सुदृढ़ भारत के लिए किसान अपना रहे हैं पुनर्योजी कृषि

भारत के खेतों ने कृषि विकास को निरंतर जारी रखा है, लेकिन दीर्घकालिक उत्पादकता स्वस्थ मृदा और सुदृढ़ इकोसिस्टम पर निर्भर करती है। ‘पुनर्योजी कृषि’ मृदा की जीवन-शक्ति को बहाल करने, जैव-विविधता को बेहतर बनाने और जलवायु संबंधी दबावों से निपटने की क्षमता को मजबूत करने का एक रास्ता प्रदान करती है।

देशभर में किसान प्राकृतिक खेती, कृषि-वानिकी, सूक्ष्म सिंचाई, एकीकृत कृषि प्रणालियों और वैज्ञानिक मृदा प्रबंधन जैसे तरीकों को अपना रहे हैं। मार्च माह तक, प्राकृतिक खेती वाले क्लस्टर 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए थे और इनमें 18.19 लाख किसान शामिल थे।

भारत की कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों ने ठोस एवं निरंतर प्रगति अर्जित की है। वित्त वर्ष 2016 से लेकर  वित्त वर्ष 2025 के दौरान, इसने 4.45 प्रतिशत की दशकीय वृद्धि दर्ज की। यह वृद्धि दर पिछले दशकों में सबसे अधिक थी। यह उपलब्धि इस क्षेत्र की मजबूती और देशभर के किसानों के निरंतर प्रयासों को दर्शाती है। फिर भी, इस गति को बनाए रखने हेतु उन पर्यावरणीय आधारों को मजबूत करना जरूरी है जो दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता को सहारा प्रदान करते हैं।

हर मौसम में, किसान नई उम्मीद और बढ़ी हुई जिम्मेदारी के साथ अपने खेतों में लौटते हैं। वर्षों की सघन खेती, रसायनों के अत्यधिक उपयोग और अनियमित बारिश के कारण कई प्रकार की मिट्टी की उपजाऊ क्षमता घट जाती है और वे कम असरदार रह जाती हैं। जो उपज पहले आसानी से मिल जाती थी, उसके लिए अब अधिक इनपुट की जरूरत होती है। वहीं लू, सूखे के दौर या अत्यधिक बारिश महीनों की मेहनत पर पानी फेर सकती है। लाखों छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए, मिट्टी की गिरती सेहत का मतलब अक्सर उच्च लागत और अनिश्चित फसल होता है। नतीजतन, खेती की स्थिरता एक बहुत ही महत्वपूर्ण चिंता का विषय बन गई है।

यहीं आकर पुनर्योजी कृषि प्रासंगिक बन जाती है। मिट्टी की जीवन-शक्ति को फिर से बढ़ाकर, इकोसिस्टम के कामकाज को सुदृढ़ करके और जलवायु परिवर्तनशीलता का सामना करने की क्षमता में सुधार करके, यह मिट्टी और उत्पादकता, दोनों से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करती है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पद्धति भारत की कृषि के आधार को पुनर्जीवित करने का रास्ता दिखाती है। साथ ही, पर्यावरण के दीर्घकालिक संतुलन बनाए रखने और किसानों की समृद्धि सुनिश्चित करने में भी सहायता करती है।

पुनर्योजी कृषि खेती का एक ऐसा समग्र तरीका है, जो मृदा की सेहत को बेहतर बनाने और जैव-विविधता को बढ़ाने पर केन्द्रित है। साथ ही, इसका उद्देश्य खेती की पद्धति में दीर्घकालिक उत्पादकता एवं सुदृढ़ता सुनिश्चित करना है। स्वस्थ मृदा से अपेक्षाकृत अधिक भोजन और पोषण मिलता है, अधिक कार्बन का भंडारण होता है और जैव-विविधता को बढ़ावा मिलता है। मौजूदा स्थितियों को बनाए रखने को अपना मुख्य उद्देश्य मानने वाली सतत कृषि के उलट, पुनर्योजी कृषि का उद्देश्य स्थितियों को बेहतर बनाना होता है। मृदा की सेहत को सक्रिय रूप से बेहतर बनाकर, जैव-विविधता को बढ़ाकर और इकोसिस्टम की सुदृढ़ता को मजबूत करके, यह पद्धति एक कदम और आगे जाती है।

