48 जिलों में कौशल विकास पहल शुरू की है। इसके तहत 495 करोड़ रुपये के निवेश से 48 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों को मंजूरी दी गई है और 61 कौशल विकास केंद्रों को अनुमोदित किया गया है। इनमें से 46 आईटीआई और 49 एसडीसी पहले से ही कार्यरत हैं, जो स्थानीय युवाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर प्रदान कर रहे हैं। इससे नक्सली भर्ती में कमी आ रही है और दूरस्थ समुदायों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था में एकीकृत किया जा रहा है।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने नक्सल-विरोधी एक समर्पित विभाग की स्थापना की है। इसने 108 मामलों की जांच की और 87 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए, जिससे त्वरित अभियोजन के ज़रिए माओवादी संगठनात्मक संरचना को काफी कमजोर कर दिया गया। साथ ही, 2018 में केंद्र सरकार ने 1,143 रंगरूटों से युक्त बस्तरिया बटालियन का गठन किया। इसमें छत्तीसगढ़ के सबसे अधिक प्रभावित जिलों बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा के 400 स्थानीय युवा भी शामिल थे। इससे नक्सलवाद के पूर्व गढ़ों को उग्रवाद से लड़ने वाले प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मियों के स्रोत में बदल दिया गया।
सुरक्षा बलों ने ऑक्टोपस, डबल बुल और चकबंधा जैसे निर्णायक अभियानों के ज़रिए तीन दशकों के माओवादी नियंत्रण के बाद बुद्धा पहाड़, पारसनाथ, बारामासिया और बिहार के चक्रबंधा सहित नक्सलियों के लंबे समय से कब्जे वाले गढ़ों को मुक्त कराया, सुदूर जंगलों में स्थायी शिविर स्थापित किए और अब तक अभेद्य रहे छत्तीसगढ़ के अबूझमद क्षेत्र तक पहुंच बनाई। इन निरंतर अभियानों ने पीएलजीए बटालियन को बीजापुर-सुकमा में अपने मुख्य क्षेत्र को छोड़ने के लिए मजबूर किया और नक्सलियों के 2024 सामरिक जवाबी आक्रमण अभियान की पूर्ण विफलता का कारण बना। इससे उनके रणनीतिक गढ़ और परिचालन प्रभुत्व का पतन हुआ।
केंद्र सरकार की आत्मसमर्पण-सह-पुनर्वास नीति ने आकर्षक प्रोत्साहन और सुनिश्चित आजीविका प्रदान करके नक्सली कार्यकर्ताओं के पतन को रफ्तार दी है। उच्च श्रेणी के वामपंथी उग्रवादी कार्यकर्ताओं को पांच लाख रुपये, मध्यम व निम्न श्रेणी के कार्यकर्ताओं को 2.5 लाख रुपये और सभी आत्मसमर्पणकर्ताओं को 36 महीने के व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए 10 हजार रुपये मासिक वजीफा मिलता है।
नतीजतन, इस वर्ष अकेले 521 वामपंथी उग्रवादी कार्यकर्ताओं ने आत्मसमर्पण किया और नई राज्य सरकार के सत्ता में आने के बाद यह संख्या बढ़कर 1,053 हो गई है। नई सरकार ने सैकड़ों पूर्व उग्रवादियों को रोजगार और सुरक्षा की गारंटी देकर मुख्यधारा में सफलतापूर्वक शामिल किया है।
कुल मिलाकर, वर्तमान मोदी सरकार की समन्वित, बहुआयामी रणनीति ने वामपंथी उग्रवाद को मात्र 11 जिलों तक सीमित कर दिया है। इनमें से केवल तीन ही ‘सबसे अधिक प्रभावित’ बचे हैं। हिंसा में 70 फीसदी से अधिक की कमी आई है। नागरिक और सुरक्षा बलों में हताहतों की संख्या में भारी गिरावट आई है। शीर्ष माओवादी नेतृत्व को योजनागत रूप से निष्क्रिय कर दिया गया है और हजारों कार्यकर्ताओं ने हथियारों के साथ संघर्ष करने के बजाय मुख्यधारा के जीवन को चुना है।
हालांकि, प्रतिरोध के कुछ क्षेत्र अभी भी बाकी हैं और पूर्ण उन्मूलन के लिए अगले साल 31 मार्च की घोषित समय सीमा तक निरंतर सतर्कता की ज़रूरत है, लेकिन एक बात साफ है कि नक्सली विद्रोह की वैचारिक और क्षेत्रीय रीढ़ अब टूट चुकी है। इससे उन क्षेत्रों में स्थायी शांति और विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ है, जो लंबे समय से इनसे वंचित रहे हैं।






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