ताली और दुआओं के बीच झूलती एक व्यवस्था...!


एक व्यस्त चौराहा। लाल बत्ती जलती है। इंजन रुकते हैं। एसी की ठंडी हवा के भीतर बैठे लोग मोबाइल देखने लगते हैं। और तभी हीरा आ जाती है। चमकीली साड़ी। सलीके से बंधे बाल। होंठों पर गाढ़ी लिपस्टिक। आंखों में तेज। उम्र कम, हौसला बड़ा। वह अपनी खास, पहचानी हुई ताली बजाती है। शीशे पर हल्की दस्तक देती है। मुस्कराकर कहती है, “खुश रहो बाबू… तरक्की करो…”।

कुछ लोग नजरें चुरा लेते हैं। कुछ दस-बीस का नोट थमा देते हैं। कुछ शीशा ऊपर चढ़ा लेते हैं, जैसे इंसान नहीं, हवा खड़ी हो। इस व्यस्त चौराहे पर हीरा सिर्फ चंद सिक्के नहीं बटोरती। वह हमारे विकास मॉडल की पोल खोलती है। वह पूछती है कि क्या भारत की अर्थव्यवस्था में उसके लिए कोई जगह है?

अंग्रेजी में पढ़ें : Why Indian banks have no room for ‘Third Gender’!

कुछ रोज पहले, रमीज राजा ने गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में एक व्याख्यान दिया। विषय था, “Women at Work: Aligning Gender Justice and Economic Freedom”. मंच अकादमिक था, पर सवाल बेहद ज़मीनी। उन्होंने कहा, भारत का ट्रांसजेंडर और हिजड़ा समुदाय औपचारिक रोजगार, बैंकिंग, क्रेडिट और वित्तीय संस्थानों के दरवाज़े पर खड़ा है। भीतर प्रवेश अब भी दुर्लभ है।

यह सिर्फ सामाजिक तिरस्कार की बात नहीं। यह संरचनात्मक बहिष्कार है। नीतियों में खामियां। फॉर्मों में सीमित विकल्प। बैंकिंग उत्पादों में जेंडर की अनदेखी। संस्थागत सोच में पूर्वाग्रह। जब बैंक खाता खुलवाना ही संघर्ष हो, जब लोन के लिए पहचान पर सवाल उठे, जब नौकरी के इंटरव्यू में ही दरवाज़ा बंद हो जाए, तो संविधान की बराबरी किताबों में ही रह जाती है।

विडंबना देखिए। हमारी सभ्यता ने “तृतीय प्रकृति” को बहुत पहले स्वीकार किया था। महाभारत में शिखंडी हैं, जिनकी भूमिका ने महायुद्ध की दिशा बदली। रामायण में हिजड़ों की निष्ठा का प्रसंग है, राम की प्रतीक्षा और आशीर्वाद। अर्द्धनारीश्वर आधा पुरुष, आधी स्त्री, एक ही शरीर में संतुलन। मोहिनी, विष्णु का स्त्री रूप, जिसने देवों-असुरों को मोहित किया।

इतिहास भी गवाह है। मुगल काल में हिजड़े शाही महलों के विश्वस्त संरक्षक थे। सत्ता के करीब। सम्मान के साथ। फिर आया औपनिवेशिक शासन। 1871 का क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट। “यूनक्स” को अपराधी घोषित किया गया। निगरानी, पंजीकरण, कलंक। यहीं से सामाजिक गिरावट की लंबी शुरुआत हुई। आजादी के बाद भी विरासत बदली नहीं। परिवारों ने त्यागा। समाज ने धकेला। विकल्प बचे, बधाई, भीख, सेक्स वर्क।