यह मिट्टी के साथ कम से कम छेड़छाड़, बारहमासी फसलों की सजीव जड़ों की सुरक्षा, मिट्टी पर आवरण बनाए रखना, पशुधन को शामिल करना, रासायनिक इनपुट के उपयोग को सीमित करना, जैव-विविधता को बढ़ाना जैसे सिद्धांतों पर आधारित है।

संक्षेप में, पुनर्योजी कृषि खेती के प्राकृतिक आधार को बहाल करके खेती के भविष्य हेतु एक व्यावहारिक और भविष्योन्मुखी रास्ता प्रदान करती है। पुनर्योजी कृषि भारत में अपनाई जाने वाली खेती की विविध पद्धतियों पर आधारित है। पुनर्योजी तरीकों का दायरा बहुत बड़ा है।

ड्रिपर, स्प्रिंकलर और फॉगर जैसी सूक्ष्म-सिंचाई प्रणालियां सीधे पौधों की जड़ों तक पानी पहुंचाती हैं। इससे पानी की बर्बादी कम होती है और पानी के उपयोग की क्षमता बेहतर होती है। खेत के स्तर पर जल प्रबंधन को बेहतर बनाकर, ये प्रणालियां फसल की पैदावार बढ़ाती हैं और सूखे व पानी की कमी से निपटने की क्षमता को मजबूत करती हैं। परिणामस्वरूप, खेती की प्रणालियां जलवायु की दृष्टि से अधिक सुदृढ़ और आर्थिक रूप से व्यावहारिक बन जाती हैं।

खेती के मशीनीकरण के तहत खेती-बाड़ी के विभिन्न कार्यों को आसान एवं स्वचालित बनाने के लिए खेती की मशीनों व उपकरणों का उपयोग किया जाता है। यह पानी, ईंधन और उर्वरक जैसे जरूरी साधनों के उपयोग को बेहतर बनाने में मदद करता है, जिससे बर्बादी कम होती है और कार्बन उत्सर्जन भी घटता है। खेती-बाड़ी के कार्यों को समय पर और सही ढंग से करने में मदद करके, मशीनीकरण संसाधनों के प्रबंधन को बेहतर बनाता है, उत्पादकता को बढ़ाता है और खेती से पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को कम करने में मदद करता है।

नाइट्रोजन उर्वरक प्रबंधन नाइट्रस ऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करने के साथ-साथ फसल की उत्पादकता बढ़ाने में मदद करता है। यह सही उर्वरक को चुनने और उसके उपयोग के उपयुक्त समय एवं मात्रा को बेहतर बनाने पर ध्यान केन्द्रित करता है। अन्य तरीकों में अत्यधिक दानेदार यूरिया को गहराई में डालना और नाइट्रोजन की स्थिति का सटीक आकलन करने के लिए पत्तियों के रंग वाले चार्ट का उपयोग करना शामिल है। यह तरीका साइनोबैक्टीरिया और लेग्यूम इंटरक्रॉपिंग जैसे जैविक इनपुट को भी बढ़ावा देता है। कुल मिलाकर, ये उपाय नाइट्रोजन के उपयोग संबंधी दक्षता को बेहतर बनाते हैं और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करते हैं।

प्राकृतिक खेती, भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों पर आधारित एक रसायन-मुक्त कृषि पद्धति है। यह पद्धति बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र और दशपर्णी जैसे खेत में ही तैयार किए जाने वाले जैविक इनपुट पर निर्भर करती है। इन्हें देसी पशुओं से मिलने वाली चीजों का उपयोग करके बनाया जाता है। यह पारंपरिक किस्म के बीजों के उपयोग और खेतों की मेड़ों पर पेड़ लगाने को भी बढ़ावा देता है।

