समावेशिता, विश्वसनीयता और राष्ट्रीय एकता के लिए प्रतिबद्ध है रेडियो


रेडियो का अपना एक अनोखा आकर्षण रहा है। यह अंतरंग होते हुए भी व्यापक और सरल होते हुए भी अत्यंत शक्तिशाली हैं। यह बिना किसी आडंबर के हमारे दैनिक जीवन में सहज रूप से घुलमिल जाता है। यह बहुत कम अपेक्षा करता है, बस थोड़ा-सा साथ और बदले में जानकारी, संवेदना तथा अपनत्व का अहसास देता है।

स्क्रीन युग के आगमन से बहुत पहले रेडियो ही वह भरोसेमंद आवाज थी, जो दूर-दराज के इलाकों, विविध भाषाओं और अनगिनत जिंदगियों को एक अदृश्य धागे में पिरोता था। सामूहिक श्रवण के माध्यम से यह लोगों को न केवल जोड़ता था, बल्कि उन्हें एक साझा अनुभव का हिस्सा भी बनाता था। इतिहास के अनेक निर्णायक क्षण रेडियो की घोषणाओं के माध्यम से हमारी सामूहिक स्मृति में अंकित हैं। भला कोई 14–15 अगस्त 1947 की उस ऐतिहासिक रात को कैसे भूल सकता है, जब रेडियो तरंगों पर भारत की स्वतंत्रता की घोषणा गूंज उठी थी। उस एक प्रसारण ने केवल समाचार नहीं सुनाया, बल्कि उसने एक विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र को स्वतंत्रता की एक साझा ध्वनि में एकजुट कर दिया।

अंग्रेजी में पढ़ें : Radio still committed to inclusivity, credibility and national integration

ऑल इंडिया रेडियो, जिसे लोकप्रिय रूप से ‘आकाशवाणी’ के नाम से जाना जाता है, भारत के राष्ट्रीय प्रसारक प्रसार भारती का रेडियो विभाग है और स्थापना से ही "बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय" के आदर्श वाक्य के साथ राष्ट्र की सेवा कर रहा है। 1936 में स्थापित और स्वतंत्रता के बाद सार्वजनिक स्वामित्व में लाया गया एआईआर, प्रसारित भाषाओं की संख्या तथा श्रोताओं की विविधता के मामले में विश्व के सबसे बड़े प्रसारण संगठनों में से एक बन गया है।

आकाशवाणी सेवा देशभर में फैले 591 प्रसारण केंद्रों के माध्यम से संचालित होती है, जो भारत के लगभग 92 फीसदी भौगोलिक क्षेत्र और 99.19 फीसदी जनसंख्या को आच्छादित करती है। स्थलीय प्रसारण के जरिए यह 23 भाषाओं और 182 बोलियों में कार्यक्रम प्रस्तुत करती है, जो भारत की व्यापक सामाजिक-आर्थिक व सांस्कृतिक विविधता का सजीव प्रतिबिंब है। मीडियम वेव, शॉर्ट वेव, एफएम तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से आकाशवाणी महानगरों के साथ-साथ दूरदराज, ग्रामीण और सीमावर्ती क्षेत्रों तक प्रभावी रूप से पहुंच बनाती है।

इसके कार्यक्रमों में समाचार, समसामयिक विषय, कृषि परामर्श, शैक्षिक सामग्री, स्वास्थ्य जागरूकता, युवा कार्यक्रम, शास्त्रीय एवं लोक संगीत तथा विविध सांस्कृतिक प्रस्तुतियां शामिल हैं। आपात स्थितियों व प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी आकाशवाणी ने समयबद्ध चेतावनियां और प्रमाणित जानकारी उपलब्ध कराकर अपनी विश्वसनीयता तथा जनसेवा की प्रतिबद्धता को निरंतर सिद्ध किया है।

मीडिया परिदृश्य में हो रहे बदलावों के साथ, ऑल इंडिया रेडियो समावेशिता, विश्वसनीयता और राष्ट्रीय एकता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को बनाए रखते हुए निरंतर रूपांतरित व विस्तारित हो रहा है, जो विश्व रेडियो दिवस की चिरस्थायी भावना को दर्शाता है।

