लोकतांत्रिक देशों में निष्पक्ष पत्रकारिता की है बड़ी जरूरत


लोकतांत्रिक देशों में पत्रकारिता एक महत्वपूर्ण स्तम्भ स्वरूप होती है। इसके दर्पण में सभी की छवि निष्पक्ष रूप से प्रतिबिम्बित होनी चाहिए। पत्रकारिता एक ऐसा वटवृक्ष है जिसके सानिध्य में लोकतंत्र पल्लवित व पुष्पित होता है और यही स्तम्भ देश की दिशा व दशा को निर्धारित करने में एक बड़ी भूमिका निभाता है।

जिस देश में पत्रकारिता निष्पक्ष व सशक्त होती है, उस देश का भविष्य उज्ज्वल होता है। इसके विपरीत, जब पत्रकारिता किसी एक या दूसरे पक्ष की ओर झुकना शुरू कर दे तो देश के लोकतंत्र का गर्त में जाना तय हो जाता है।   

स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व पत्रकारिता ने जनता में देशभक्ति के लिए अत्यधिक जोश, उल्लास व प्रेरणा प्रदान करने का कार्य किया। उस समय की पत्रकारिता इतनी सशक्त थी कि उसने देशभक्तों को अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए प्रेरित किया। देश को साल 1947 में ही आजादी दिला देने में मीडिया की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। कल्पना करिए, यदि उस समय की पत्रकारिता निष्पक्ष व सशक्त नहीं होती तो आज देश की जनता का भविष्य कितना अंधकारमय होता। महात्मा गांधी की वैचारिक श्रृंखला के अन्तर्गत उनके द्वारा सृजित - नवजीवन 1919, यंग इंडिया 1919, द इंडियन ओपिनियन 1903 - तीनों पत्रों ने स्वतंत्रता आन्दोलन में अहम भूमिका निभाई।

इसी प्रकार. ‘वंदे मातरम्’, ‘अमृत बाजार पत्रिका’, ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘प्रतिनिधि‘ व ‘आज‘ जैसे अखबारों ने उस समय अंग्रेजों की दमनकारी नीति के बावजूद निर्भीकता से अपने ज्वलंत विचारों को भारत की जनता के समक्ष प्रस्तुत किया और स्वतंत्रता की लौ को प्रज्ज्वलित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन प्रेरक समाचार पत्रों को प्राप्त करने के लिए जनता लालायित रहती थी तथा युवा इनकी प्रतियों का वितरण अंग्रेजो से छिपकर करते थे। इसके अतिरिक्त, कुछ बहादुर, निर्धन पत्रकार ऐसे भी थे, जो हस्तलिखित अथवा टाइपराइटर से अंकन करके जनता को अंग्रेजो के अत्याचारों के विषय में तथा भारत मां की रक्षा के लिए प्रोत्साहित करते थे।

आज स्वतंत्रता प्राप्ति के 75 वर्षों के पश्चात जनता में जहां समाचार पत्रों तथा दूरदर्शन के प्रति रुझान बढ़ना चाहिए, वहां टीवी चैनलों की टीआरपी निरन्तर कम होती जा रही है और जनता का विश्वास इन संचार माध्यमों पर कम होता जा रहा है। इन परम्परागत माध्यमों की अपेक्षा जनता का आकर्षण और विश्वास, यूट्यूब तथा फेसबुक चैनलों की ओर होता जा रहा है और उनकी लोकप्रियता सतत रूप से बढ़ती जा रही है। टीवी चैनलों एवं समाचार पत्रों की स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि आज जनता ने इनको देखना तथा पढ़ना तक बंद कर दिया है।

समाचार पत्र एवं टीवी चैनल सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर हो चुके हैं। यदि उन्हें ये सरकारी विज्ञापन मिलने भी बंद हो जाए तो इनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। इन संचार माध्यमों की विश्वसनीयता तथा प्रतिष्ठा का क्षय न केवल भारत अपितु विश्व में एक चिन्ता का विषय बनता जा रहा है। पत्रकारिता से जुड़े महानुभावों को इस विषय पर गहन चिंतन करने की आवश्यकता है, जिससे ये जनता के पूर्ववत् विश्वास को फिर से प्राप्त कर सकें।

भारत एक श्रेष्ठ संस्कृतियुक्त देश है जो सम्पूर्ण विश्व के समक्ष एक आदर्श स्वरूप है। एक निष्पक्ष, ईमानदार व स्वतंत्र पत्रकारिता ही भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों को अक्षुण्ण बनाए रखने में सक्षम हो सकती है।

(लेखक आईआईएमटी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं)



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