कीट प्रबंधन स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए तथा खेत पर ही बनाए जाने वाले वनस्पति-आधारित मिश्रणों के जरिए किया जाता है। मिट्टी की उपजाऊ क्षमता और इकोलॉजिकल संतुलन बनाए रखने के लिए किसानों को निरंतर आवरण फसल उगाने, बहु-फसली खेती करने, मल्चिंग और मिट्टी को कम से कम छेड़ने के तरीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। विविध फसल प्रणालियों के साथ पशुधन को जोड़ने से मिट्टी की सेहत बेहतर होती है, इकोसिस्टम बहाल होता है और किसानों के लिए इनपुट लागत कम होती है।

पुनर्योजी कृषि में हरी खाद के उपयोग, कवर क्रॉपिंग और मल्चिंग जैसे मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन पद्धतियों की अहम भूमिका होती है। ग्रीन मैन्यूरिंग की प्रक्रिया में मिट्टी में जैव पदार्थ एवं पोषक तत्वों का समावेश करने हेतु विशेष प्रकार की फसलें उगाई और उनमें मिलाई जाती हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता, संरचना और कार्बन सोखने की क्षमता को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।

कवर क्रॉपिंग का मतलब फसलों को काटने के बजाय मुख्य रूप से मिट्टी को ढकने के लिए उगाना है। यह अपरदन से बचाता है, मिट्टी में जैव कार्बन बनाए रखता है और पोषक तत्वों के चक्र में मदद करता है। मल्चिंग में मिट्टी की सतह को पत्तियों, पुआल आदि जैसे जैविक अवशेषों से ढका जाता है। यह नमी बनाए रखने और मिट्टी के तापमान को नियंत्रित करने में मदद करता है। मल्चिंग खरपतवार को भी रोकती है, लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों को बढ़ावा देती है और फसल की उत्पादकता बढ़ाती है।

एकीकृत कृषि प्रणाली खेती का एक ऐसा समग्र तरीका है जो विभिन्न प्रकार के कृषि कार्यों को एक ही प्रणाली में जोड़ता है। इसमें फसलें, पशुपालन, मत्स्यपालन और बागवानी, कृषि-वानिकी व मधुमक्खी पालन जैसी सहायक गतिविधियां शामिल होती हैं। यह तरीका अंतर-फसल खेती, फसल चक्र, बहु-फसली खेती और मिश्रित खेती जैसी पद्धतियों को बढ़ावा देता है, जिनसे संसाधनों का अधिकतम उपयोग संभव होता है। इससे फसल खराब होने का जोखिम भी कम होता है, आजीविका के अवसरों में विविधता आती है और बाढ़ व सूखे जैसी चरम मौसमी स्थितियों से निपटने की क्षमता बेहतर होती है।

कृषि वानिकी में बारहमासी वृक्ष प्रणालियों को फल एवं बागानी फसलों के साथ एकीकृत किया जाता है ताकि अधिक टिकाऊ और लाभदायक कृषि प्रणाली का निर्माण हो सके। यह किसानों को अतिरिक्त आय अर्जित करने में मदद करने के साथ-साथ मिट्टी की नमी को बेहतर करता है, स्थानीय तापमान को नियंत्रित करता है और अधिक कार्बन को संग्रहित करता है।

वर्षा आधारित क्षेत्रों में, कृषि वानिकी बंजर भूमि के पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ये प्रणालियां अप्रत्याशित वर्षा के प्रभावों को कम करने, कृषि क्षमता बढ़ाने और समय के साथ ग्रीनहाउस गैसों को उत्सर्जन को घटाने में सहायक होती हैं।