कोविड-19 महामारी के दौरान यह स्पष्ट रूप से देखा गया, जब ग्रामीण बिहार, झारखंड तथा मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में स्कूल बंद थे और डिजिटल पहुंच सीमित थी, तब विधयर्थियों ने अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए ऑल इंडिया रेडियो के शैक्षिक प्रसारणों पर भरोसा किया। जिन क्षेत्रों में स्मार्टफोन और स्थिर इंटरनेट की कमी थी, वहां रेडियो ने चुपचाप शिक्षा की निरंतरता सुनिश्चित की। इसी तरह, ओडिशा और तमिलनाडु के आपदा-ग्रस्त तटीय क्षेत्रों में, मछुआरे समुद्र में जाने से पहले नियमित रूप से एआईआर के मौसम बुलेटिन पर निर्भर रहते हैं।

साल 2019 के ‘फानी’ जैसे भीषण चक्रवातों के दौरान, समय पर रेडियो अलर्ट ने कई लोगों को सुरक्षित रूप से तट पर लौटने में सक्षम बनाया, जिससे मोबाइल नेटवर्क के विफल होने पर एक विश्वसनीय आपातकालीन संचार उपकरण के रूप में रेडियो की भूमिका की पुष्टि हुई।

निजी एफएम रेडियो शहरी और क्षेत्रीय भारत में स्थानीय मनोरंजन और सूचना प्रदान करते हुए सार्वजनिक प्रसारण का पूरक है। अगस्त 2024 में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 234 पहले से अछूते शहरों और कस्बों में 730 नए एफएम चैनलों के विस्तार को ₹784.87 करोड़ के आरक्षित मूल्य के साथ स्वीकृति दी, जो क्षेत्रीय सामग्री के विस्तार और नए रोजगार अवसरों के सृजन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह विस्तार निजी एफएम रेडियो की भूमिका को और सुदृढ़ करता है, जो शहरी और क्षेत्रीय भारत में स्थानीय मनोरंजन, समाचार और जानकारी उपलब्ध कराते हुए सार्वजनिक प्रसारण को मजबूती देता है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अनुसार, एफएम फेज-III नीति के अंतर्गत वर्तमान में 119 शहरों में 391 निजी एफएम चैनल संचालित हो रहे हैं।

सामुदायिक रेडियो स्टेशन कम शक्ति वाले, गैर-व्यावसायिक स्टेशन हैं और इन्हें स्थानीय समुदायों द्वारा उनकी विशिष्ट संचार आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्थापित एवं संचालित किया जाता है। सामुदायिक रेडियो भारत में रेडियो प्रसारण का तीसरा स्तर है, जो सार्वजनिक सेवा और वाणिज्यिक रेडियो से अलग है। भारत में सामुदायिक रेडियो की यात्रा वर्ष 2002 में शुरू हुई, जब भारत सरकार ने आईआईटी/आईआईएम सहित सुस्थापित शैक्षणिक संस्थानों को सामुदायिक रेडियो स्टेशन स्थापित करने के लिए लाइसेंस प्रदान करने की नीति को मंजूरी दी। पहले सामुदायिक रेडियो स्टेशन का उद्घाटन 1 फरवरी, 2004 को किया गया था।

साल 2005 में अन्ना विश्वविद्यालय द्वारा अन्ना सामुदायिक रेडियो के शुभारंभ के साथ एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई। सामुदायिक रेडियो स्थानीय आवाजों के लिए एक मंच के रूप में कार्य करता है, जो स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, कृषि और सामाजिक विकास जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करता है। स्थानीय भाषाओं व बोलियों में प्रसारण करके, यह व्यापक पहुंच और तत्काल सामुदायिक जुड़ाव सुनिश्चित करता है। भारत जैसे सांस्कृतिक और भाषाई रूप से विविध देश में, स्थानीय कलाकारों को अवसर प्रदान करने के साथ-साथ लोक परंपराओं, स्थानीय संगीत तथा सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में भी सीआरएस महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में, इस क्षेत्र में लगातार वृद्धि हुई है, और भारत में वर्तमान में 528 सामुदायिक रेडियो स्टेशन हैं, जो जमीनी स्तर पर संचार एवं सामुदायिक सशक्तिकरण के एक प्रभावी साधन के रूप में सामुदायिक रेडियो की भूमिका को रेखांकित करते हैं।