साल 2011 की जनगणना में 4.88 लाख ट्रांसजेंडर दर्ज हुए। विशेषज्ञ मानते हैं कि असली संख्या इससे कहीं अधिक है। साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक ‘नाल्सा’ फैसला आया। तीसरे लिंग को मान्यता मिली। आत्म-पहचान का अधिकार मिला। शिक्षा और रोजगार में बराबरी मिली। साल 2018 में धारा 377 हटाई गई। साल 2019 में ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट बना। लेकिन, कानून तो बदले, पर ज़मीन धीमी रही।

साक्षरता दर 43 प्रतिशत। राष्ट्रीय औसत 74 प्रतिशत। कॉलेजों में संख्या बेहद कम है। रोजगार दर लगभग 34 प्रतिशत, अधिकांश असंगठित क्षेत्र में। हिंसा की दर चिंताजनक। हर साल बड़ी संख्या शारीरिक और यौन हिंसा की शिकार।

आत्महत्या का प्रयास, चौंकाने वाला। कई युवा 20 साल से पहले हार मान लेते हैं। एचआईवी-एड्स की दर सामान्य आबादी से कई गुना अधिक है। ये आंकड़े सूखे नहीं हैं। इनके पीछे हीरा जैसी जिंदगियां हैं। आर्थिक बहिष्कार सबसे गहरा घाव है। हीरा के पास नियमित आय नहीं। कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं। बीमा नहीं। पेंशन नहीं। क्रेडिट हिस्ट्री नहीं। वह नकद अर्थव्यवस्था की छाया में जीती है।

गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में रमीज़ राजा ने सुझाव दिया कि जेंडर-संवेदनशील बैंकिंग उत्पाद विकसित हों। वित्तीय संस्थानों में सुधार हो। संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 सिर्फ उद्धरण न रहें, व्यवहार बनें। उन्होंने मूल प्रश्न उठाया कि क्या भारत समावेशी विकास का दावा कर सकता है, जब एक ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय आर्थिक रूप से अदृश्य है? वैसे, कुछ पहलें उम्मीद जगा रही हैं।

साल 2022 में ‘स्माइल’ योजना शुरू हुई। गरिमा गृह आश्रय। रोजगार प्रशिक्षण। तमिलनाडु एक फीसदी आरक्षण पर विचार कर रहा है। कर्नाटक और मध्य प्रदेश ने ओबीसी लाभ दिए हैं। तेलंगाना में ट्रांसजेंडर स्वास्थ्य के लिए “मित्र क्लिनिक” फिर खुला। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी भेदभाव पर चर्चा की है।

लेकिन, नीतियों में अभी भी खाली जगहें हैं। और, तब फिर वही दृश्य। लाल बत्ती। हीरा की ताली। दुआओं की आवाज़। वह समाज से सिर्फ सिक्का नहीं लेती। वह स्वीकृति चाहती है। अवसर चाहती है। सम्मान चाहती है। हमारे मिथकों में जिन्हें आशीर्वाद देने का अधिकार था, वे आज ट्रैफिक सिग्नल पर आशीर्वाद बेच रहे हैं।

समावेशी विकास की असली परीक्षा जीडीपी से नहीं होगी। न ही स्मार्ट सिटी परियोजनाओं से। बल्कि, उस दिन होगी, जब हीरा बैंक में बिना सवाल के खाता खोलेगी। जब उसे नौकरी मिलेगी, दया नहीं। जब उसकी ताली मज़ाक नहीं, सम्मान की ध्वनि होगी। भारत की आत्मा तभी पूरी होगी, जब हीरा चौराहे से दफ्तर तक का सफर तय करेगी। वरना, लाल बत्ती जलती रहेगी। और हम सब शीशे चढ़ाते रहेंगे...।



Related Items

  1. भारत में भाप वाले इंजन से हाई स्पीड ट्रेन तक रेलवे की यात्रा

  1. प्यासा भारत, सूखती नदियां; ‘डे ज़ीरो’ अब कहानी नहीं, दस्तक है…

  1. क्या 16 साल से कम उम्र वालों के लिए सोशल मीडिया बैन कर देना चाहिए?




Mediabharti