जलवायु-अनुकूल कृषि में बदलती जलवायु के अनुरूप कृषि प्रणालियों को मजबूत बनाने के लिए कई प्रकार तरह की रणनीतियां एवं तकनीकें शामिल हैं। इनमें पोषक तत्वों एवं उर्वरकों का संतुलित उपयोग, कीटों का कारगर प्रबंधन, पानी का कुशल एवं समझदारी भरा उपयोग, खेत के स्तर पर मिट्टी की नमी का संरक्षण, और मृदा की सेहत को सुरक्षित रखने और फसलों की पैदावार को बढ़ाने वाले जमीन तैयार करने के सही तरीके शामिल हैं।

इसके अलावा, सीआरए में जल साझा करने वाले समूह, बीज एवं चारे की व्यवस्था, सामुदायिक नर्सरी और सामूहिक विपणन तंत्र जैसी नई बातें शामिल हैं। ये सभी तरीके और नई पहल मिलकर कृषि प्रणालियों को मजबूत बनाते हैं, जिससे वे जलवायु संबंधी कठिनाइयों एवं झटकों से बेहतर ढंग से निपट पाते हैं।

पुनर्योजी कृषि विभिन्न प्रकार के पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक लाभ प्रदान करती है। इससे स्वस्थ इकोसिस्टम और सुदृढ़ खेती, दोनों को ही बढ़ावा मिलता है। पुनर्योजी पद्धतियां मृदा में जैव पदार्थों का पुनर्निर्माण करती हैं, मृदा की संरचना को बेहतर करती हैं और दीर्घकालिक मृदा उर्वरता को बढ़ाती हैं, जिससे स्थिर कृषि उत्पादकता को बढ़ावा मिलता है।

पुनर्योजी पद्धतियां परागणकों, लाभकारी कीटों और मृदा सूक्ष्मजीवों सहित विभिन्न प्रजातियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां सृजित करती हैं। इससे समग्र इकोसिस्टम के संतुलन को मजबूत करने में मदद मिलती है। ये प्रणालियां उत्सर्जित कार्बन की तुलना में अधिक कार्बन अवशोषित और संग्रहित करती हैं, जिससे कृषि संबंधी उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलती है।

स्वस्थ मृदा जल धारण क्षमता को बढ़ाती है और अपवाह को कम करती है। इससे मृदा अपरदन और नदियों एवं झीलों में तलछट एवं प्रदूषकों के प्रवाह को सीमित किया जा सकता है, जिससे जल निकायों की रक्षा में मदद मिलती है। स्वस्थ मृदा से सिंथेटिक उर्वरकों, कीटनाशकों और सिंचाई पर निर्भरता कम होती है। इससे खेती की लागत घटती है, पैदावार स्थिर रहती है और किसानों की शुद्ध आय बढ़ती है।

पुनर्योजी कृषि से खेती, परामर्श सेवाओं, तकनीक और इकोलॉजिकल प्रबंधन के क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित होते हैं। पुनर्योजी पद्धियों को अपनाने वाले किसान जलवायु में होने वाले बदलावों और बाजार के उतार-चढ़ावों से बेहतर ढंग से निपट पाते हैं।

कुल मिलाकर, पुनर्योजी कृषि धीरे-धीरे भारतीय कृषि के भविष्य को नया आकार दे रही है। यह मिट्टी के स्वास्थ्य को बहाल करने के साथ-साथ सुदृढ़ता और संसाधन संबंधी दक्षता को बेहतर बना रही है। प्राकृतिक खेती, कृषि वानिकी, सूक्ष्म सिंचाई और एकीकृत खेती जैसी पद्धतियां संसाधन की दृष्टि से कुशल कृषि प्रणालियों में योगदान दे रही हैं। जैसे-जैसे अधिक संख्या में किसान पुनर्योजी कृषि पद्धतियों को अपनाएंगे, कृषि पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ और आर्थिक रूप से लाभदायक बन सकेगी। यह यात्रा स्वस्थ मिट्टी से शुरू होती है और अधिक सुदृढ़ खेतों एवं सुरक्षित आजीविका की ओर ले जाती है।



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