आपात स्थितियों में भी रेडियो की अहम भूमिका होती है। जब प्राकृतिक आपदाओं या संकटों के कारण बिजली, इंटरनेट सेवाएं या अन्य संचार नेटवर्क बाधित हो जाते हैं, तो रेडियो अक्सर विश्वसनीय और समय पर जानकारी का सबसे भरोसेमंद स्रोत बना रहता है। आज भी, यह जन सुरक्षा और जागरूकता के लिए जीवन रेखा बना हुआ है। रेडियो की ताकत न केवल इसकी व्यापक पहुंच में है, बल्कि इसकी प्रासंगिकता में भी है।

सामुदायिक भागीदारी रेडियो के जमीनी स्तर पर प्रभाव को और मजबूत करती है। बुंदेलखंड में, महिलाओं के नेतृत्व वाली सामुदायिक रेडियो पहलों ने लड़कियों की शिक्षा, कृषि और कल्याणकारी योजनाओं पर चर्चा के लिए मंच प्रदान किए हैं, जिससे पहली बार प्रसारण करने वालों को स्थानीय बदलाव लाने वालों के रूप में सशक्त बनाया गया है। कच्छ में, सामुदायिक रेडियो बोलियों और मौखिक परंपराओं को संरक्षित करता है, जिससे सांस्कृतिक विरासत की रक्षा होती है।

गुजरात के कच्छ में, सामुदायिक रेडियो स्टेशन कच्छी बोली में लोकगीत, मौखिक इतिहास और कहानी सुनाने के सत्र प्रसारित करते हैं। जैसे-जैसे स्थानीय बोलियां लुप्त होती जा रही हैं, रेडियो एक सांस्कृतिक संग्रह तथा घर से दूर रहने वाले प्रवासियों के लिए एक भावनात्मक सेतु का काम करता है।

दिल्ली की तिहाड़ जेल में कैदियों द्वारा संचालित रेडियो पहल कानूनी जागरूकता, मानसिक स्वास्थ्य, संगीत और कविता पर कार्यक्रम प्रस्तुत करती हैं, जिससे रचनात्मक सहभागिता के माध्यम से अभिव्यक्ति, आत्मविश्वास तथा पुनर्वास को बढ़ावा मिलता है।

उत्तराखंड की पहाड़ियों में, जहां पर इंटरनेट कनेक्टिविटी अक्सर अविश्वसनीय होती है, सामुदायिक रेडियो भूस्खलन की चेतावनी, कृषि संबंधी सलाह, रोजगार की जानकारी और लोक संगीत प्रसारित करता है, जिससे दूरस्थ तथा बुजुर्ग आबादी के लिए यह सुलभ एवं भरोसेमंद बना रहता है।

दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में, एफएम रेडियो दैनिक शहरी जीवन का अभिन्न अंग बना हुआ है, जहां टैक्सी तथा ऑटो चालक यातायात अपडेट, क्रिकेट कमेंट्री, संगीत व इंटरैक्टिव शो सुनने के लिए रेडियो सुनते हैं। यह इस बात को रेखांकित करता है कि अत्यधिक डिजिटलीकृत शहर में भी रेडियो कितना प्रासंगिक है।

कुल मिलाकर, तीव्र डिजिटलीकरण के बावजूद, रेडियो विविध और वंचित आबादी तक पहुंचने, साक्षरता, भाषा तथा कनेक्टिविटी की बाधाओं को दूर करने और सार्वजनिक सूचना, शिक्षा व आपदा संचार में सहयोग प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।



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